18.10.17

चर्म रोग से बचने के घरेलू उपचार


अलसी के बीज


अलसी के बीजों में ओमेगा थ्री फैटी एसिड होता है जो हमारे इम्‍यून सिस्‍टम को मजबूत बनाने में मदद करता है। इसमें सूजन को कम करने वाले तत्‍व मौजूद होते हैं। यह स्किन डिस्‍ऑर्डर, जैसे एक्जिमा और सोरायसिस को भी ठीक करने में मदद गरता है। दिन में एक-दो चम्‍मच अलसी के बीजों के तेल का सेवन करना त्‍वचा के लिए काफी फायदेमंद होता है। बेहतर रहेगा कि इसका सेवन किसी अन्‍य आहार के साथ ही किया जाए।
कैमोमाइल/ बबूने का फूल


कैमोमाइल का फूल त्‍वचा पर लगाने से जलन को शांत करता है और साथ ही अगर इसका सेवन किया जाए तो आंतरिक शांति प्रदान करता है। इसके साथ ही यह केंद्रीय तंत्रिका प्रणाली पर भी सकारात्‍मक असर डालता है। यह एक्जिमा में भी काफी मददगार होता है। इसके फूलों से बनी हर्बल टी का दिन में तीन बार सेवन आपको काफी फायदा पहुंचाता है। इसके साथ ही एक्जिमा और सोरायसिस जैसी बीमारियों से उबरने में भी यह फूल काफी मदद करता है। एक साफ कपड़े को कैमोमाइल टी में डुबोकर उसे त्‍वचा के सं‍क्रमित हिस्‍से पर लगाने से काफी लाभ मिलता है। इस प्रक्रिया को पंद्रह-पंद्रह मिनट के लिए दिन में चार से छह बार करना चाहिए। कैमोमाइल कई अंडर-आई माश्‍चराइजर में भी प्रयोग होता है। इससे डार्क सर्कल दूर होते हैं
कमफ्रे

इस फूल के पत्‍ते और जड़ें सदियों से त्‍वचा संबंधी रोगों को ठीक करने में इस्‍तेमाल की जाती रही हैं। यह कट, जलना और अन्‍य कई जख्‍मों में काफी लाभकारी होता है। इसमें मौजूद तत्‍वा तवचा द्वारा काफी तेजी से अवशोषित कर लिए जाते हैं। जिससे स्‍वस्‍थ कोशिकाओं का निर्माण होता है। इसमें त्‍वचा को आराम पहुंचाने वाले तत्‍व भी पाए जाते हैं। अगर त्‍वचा पर कहीं जख्‍म हो जाए तो कमफ्रे की जड़ों का पाउडर बनाकर उसे गर्म पानी में मिलाकर एक गाढ़ा पेस्‍ट बना लें। इसे एक साफ कपड़े पर फैला दें। अब इस कपड़े को जख्‍मों पर लगाने से चमत्‍कारी लाभ मिलता है। अगर आप इसे रात में बांधकर सो जाएं, तो सुबह तक आपको काफी आराम मिल जाता है। इसे कभी भी खाया नहीं जाना चाहिए, अन्‍यथा यह लिवर को नुकसान पहुंचा सकता है। गहरे जख्‍मों पर भी इसका इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए। इससे त्‍वचा की ऊपरी परत तो ठीक हो जाती है, लेकिन भीतरी कोशिकायें पूरी तरह ठीक नहीं हो पातीं।
गेंदा

गेंदा गहरे पीले और नारंगी रंग का फूल होता है। यह त्‍वचा की समस्‍याओं का प्रभावशाली घरेलू उपाय है। यह छोटे-मोटे कट, जलने, मच्‍छर के काटने, रूखी त्‍वचा और एक्‍ने आदि के लिए शानदार घरेलू उपाय है। गेंदे में एंटी-बैक्‍टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं। यह सूजन को कम करने में भी मदद करता है। इसके साथ ही गेंदा जख्‍मों को जल्‍दी भरने में मदद करता है। यह हर प्रकार की त्‍वचा के लिए लाभकारी होता है। गेंदे की पत्तियों को पानी में उबालकर उससे दिन में दो-तीन बार चेहरा धोने से एक्‍ने की समस्‍या दूर होती है।
अन्‍य उपाय
     हल्दी, लाल चंदन, नीम की छाल, चिरायता, बहेडा, आंवला, हरेडा और अडूसे के पत्ते को एक समान मात्रा में लीजिए। इन सभी सामानों को पानी में पूरी तरह से फूलने के लिए भिगो दीजिए। जब ये सारे सामान पूरी तरह से फूल जाएं तो पीसकर ढ़ीला पेस्ट बना लीजिए। अब इस पेस्ट से चार गुना अधिक मात्रा में तिल का तेल लीजिए।
    तिल के तेल से चार गुनी मात्रा में पानी लेकर सारे सामानों को एक बर्तन में मिला लीजिए। उसके बाद मिश्रण को मंद आंच पर तब तक गर्म करते रहिए जब तक सारा पानी भाप बनकर उड़ ना जाए। इस पेस्ट को पूरे शरीर में जहां-जहां खुजली हो रही हो वहां पर या फिर पूरे शरीर में लगाइए। इसके लगाते रहने से आपके त्वचा से चर्म रोग ठीक हो जाएगा।
    एग्जिमा, सोरियासिस, मस्सा, ल्यूकोर्डमा, स्केबीज या खुजली चर्म रोग के प्रकार हैं।किसी भी प्रकार का चर्म रोग जब तक ठीक नही हो जाता है, बहुत कष्टदायक होता है। जिसके कारण से आदमी मानसिक रूप से बीमार हो जाता है।

7.10.17

पान के पत्ते खाने के अनुपम फायदे// Unique benefits of eating Pan leaf



अगर आप इस पान के पत्ते को खाने के बारे में जान लोगो तो आप भी इसकी तारीफ किये बिना नहीं रह पाओगो |भारत की तो हर गली के नुक्कड़ पर पान की दुकान मिल ही जाती है |लेकिन कई लोग पान के पत्ते में जर्दा व तम्बाकू मिलाकर खाते है |जिसे पान को भी नशीला पदार्थ बना दिया जाता है |और जिससे कई प्रकार की खतरनाक बीमारिया पैदा हो जाती है |पैन के पत्ते का प्रयोग पूजा पाठ से लेकर कई प्रकार की मिठाईया बनांने में किया जाता है |
 अगर हम सिर्फ पान के पत्ते का ही प्रयोग करते है तो इससे हमें काफी लाभकारी फायदे मिलते है |पान के पत्ते की शेप दिल के आकार की होती है |जो कई बीमारियों को दूर करने के लिए कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है |इसमें प्रोटीन ,कैल्शियम व विटामिन स होता है |यह एक बेहतरीन एंटी बायोटिक होता है |इसमें एंटी बक्ट्रियल गुण पाए जाते है |पान का पत्ता एक बहुत ही बढ़िया माउथ फ्रेशनर है |तो आइये जानते है पान के पत्तो को खाने से हम कितनी बीमारियों से बच सकते है :
मुँह के छाले -

 इसके लिए आप पान के पत्तो को चबाये या फिर इस पर कत्था लगाकर चबाएँ या फिर इसे पानी में उबालकर इसे पानी से कुल्ले करे आपके मुँह के छाले ठीक हो जायेंगे |
खांसी को दूर करे - खांसी को दूर करने के लिए आप 10 -15 पत्ते ले और इसे तीन गिलास पानी डालकर जब तक उबाले जब तक एक गिलास ना रह जाये |और इस पानी को दिन में तीन से चार बार पिए आपकी खांसी छू मन्त्र हो जाएगी |
खुजली - 

इसके लिए आप 15 -20 पत्ते पानी में उबाले और फिर इस पानी को ताजे पानी में मिलाकर नहा लो आपकी खुजली ख़त्म हो जाएगी |



आँखों की जलन व लाल होने पर

आप पान के पांच से छ पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी से अपनी आँखों पर छीटे मारे आँखों की जलन व लाली ठीक हो जाएगी |
मसूड़ों से खून आना - 

पान के पत्ते को पानी में उबालकर इस पानी से कुल्ले करने पर मुँह से बदबू व मसूड़ों से खून आना बंद हो जाता है |
शरीर से बदबू आने पर - 

आप पान के पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी को दिन में दो से तीन बार सेवन करने से आपके शरीर से आने वाली बदबू भी दूर हो जाएगी आप चाहे तो पान के पत्तो के पानी से भी नहा सकते हो |
पाचन तंत्र -

पान के पत्तो को खाने से हमारा पाचन तंत्र सही रूप से कार्य करता है |क्योकि इससे हमारी लार ग्रंथि पर असर पड़ता है |और इसे स्लाइव लार बनने में मदद मिलती है |अगर आपने भरी भोजन किया हो तो भी पान के पत्ते को खाने से खाना हजम हो जाता है |साथ ही इससे गेस्ट्रिक अल्सर भी ठीक हो जाता है |


 मोटापा - 
पान के पत्तो को खाने से हमारा वजन कम हो जाता है |और हमारा मेटाबॉलिज्म बढ़ जाता है |जिससे शरीर में अतिरिक्त वसा नष्ट हो जाता है |जिससे हमारा वजन कम हो जाता है |
महिलाओं में श्वेत प्रदर - 

पान के पत्तो को पानी में उबाले और इस पानी से अपनी योनि को हर रोज धोये इस समस्या से आपको चुकारा मिल जायेगा |
मुहांसे होने पर - 

सात से आठ पान के पत्तो को पीस लो और इस पेस्ट में दो गिलास पानी डालकर जब तक उबाले जब तक ये गाढ़ा पेस्ट ना बन जाये |और ठंडा होने पर इसे आपने फेस पर अप्लाई करे |ऐसा करने से आपके पिम्पल्स गयाब हो जायेंगे |
नकसीर - 

पान के पत्ते को सुघने से ही नकसीर आनी बंद हो जाएगी |
जल जाने पर -

 जल जाने पर पान के पत्तो पीसकर जलने की जगह पर लगा लो फिर 15 -20 मिनट बाद इसे धोकर इस पर शहद लगा लो |आपकी जलन व घाव जल्दी ठीक हो जायेगा |




23.9.17

पेट के रोगों की होम्योपैथिक चिकित्सा //Homeopathic Medicine of belly Diseases





उदर-विकार समय पर खाना न खाना, अधिक तली चीज़ें खाना, अत्यधिक खाना खाना अथवा भूखा रहना, मिर्च-मसालों का अधिक प्रयोग आदि उदर- विकारों को उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हैं। प्रमुख परेशानियां, कारण और होमियोपैथिक चिकित्सा से निवारण निम्न प्रकार संभव है –

अग्निमांद्य : 
अग्निमांद्य यानी जठराग्नि कमजोर हो जाने पर प्रमुख लक्षण होते हैं – भूखन लगना, भोजन से अरुचि होना, पेट भरा-भरा सा लगना। इसे अजीर्ण, बदहजमी और पेट भरा-भरा सा कहते हैं। अग्निमांद्य होने पर गैस की शिकायत रहना, कब्ज होना, पेट फूलना और भारी रहना, तबीयत में गिरावट, स्वभाव में चिड़चिड़ाहट और मन में खिन्नता रहना आदि अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इन व्याधियों की चिकित्सा के लिए लक्षणों के अनुसार दवा चुनकर सेवन करना फायलक्षण एवं उपचार
कार्बोवेज : 
पाचन शक्ति कमजोर हो जाए, खाना देर से हजम होता हो और पूरी तरह से पच न पाने के कारण सड़ने लगता हो, जिससे गैस बनती हो, पेट फूल जाता हो, अधोवायु निकलने पर राहत मालूम देती हो, खट्टी डकारें आती हों या खाली डकारें आएं, गैस ऊपर की तरफ चढ़ती हो, जिसका दबाव छाती पर पड़ता हो और भोजन के आधा-एक घटे बाद ही कष्ट होने लगे, तो समझें कि ये लक्षण ‘कार्बोवेज’ दवा के हैं। ऐसी स्थिति में 30 शक्ति एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है।
एण्टिमक्रूड : 
अग्निमांद्य के साथ-साथ जीभ पर दूध जैसी सफेद मैली परत चढ़ी होना, गर्मी के दिनों में उदर-विकार होने पर दस्त लग जाना, बदहजमी, भूख न लगना, एसिड एवं अचारों को खाने की प्रबल इच्छा, खट्टी डकरें, बच्चा दूध की उल्टी कर देता है, खाने के बाद पेट फूल जाना, खुली हवा में आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर एण्टिमक्रूड दवा 6 एवं 30 शक्ति अत्यधिक कारगर है।देमंद है। प्रमुख दवाएं इस प्रकार हैं –
नक्सवोमिका : खाना खाने के घटे दो-घटे बाद तकलीफ होना, पेट में भारीपन, जैसे कोई पत्थर पेट में रखा हो, पेट फूलना, पेट में जलन मालूम देना, गैस के दबाव के साथ सिर में भारीपन बढ़ना, रोगी दुबले शरीर वाला, क्रोधी एवं चिड़चिड़ा स्वभाव, ठंड के प्रति अधिक सहिष्णुता, रोगी अचार, चटनी, तले पदार्थ खाना पसंद करता है और पचा भी लेता है। इसके बाद परेशानी होने लगती है। बहुत मद्यपान करने, बहुत भोग-विलास करने, बहुत ज्यादा खाने, आलसी जीवन बिताने और गरिष्ठ पदार्थों के सेवन से जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो गई हो एवं पाखाना जाने की इच्छा होती हो, किन्तु पाखाना बहुत कम होता हो और थोड़ी देर बाद पुनः पाखाने जाने की जरूरत होने लगती है, ऐसी स्थिति में ‘नवसवोमिका’ 30 एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है। यह दवा प्राय:रात में सोने से पूर्व ही सेवन करनी चाहिए।
पल्सेटिला : 
प्यास बिलकुल न लगना जबकि जीभ सूखी हुई हो, भोजन के घटे-दो घंटे बाद तकलीफ होना, पेट में बोझ-सा लगना, जलन होना, सुबह उठने पर बिना कुछ खाए-पिए भी पेट भरा हुआ और भारी लगना, रोगी स्वास्थ्य में ठीक होता है, मोटा होता है, ऊष्ण प्रकृति (गर्म-तासीर) वाला होता है, शांत और मधुर स्वभाव का होता है, अधीरता के कारण बात करते-करते रो देना एवं शांत कराने पर चुप हो जाना, चटपटे, तले एवं घी से बने भारी पदार्थ हजम नहीं कर पाना, ठंडी हवा में आराम मिलना, खाने में स्वाद कम हो जाना, गर्म कमरे में एवं दर्द से विपरीत दिशा में लेटने पर परेशानी महसूस करना, ठंडी चीजों से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर 30 एवं 200 शक्ति की दवा बेहद कारगर साबित रही है।
अम्लता (एसीडिटी) :
 पेट में अम्लता बढ़ जाए, तो पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है, जिससे भोजन ठीक से पचने की अपेक्षा सड़ने लगता है और पेट व गले में जलन होती है, गले में खट्टा, तीखा, चटपटा पानी डकार के साथ आता है, छाती में जलन का अनुभव होता है,खट्टी व तीखी डकारें आती हैं। ये सब अम्लता के मुख्य लक्षण हैं। इसमें अपच के साथ-साथ कब्ज या दस्त होने की शिकायत बनी रहती है। कभी-कभी कड़वी और गर्म पानी के साथ उल्टी हो जाती है। लक्षणों के आधार पर प्रमुख औषधियां निम्न प्रकार है –
एसीडिटी के लक्षण एवं उपचार
अर्जेण्टम नाइट्रिकम : 
डकार आए और साथ में पेट दर्द भी हो, मीठा खाने में रुचि हो, पर मीठा खाने से कष्ट बढ़े, डकार आने से आराम मालूम देना, जी मतली करे, गैस बढ़े, पेट में जलन हो, मीठे के साथ-साथ नमकीन खाने की भी इच्छा रहती हो, गमीं से, मिठाई से, ठंडे खाने से परेशानी बढ़ना, खुली हवा में, डकार आने से आराम मिलना आदि लक्षण हो, तो 30 शक्ति की दवा उपयोगी है।
खाने के बाद जी मतली करे, गले में कड़वा खट्टा पानी डकार के साथ आए, रोगी शीत प्रकृति का हो, तो ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
यदि डकार में खाए हुए अन्न का स्वाद आए, रोगी ऊष्ण प्रकृति का हो, मुंह सूखा रहे और प्यास न लगे, तो ‘पल्सेटिला’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
नेट्रमफॉस :

 परेशानियां जो अत्यधिक अम्लता के कारण पैदा हो जाती हैं, पीली, चिकनी परत, जीभ के पिछले भाग पर, मुंह में घाव, जीभ की नोक पर घाव, गले की (टॉन्सिल) झिल्ली भी मोटी और चिकनी हो जाना, खाना निगलने में परेशानी महसूस करना, खट्टी डकारें, कड़वी उल्टी, हरा दस्त आदि लक्षण मिलने पर 12 × एवं 30 शक्ति की दवा अत्यन्त लाभदायक है।
चाइना : 

अम्लता के रोगी को ऐसा अनुभव हो कि पूरा पेट हवा से भरा हुआ है, डकार आने पर हलकापन और राहत अनुभव हो, डकरें खट्टी व बदबूदार हों या खाली डकारें ही आती हों, मुंह का स्वाद कड़वा रहे, मुंह में कड़वा पानी आता हो, ऐसा लगे कि खाना छाती पर ही अड़ा हुआ है, छाती में जलन होती हो, तो चाइना 30 शक्ति फायदेमंद होती है।
कब्ज (कांस्टिपेशन) :
 खाने में अनियमितता, जल्दी-जल्दी खाने, ठीक से चबा-चबाकर न खाने, भारी, तले हुए और मांसाहारी पदार्थों का सेवन करने, पाचन शक्ति कमजोर होने आदि कारणों से अधिकांश स्त्री-पुरुष कब्ज के शिकार बने रहते हैं। कब्ज होने से कई और रोग भी उत्पन्न हुआ करते हैं। जैसे-शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता, जिससे शरीर में सुस्ती व कमजोरी आती है। गैस एवं वातरोग उत्पन्न होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए कब्ज का न होना पहली शर्त है।
ब्रायोनिया : 

खाने के बाद कड़वी और खट्टी डकारें आएं, पेट में भारीपन हो, डकार में खाए हुए पदार्थ की गंध या स्वाद हो, अधिक प्यास, मुंह व होंठ सूखना, सुबह मतली आना, गर्म चीज खाने से कष्ट बढ़े, खाना खाते ही तबीयत बिगड़े, हिलने-डुलने से कष्ट बढ़े, ठंड एव् ठंडी हवा से आराम हो, पेट को छूने से अथवा खांसी आने पर परेशानी बढ़ जाना, दर्द वाली सतह पर लेटने, कसकर दबाने से, आराम करने से परेशानियां कम हो जाती हों, तो ब्रायोनिया 30 शक्ति की दवा फायदेमंद है।
कब्ज का लक्षण एवं उपचार
हाइड्रेस्टिस : 
अगर रोगी सिर्फ कब्ज का ही रोगी हो, तो हाइड्रेस्टिस बहुत अक्सीर दवा है। पेट खाली-खाली-सा लगे, मीठा-मीठा हलका-सा दर्द हो और कब्ज के सिवाय अन्य कोई लक्षण न हो, तो हाइड्रेस्टिस दवा के मूल अर्क (मदर टिंचर) की 5-5 बूंद 2 चम्मच पानी में सुबह खाली पेट लगातार कई दिन लेने से कब्ज दूर हो जाती है।
नक्सवोमिका : 

उक्त दवा के मुख्य लक्षण ऊपर वर्णित किए जा चुके हैं। कब्ज की अवस्था में, जो लोग बैठक का काम ज्यादा करते हैं, बार-बार शौच के लिए जाते हैं, पर पेट ठीक से साफ नहीं होता, हर बार थोड़ा-थोड़ा पाखाना हो और शौच के बाद भी हाजत बनी रहे, तो नक्सवोमिका 200 शक्ति की तीन खुराकें 15 मिनट के अंतर पर रात में सोने से एक घंटा पहले ले लेनी चाहिए। दस्त के बाद पेट में मरोड़ होना भी इसका एक लक्षण है।
मैग्नेशिया म्यूर : 



यह दवा शिशुओं के लिए उपयोगी है। खास कर दांत-दाढ़ निकलते समय हो, दूध न पचता हो, उन्हें उक्त दवा 30 शक्ति की देना फायदेमंद है। इसके अलावा ‘साइलेशिया’ दवा भी अत्यंत फायदेमंद है।
अतिसार (डायेरिया) : 
उदर-विकार में जहां अपच के कारण कब्ज हो जाने से शौच नहीं आता, वहीं अपच के कारण अतिसार होने से बार-बार शौच आता है, जिसे दस्त लगना कहते हैं। कभी-कभी निर्जलन की स्थिति (डिहाइड्रेशन) बन जाती है, यानी शरीर में पानी की कमी हो जाती है, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मल निकलता है। फिर भी पेट साफ और हलका नहीं लगता।
डायरिया का लक्षण एवं उपचार
मैग्नेशिया कार्ब :
 शिशुओं के लिए उत्तम दवा है। दूध पीता बच्चा, हरे-पीले और झागदार दस्त बार-बार करे, मल से और शरीर से खट्टी दुर्गन्ध आए, दस्त में अपना दूध निकाले, तो उक्त दवा 30 शक्ति कारगर है।
एलूमिना : 

कुछ रोगियों को टट्टी की हाजत ही नहीं होती और वे 2-3 दिन तक हाजत का अनुभव नहीं करते। शौच के लिए बैठते हैं, तब बड़ी मुश्किल से सूखी काली तथा बकरी की मेंगनी जैसी गोलियों की शक्ल में टट्टी होती है, आलू खाने से कष्ट बढ़ जाता है, मलाशय की पेशियां इतनी शिथिल हो जाती है कि स्वयं मल बाहर नहीं फेंक पातीं। यहां तक कि पतले मल को निकालने के लिए भी जोर लगाना पड़ता है। पेशाब करने में जोर लगाना पड़े, पीठ में दर्द हो, तो इन लक्षणों के आधार पर ‘एलुमिना’ 30 एवं 200 शक्ति की कुछ खुराक ही कारगर असर दिखाती है।
कैमोमिला :
 बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बच्चा एक वस्तु मांगता है, मिलने पर लेने से मना कर देता है, जिद्दी स्वभाव, गर्म-हरा पानी जैसा बदबूदार दस्त (जैसे किसी ने पालक में अंडा फेंट दिया हो), पेशाब के रास्ते में जलन, मां के गुस्सा करने के समय बच्चे को दूध पिलाने के बाद बच्चे को दस्त होना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
एलोस : 
रोगी को मांस के प्रति घृणा रहती है। जूस एवं तरल पदार्थों की इच्छा बनी रहती है, किंतु पीते ही पेट फूलने लगता है। पेट में भारीपन, फूला हुआ, शौच से पूर्व एवं बाद में भी पेट दर्द, रोगी कुछ भी खाता है, फौरन पाखाने जाना पड़ता है। पाखाने में श्लेष्मायुक्त स्राव अधिक निकलता है। साथ ही गैस भी अधिक निकलती है। ऐसी स्थिति में उक्त औषधि 30 शक्ति में नियमित सेवन करानी चाहिए।
पोडोफाइलम : 
उल्टी के साथ दस्त, अधिक प्यास, पेट फूला हुआ, पेट के बल ही रोगी लेट सकता है, यकृत की जगह पर दर्द, रगड़ने पर आराम, कालरा रोग होने पर, बच्चों में सुबह के वक्त, दांत निकलने के दौरान हरा दस्त, पानीदार, बदबूदार पाखाना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में औषधि का प्रयोग हितकारी रहता है।
कैल्केरिया कार्ब :
 जरा-सा दबाव भी (बच्चे चाक खड़िया खाते हैं) पेट पर बर्दाश्त नहीं कर पाता, पीला बदबूदार पाखाना, अधपचा खाना निकलता है, किंतु अधिक भूख लगती है, पहले पाखाना कड़ा होता है, बाद में दस्त होते हैं, 200 शक्ति में लें।
• पहले सिरदर्द, फिर दस्त – ‘एलो’, ‘पोडोफाइलम’।


• खट्टी वस्तुओं से – ‘एलो’, ‘एण्टिमकूड’।
• किसी आकस्मिक बीमारी के कारण – ‘चाइना’, ‘कार्बोवेज’।
• शराब पीने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘लेकेसिस’, ‘नक्सवोमिका’।
• बुखार के कारण – ‘कैमोमिला’ ।
• नहाने के बाद – ‘एण्टिमक्रूड’।
• बियरपीने के कारण – ‘कालीबाई’, ‘सल्फर’, ‘इपिकॉक’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’ आदि।
• गोभी खाने से – ‘ब्रायोनिया’, ‘पेट्रोलियम’।
• नाक बहने एवं फेफड़ों की गड़बड़ी के साथ – ‘सैंग्युनेरिया’।
• मौसम-परिवर्तन के साथ – ‘एकोनाइट’, ‘ब्रायोनिया’, ‘नेट्रम सल्फ’, ‘केप्सिकम’, ‘डल्कामारा’, ‘मरक्यूरियस’।
• आइसक्रीम व अन्य ठंडी वस्तुओं के कारण – ‘पल्सेटिला’, ‘एकोनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’।
• कॉफी के कारण – ‘साइक्लामेन’, ‘थूजा’ ।
• जुकाम दब जाने से – ‘सैंग्युनेरिया’ ।
• अंडे खाने के बाद – ‘चिनिनम आर्स’।
• उत्तेजना अथवा व्यग्रता के कारण – ‘एकोनाइट’, ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘जेलसीमियम’, ‘इग्नेशिया’, ‘ओपियम’, ‘फॉस्फोरिक एसिड’।
• त्वचा रोग हो जाने पर – ‘ब्रायोनिया’, ‘सल्फर’।
• चिकनी एवं तैलीय वस्तुएं खाने के बाद – ‘पल्सेटिला’।
• फल खाने के बाद – ‘आसेंनिक’, ‘ब्रायोनिया’, ‘चाइना’, ‘पोडोफाइलम’, ‘पल्सेटिला’, ‘क्रोटनटिंग’।
• पेट की गड़बड़ियों के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘नक्सवोमिका’, ‘पल्सेटिला’ ।
• गर्मी के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘ब्रायोनिया’, ‘कैमोमिला’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूफिया’, ‘इपिकॉक’, ‘पीडोफाइलम’।
• अम्लता (हाइपर एसिडिटी) के कारण – ‘कैमोमिला’, ‘रयूम’, ‘रोविनिया’ ।
• अांतों की कमजोरी के कारण – ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘सिनकोना’, ‘सिकेल’।
• पीलिया के कारण – ‘चिओनेंथस’
• मांस खाने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘क्रोटनटिंग’।
• दूध पीने के कारण – ‘एथूजा’, ‘मैगकार्ब’, ‘नक्समॉश’, ‘मैगमूर’, ‘सीपिया’।
• चलने-फिरने से – ‘ब्रायोनिया’।
• ऊपर से नीचे उतरने (सीढ़ियां उतरने) के कारण – ‘बोरैक्स’, ‘सैनीक्यूला’ ।
• गुर्दो के संक्रमण के कारण – ‘टेरेबिंथ’ ।
• प्याज खाने से – ‘थूजा’ ।
• सूअर का मांस खाने से – ‘एकोनाइट’, ‘पल्सेटिला’ ।
• मिठाई खाने के कारण – ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘गेम्बोजिया’।
• तम्बाकू खाने से – ‘टेबेकम’, ‘कैमोमिला’।
• क्षयरोग के साथ दस्त – ‘आर्निका’, ‘बेप्टिशिया’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूप्रमआस’, ‘फॉस्फोरस’ आदि।
• सन्निपात ज्वर के साथ – ‘आर्सेनिक’, ‘बेप्टिशिया’, ‘हायोसाइमस’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’।
• आंतों में घाव हो जाने के कारण – ‘मर्ककॉर’, ‘कालीबाई’।
• पेशाब के साथ दस्त – ‘एलोस’, ‘एलूमिना’, ‘एपिस’।
• खांसने पर पाखाना निकल जाना – ‘कॉस्टिकम’।
• टीके वगैरह लगने के बाद (बच्चों में) दस्त होना – ‘साइलेशिया’, ‘थूजा’ ।
• सब्जियां (तरबूज वगैरह) खाने के बाद – ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’ ।
• प्रदूषित जल पीने के कारण – ‘जिंजिबर’, ‘एल्सटोनिया’, ‘कैम्फर’ ।
• बच्चों में दस्त होना – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘बेलाडोना’, ‘बोरैक्स’, ‘कैल्केरिया कार्ब’, ‘कैल्केरियाफॉस’, ‘कैमोमिला’, ‘कोलोसिंथ’, ‘क्रोटनटिंग’, ‘सल्फर’, ‘वेरेट्रम एल्बम’।
• बच्चों में दांत निकलने के दौरान दस्त – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘बेलाडोना’, ‘कैल्केरिया आदि।
• बूढ़े व्यक्तियों को दस्त होने पर – ‘एण्टिमकूड’, ‘कार्बोवेज’, ‘सिनकोना’, ‘सल्फर’ ।
• स्त्रियों में मासिक ऋतु स्राव से पहले व बाद में दस्त – ‘अमोनब्रोम’, ‘बोविस्टा’।

• लेटे रहने पर स्त्रियों को दस्त की हाजत होना – ‘कैमोमिला’, ‘हायोसाइमस’, ‘सिकेलकॉर’।



16.9.17

काली खांसी जड़ से खत्म करने के उपाय





मौसम बदलने के साथ ही सर्दी-जुकाम जैसी कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं। इसी में से एक है काली खांसी जो एक संक्रामक बीमारी है और हवा के जरिए एक-दूसरे तक फैल जाती है। कूकर खांसी एक संक्रामक रोग है जो एक बच्चे से दूसरे बच्चे के सम्पर्क में आने से हो जाती है। यानि की हवा से ये बीमारी एक इ इस बीमारी से न केवल बच्चे प्रभावित होते हैं अपितु बड़े व बूढ़े लोग भी काली खांसी से परेशान हो सकते हैं। कूकर खांसी को काली खांसी बोलते हैं। काली खांसी के मुख्य लक्षण होते हैं जैसे-

शरीर में बुखार का आना
तेजी से खांसी का होना
खांसते समय हूप—हूप की आवाज होना
आंखों का लाल होना
उल्टी होना


रात भर खांसी होते रहना और दिन में खांसी का तेज होते रहना आदि। अब जानते हैं काली खांसी से बचने के कारगर आयुवेर्दिक उपचार क्या हैं। जिनके प्रयोग से आप कूकर खांसी से पूरी तरह से बच सकते हो।काली खांसी होने से पहले शरीर में हल्का बुखार, उल्टी आना, आंखों का लाल होना आदि लक्षण देखने को मिलते हैं और इसके बाद खांसी बढ़ जाती है। यह बीमारी जल्दी ठीक नहीं होती जिससे काफी परेशानी होती है। ऐसे में कुछ घरेलू उपाय करके काली खांसी से छुटकारा पाया जा सकता है।
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*गन्ना और मूली का रस
काली खांसी को जड़ से खत्म करने के लिए मूली के 60 ग्राम रस में बराबर मात्रा में गन्ने का रस मिला लें और कुछ दिनों तक इसका सेवन करें
* चम्मच दही 1 चम्मच चीनी और 6 ग्राम पिसी हुई काली मिर्च का पाउडर मिला कर खाने से आपको खांसी में तुरंत राहत मिलेगी |


*घरेलू उपाय लहसुन का

लहसुन किसी भी तरह के संक्रामक रोगों को खत्म करता है। साथ ही इंसान के शरीर को कई बीमारियों से भी मुक्त रखता है।
कैसे करें लहसुन का प्रयोग काली खांसी दूर करने में आइये जानते हैं। आप सबसे पहले लहसुन की पांच बूदें निलालें अब उसमें बराबर मात्रा में शहद को भी मिला लें। अब इसे किसी गिलास व कप में डाल दें। इसका सेवन आपको एक दिन में कम से कम तीन बार करना है। यह काली खांसी को दूर करता है। इसके साथ—साथ एक प्राचीन उपाय भी आप कर सकते हो ​जिसे आदिवासी ग्रामीण लोग करते हैं। लहसुन की कलियों को छीलकर उसकी माला बना लें और इसे कुछ दिनों तक अपने गले में रखें। एैसा करने से कुकर खांसी ठीक हो जाती है।
*बादाम और मिश्री प्रयोग
बादाम भी एक कारगर औषधि है काली खांसी को खत्म करने के लिए। आप पांच बादाम लें और इन्हें रात में
एक कटोरी पानी में भरकर रख दें। सुबह होते ही आप इन बादामों के छिलके उतार लें और इसे मिश्री और
लहसुन की एक छोटी कली के साथ सेवन करें। एैसा नियमित करते रहने से कुकर खांसी खत्म हो जाएगी
*लौंग
2 -3 लौंग को आग पर भून लें और शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटने पर भी फायदा होता है।


*फिटकरी -

फिटकरी भी काली खांसी को ठीक करती है। आप बहुत ही छोटी मात्रा में फिटकरी लें कम से कम चने की दाल के आकार का हो। आपको इस फिटकरी का सेवन गर्म पानी के साथ करना है। इस अचूक उपाय को भी दिन में तीन बार जरूर करें। एैसा करने से ​काली खांसी का प्रभाव व संक्रमण खत्म होने लगता है।
*पिसी हुई काली मिर्च को एक कप पानी में उबाल ले और ठंडा करे | और फिर इक चम्मच देशी मधु मक्खी के शहद में मिला कर पीने से आपको लाभ होगा | और गले की खराश भी ठीक हो जाएगी |
*काली मिर्च और तुलसी के पत्ते-
काली खांसी की यह समस्या मार्किट से मिलने वाले कफ सिरप से ठीक नहीं होती। ऐसे में काली मिर्च और तुलसी के पत्तों के इस्तेमाल से इससे राहत पाई जा सकती है। इसके लिए इन दोनों को बराबार मात्रा में पीस कर इनकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें और 1-1 गोली को दिन में 3-4 बार सेवन करें। कुछ दिनों तक लगातार इन गोलियों का सेवन करने से खांसी से राहत मिलती है।
*तेज खांसी आने पर आप मुलेठी के टुकड़े को कालि मिर्च के साथ पीस ले और खांसी आने पर थोडा थोडा चाटने से जल्दी आराम मिलेगा | और गले के दर्द में भी आराम होगा | और सुजन भी ठीक हो जाएगी |
*सेंधा नमक -
2 ग्राम सेंधा नमक को 250 ग्राम पानी में उबालें | और जब पानी की मात्रा आधी रह जाये तब उसे ठंडा करके बोतल में भरकर रख ले | जब भी आपको खांसी हो तब एक चम्मच पी ले इससे आपको आराम मिलेगा |
*अमरूद का प्रयोग करना ना भूलें
कुकर खांसी में एक रामबाण औषधि का काम करता है अमरूद। यदि काली खांसी हो गई है तो आप गरम राख में अमरूद को डाल दें और इसे सेंक।
अब आप दिन में दो बार इसका सेवन नियमित कुछ दिनों तक करें। इस अचूक उपाय से कुकर खांसी यानि की काली खांसी दूर हो जाती है।काली खांसी में परहेज :-
हमेशा गुनगुना पानी पियें |
फ्रिज का पानी बिल्कुल ना पीये |
हो सके तो मटके के पानी का इस्तेमाल करे |
तली हुई चीजों का प्रयोग बिलकुल भी न करे |
मीठी चीजे खाने के बाद बिल्कुल भी पानी न पीये |





14.9.17

अगर होती है सफर मे उलटी तो करें ये घरेलू उपाय //Motion Sickness Home remedies

Motion Sickness Home remedies
   


कई लोगों को घूमने का शौक तो होता है पर वो उलटी के डर से कहीं बाहर नहीं निकल पाते। ऐसे में परेशान होने की जरूरत नहीं क्योंकि आपके किचन में ही ऐसी कई चीजें मौजूद हैं जिसका इस्तेमाल कर आप सफर के दौरान उलटी की समस्या से बच सकते हैं।आपका भी कोई दोस्त गाड़ी या बस में बैठते ही उलटी करता है? तो उसे भी बताएं ये आसान घरेलू नुस्खे…

पुदीना-
पुदीना पेट की मांसपेशियों को आराम देता है और इस तरह चक्कर आने और यात्रा के दौरान तबीयत खराब लगने की स्थिति को भी खत्म करता है। पुदीने का तेल भी उलटियों को रोकने में बेहद मददगार है। इसके लिए रुमाल पर पुदीने के तेल की कुछ बूंदे छिड़कें और सफर के दौरान उसे सूंघते रहें। सूखे पुदीने के पत्तों को गर्म पानी में मिलाकर खुद के लिए पुदीने की चाय बनाएं। इस मिश्रण को अच्छे से मिलाएं और इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं। कहीं निकलने से पहले इस मिश्रण को पिएं।



नींबू --

नींबू में मौजूद सिट्रिक ऐसिड उलटी और जी मिचलाने की समस्या को रोकते हैं। एक छोटे कप में गर्म पानी लें और उसमें 1 नींबू का रस व थोड़ा सा नमक मिलाएं। इसे अच्छे से मिलाकर पिएं। आप नींबू के रस को गर्म पानी में मिलाकर या शहद डालकर भी पी सकते हैं। यात्रा के दौरान होने वाली परेशानियों को दूर करने का यह एक कारगर इलाज है।
अदरक-
अदरक में ऐंटीमैनिक गुण होते हैं। एंटीमैनिक एक ऐसा पदार्थ है जो उलटी और चक्कर आने से बचाता है। सफर के दौरान जी मिचलाने पर अदरक की गोलियां या फिर अदरक की चाय का सेवन करें। इससे आपको उलटी नहीं आएगी। अगर हो सके तो अदरक अपने साथ ही रखें। अगर घबराहट हो तो इसे थोड़ा-थोड़ा खाते रहें।
प्याज का रस-
सफर में होने वाली उलटियों से बचने के लिए सफर पर जाने से आधे घंटे पहले 1 चम्मच प्याज के रस में 1 चम्मच अदरक के रस को मिलाकर लेना चाहिए। इससे आपको सफर के दौराउलटियां नहीं आएंगी। लेकिन अगर सफर लंबा है तो यह रस साथ में बनाकर भी रख सकते हैं।लौंग -
सफर के दौरान जैसे ही आपको लगे कि जी मिचलाने लगा है तो आपको तुरंत ही अपने मुंह में लौंग रखकर चूसनी चाहिए। ऐसा करने से आपका जी मिचलाना बंद हो जाएगा।.
लौंग- 
सफर के दौरान जैसे ही आपको लगे कि जी मिचलाने लगा है तो आपको तुरंत ही अपने मुंह में लौंग रखकर चूसनी चाहिए। ऐसा करने से आपका जी मिचलाना बंद हो जाएगा।.



तीन नींबू काटकर बेडरूम मे रखें और अगले दिन देखें कमाल !





एक स्‍वस्‍थ शरीर के लिए स्‍वच्‍छ आहार के साथ साथ सबसे जरूरी है अच्छी नींद। ये हम सभी के दिनचर्या का सबसे जरुरी हिस्सा होता है लेकिन अक्‍सर ऐसा हो जाता है कि किसी वजह से हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती है इन वजहों में कई बार नकारात्मक उर्जा भी होती है जो हमारे नींद में खलल डालती है। ये नकारात्‍मक उर्जा हमारे चारों तरफ होती है जो हमारे दिमाग पर एक तरह से मानसिक तनाव देती है और यही कारण है कि हम अपनी नींद सही से नहीं ले पाते हैं। तो आज हम इस नकारात्मक उर्जा को कैसे दूर कर सकते हैं उसके लिए नी़बू का उपाय बताने जा रहे हैं जो कि आपके आस पास के सभी नकारात्‍मक उर्जा को दूर करेगा।
हम सभी जानते हैं कि निम्बू के कई सारे फ़ायदे हैं जो हमारे शरीर के लिए काफी लाभदायक है। इसलिए निम्बू आसानी से सभी के घर में मिल जाता है। जहां एक तरफ निम्बू से आप एनर्जेटिक भी महसूस करते है वहीं दूसरी तरफ निम्बू को काटकर घर में रखने से ताज़ी खुशबु आती है।


बताया जाता है कि बेडरूम में निबू रखने से अस्थमा और खासी जुकाम की समस्‍या से जूझ रहे लोगों को सांस लेने में काफी आसानी होती है।जिन लोगों को सुबह उठने पर लो ब्लड प्रेशर की शिकायत है वो भी इस नुस्खे का इस्तेमाल कर सकते हैं। लो ब्लड प्रेशर के मरीज अगर रात को सोते समय अपने बिस्तर के बगल में नींबू का टुकड़ा रखते हैं तो सुबह उनको फ्रेश महसूस होगा। नींबू के गुणों के ऊपर हुए रिसर्च की माने तो नींबू की खुशबू शरीर में सेरोटिन का लेवल बढ़ाने में मदद करती है जिससे ब्लड प्रेशर के मरीजों को राहत मिलती है।
अगर आपके घर में मक्खियों के साथ साथ अन्य दूसरे कीड़े-मकोड़ों भी घर में है तो हमेशा घर में नींबू का टुकड़ा काट कर रखें। नींबू की खुशबू से कीड़े-मकोड़े दूर भागते हैं। रात को सोने से पहले कुछ देर के लिए नींबू का टूकड़ा काटकर बिस्तर के पास रख दें और लाइट बुझा दें। नींबू की खुशबू और अंधेरे के कारण सारे कीड़े-मकोड़े और मक्खियां दूर भाग जाएंगे और आप आराम से सो पाएंगे।
अगर आप सुबह की शुरुआत नींबू पानी के साथ करें तो इसका फायदा बहुत ज्यादा होगा। रोज सुबह नींबू पानी पीने से न सिर्फ आपका मोटापा कम होता है बल्कि आप कई बीमारियों से भी दूर रहेंगे।
नींबू न केवल हमारे स्वास्थ्य के लिए बल्कि हमारे शरीर और बालों के लिए भी काफी फ़ायदेमंद होता है।
ये तो हम सभी जानते हैं लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि निंबू के कुछ साधारण टोटकों के प्रयोग करने से धन प्राप्ति के रास्‍ते अपने आप खुलजाते हैं। शायद नहीं जानते हैं लेकिन नींबू के इन टोटकों का प्रयोग परंपरागत रूप से काफी पहले से से किया जाता आ रहा है।




13.9.17

मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के आधुनिक उपचार के तरीके


विभिन्न प्रकार के उपचार क्या हैं?
इलाज में पहले कदम के रूप में, डॉक्टर पूरी तरह से निदान करते हैं. इस पहचान के नतीजों के आधार पर, वो एक ख़ास उपचार योजना की सिफ़ारिश करते हैं. नियंत्रिक लक्षणों वाली हल्की मानसिक बीमारी के लिए, उपचार कम अवधि वाला हो सकता है. गंभीर मानसिक रोगों से पीड़ित लोगों के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की टीम, मनोचिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, और साइकेट्रिक सोशल वर्कर, उपयुक्त इलाज मुहैया कराने के लिए एक साथ काम करती है. उपचार में नीचे लिखी विधियों में से कोई एक या मिलीजुली विधियाँ शामिल होती हैं.


नोट:
किसी भी तरह के इलाज के प्रति व्यक्ति जितना तैयार या राज़ी है, उतना जल्दी ही वो ठीक हो सकेगा. कुछ विकार दिमाग में रासायनिक असंतुलन से हो सकते हैं; कभी कभी ये असंतुलन गंभीर भावनात्मक संकटों की वजह से आ जाते हैं. परिवार और दोस्तों की हमदर्दी और भावनात्मक सहायता, व्यक्ति को उपचार में और स्वास्थ्य सुधार में प्रभावी रहती है.
कुछ उपचार विधियां इस तरह से हैं:
औषधि प्रयोग/फ़ार्माकोथेरेपी
औषधि प्रयोग से लक्षणों में सुधार या उन्हें नियंत्रित करने और स्वास्थ्य सुधार में मदद मिलती है. कई मामलों में, दवाओं को उपचार की पहली लाइन के तौर पर रखा जाता है. दवाओं का असर बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है और इस बात पर भी कि मरीज़ का शरीर दवाओं के प्रति कितनी अनुकूलता दिखाता है.
सबसे सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली कुछ साइकेट्रिक दवाओं में शामिल हैं:
अवसादरोधी दवाएं: मनोचिकित्सक की लिखी दवाएं जो अवसाद और घबराहट के लक्षणों में राहत पहुंचाती हैं. अवसादरोधी दवाएं एडिक्टिव नहीं होती हैं और लंबे समय तक उन्हें इस्तेमाल करने के बावजूद उन की आदत नहीं पड़ती है.
घबराहट निरोधी दवाएं: इन्हें ट्रैगक्वलाइज़र भी कहा जाता है, ये घबराहट को कम करती हैं और इसलिए इनका इस्तेमाल चिंता से जुड़े विकारों में किया जाता है. इन दवाओं का आराम और सुकून वाला प्रभाव होता है और ये क्षोभ, गुस्से और अनिद्रा में भी प्रभावी रहती हैं.
मूड स्थिर करने वाली दवाएं: मनोरोग की दवा और एक मूड स्टेबलाइज़र को मिज़ाज से जुड़े विकारों के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है. वे दिमाग के कुछ ख़ास न्यूरोट्रांसमीटरों को संतुलित करने में मदद करती हैं, जो भावनाओं और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं. ये दवाएं बाइपोलर विकार के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं और इस विकार के दौरान उन्माद और अवसाद के अवसरों के लौटने की प्रवृत्ति को रोकती हैं. कुछ मामलों में, ये दवाएं गंभीर अवसाद या शिज़ोफ़्रेनिया से पैदा होने वाले अवसाद के इलाज में इस्तेमाल की जाती हैं.
ग़ैरसाइकोटिक दवाएं: इनका इस्तेमाल आमतौर पर शिज़ोफ्रेनिया जैसे विकारों से जुड़े लक्षणों (संभ्रम, भ्रांति, असंबंद्ध विचार, मूड में बदलाव) के इलाज में किया जाता है. ये दवाएं बाइपोलर विकार और गंभीर अवसाद के इलाज में भी प्रयोग की जाती हैं. इन्हें न्यूरोलेप्टिक्स या प्रमुख टैंगक्वलाइज़र भी कहा जाता है.
थेरेपियां
किसी भी थेरेपी का लक्ष्य होता है मरीज में स्वास्थ्य लाभ और उनकी मानसिक सेहत में सुधार. कुछ लोगों को दवाएं दी जा सकती हैं और उसके साथ एक किस्म की थेरेपी कराने की सलाह दी जा सकती है जबकि कुछ और लोगों को दो थेरेपियों के साथ दवाएं दी जा सकती हैं. बीमारी की गंभीरता और व्यक्ति की शारीरिक और भावनात्मक दशा पर ही ये निर्भर करता है कि उसे कौन से थेरेपी की ज़रूरत है.
साइकोथेरेपी: ये एक ऐसा उपचार है जिसमें चिकित्सा विशेषज्ञ (मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट) वैज्ञानिक रूप से वैध प्रविधियों का इस्तेमाल कर लोगों की, असंबद्ध और अतार्किक विचार प्रक्रिया को एक सकारात्मक, व्यवहारिक और तार्किक सोच में बदलने में मदद करता हैं. वे स्वस्थ आदतों का अनुपालन भी सुनिश्चित करते हैं जिससे सकारात्मक व्यवहार को मजबूती मिले.


थेरेपिस्ट लोगों से उनके लक्षणों और उनसे जुड़े हुए मुद्दों के बारे में बात करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं और उनके मिजाज़, भावना, विचारों के पैटर्न और व्यवहार को समझने और उनका आकलन करने में मरीज़ों की मदद करते हैं. इस समझ के बूते लोग बीमारी से निपटने और स्वास्थ्य लाभ के बारे में सीखने की बेहतर स्थिति में आ जाते है. साइकोथेरेपियां कई प्रकार की होती हैं और तमाम बीमारियों के लिए कोई एक थेरेपी काम नहीं करती है.

संज्ञानात्मक व्यवहारजन्य थेरेपी (सीबीटी): ये दो थेरेपियों का मिश्रण हैः संज्ञानात्मक थेरेपी और व्यवहारजन्य थेरेपी. संज्ञानात्मक थेरेपी व्यक्ति के विचारों, विश्वासों और उनके व्यक्ति के मूड और क्रियाओं पर होने वाले प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करती है. उसका लक्ष्य होता है व्यक्ति के सोच में बदलाव और उसे अधिक अनुकूलक और स्वस्थ बनाना. व्यवहारजन्य थेरेपी, व्यक्ति की क्रियाओं पर फ़ोकस करती है और उसका लक्ष्य होता है अस्वस्थ व्यवहारजन्य पैटर्न को बदलना.
सीबीटी व्यक्ति को अपनी मौजूदा समस्या को पहचानने और उसके समाधान के लिए काम करने में मदद करती है. व्यक्ति और थेरेपिस्ट दोनों इस प्रक्रिया में सक्रियतापूर्वक शामिल होते हैं. व्यक्ति के विकृत या असहयोगी विचार पैटर्नों की पहचान में, अनुपयुक्त, अतार्कित और अर्थहीन विश्वासों को पहचानने और बदलने में, तदानुरूप व्यवहारों को बदलने में और उनके अंतर्वैयक्तिक रिश्तों को सुधारने में, थेरेपिस्ट मदद करते हैं.
सीबीटी विशेषरूप से उन व्यक्तियों के लिए मददगार होती हैं जिन्हें अपनी समस्याओं को लेकर पूरा ज्ञान होता है क्योंकि सीबीटी में इस्तेमाल की जाने वाली तकनीकों में व्यक्ति को सक्रियतापूर्वक शामिल होना होता है. इसमे कई घरेलू कार्य करने होते हैं जैसे अपने मूड की एक डायरी लिखते रहना, निष्क्रिय विचारों की पहचान करना और सकारात्मक अनुभवों को रिकॉर्ड करना.
सीबीटी का इस्तेमाल गंभीर मनोरोगों के इलाज में किया जा सकता है जैसे अवसाद, घबराहट, भोजन विकार और बाइपोलर यानी द्विध्रुवीय विकार.
अंतर्वैयक्तिक थेरेपी (इंटरपर्सनल थेरेपी- आईपीटी): इसका लक्ष्य होता है व्यक्ति में संचार की प्रवृत्ति में सुधार करना और उसमें अन्य लोगों के साथ उठने-बैठने और घुलनेमिलने की आदत का विकास करना. जब किसी मरीज का व्यवहार समस्या पैदा कर रहा होता है तो दवाओं के साथ आईपीटी का इस्तेमाल किया जाता है. शोध बताते हैं कि आईपीटी का प्रभाव निर्भर करता है, बीमारी की गंभीरता और थेरेपी के प्रति मरीज़ की इच्छा और उसके पालन के प्रति उसकी सक्रियता पर.
पारिवारिक थेरेपी: इसका फ़ोकस मरीज़ों और उनके परिजनों के लिए थेरेपी के सत्र संचालित करने पर होता है. पारिवारिक रिश्ते सुधारने की कोशिश की जाती है जिसका फायदा देखरेख के काम में मरीज के स्वास्थ्य लाभ में होता है.
थेरेपिस्च परिजनों के साथ काम करते हुए परिवार के टकरावों की पहचान करता है जो मरीज़ की बीमारी को बढ़ा सकते हैं. इन समस्याओं को देखा जाता है, और एक समाधान निकाला जाता है. और इसकी पहल परिजनों की ओर से ही आती है.
थेरेपिस्ट परिजनों को उनके प्रियजन की बीमारी और उसके लक्षणों के बारे में बताते हैं. थेरेपिस्ट मरीज़ के प्रति परिजनों में आ जाने वाली किसी गंभीर और प्रतिकूल प्रवृत्ति (बीमारी की वजह से जो न चाहते हुए भी दिख जाती है) की पहचान में भी मदद करते हैं और इस तरह के नकारात्मक व्यवहार को भी ठीक करने में मदद करते हैं. इसी के साथ, थेरेपिस्ट इस बात को भी रेखांकित करते हैं कि इलाज कराने और हालत में सुधार के प्रति मरीज़ में इच्छा होना बहुत ज़रूरी है और इसमें परिजनों की मदद और देखरेख की भी अहम भूमिका है. पारिवारिक थेरेपी परिजनों पर आने वाले दबावों को कम करने पर भी ध्यान केंद्रित करती है, जो लंबे समय तक देखरेख करने से आ सकते हैं.
महत्त्वपूर्ण: इन थेरेपियों का मिलाजुला प्रयोग कभीकभार उपचार के असर को बढ़ा देता है. इसके अलावा कई मामलों में फार्माकोथेरेपी और साइकोथेरेपी को मिलाने की ज़रूरत होती है. उदाहरण के लिए, हल्के अवसाद, सीबीटी जैसी स्थितियों के साथ मददगार साइकोथेरेपी इस्तेमाल की जाए तो इसके अच्छे नतीजे मिल सकते हैं. लेकिन कुछ प्रमुख गंभीर अवसाद में, फार्माकोथेरेपी को साइकोथेरेपी के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन साइकोटिक बीमारी में, साइकोथेरेपी पूरी तरह कारगर नहीं रह पाए और सिर्फ़ दवा या चिकित्सा ही मददगार होती है.
मस्तिष्क उद्दीपन से जुड़े उपचार-
मस्तिष्क को इस इलाज करने वाला इलाज तब किया जाता है, जब दवा या साइकोथेरेपी से कोई नतीजा नहीं मिल पाता. विस्तृत चिकित्सा आकलन और डॉक्टरों के पैनल की व्यक्ति को मिलने वाले फायदे को लेकर सहमति के बाद ही विशिष्ट स्थितियों में ये इलाज दिया जाता है.
महत्त्वपूर्ण: व्यक्ति और उनकी देखरेख करने वाले लोगों को इन उपचारों और उनके साइड अफेक्ट के बारे में पूरी जानकारी रखने की ज़रूरत है. ये उपचार तभी दिया जाता है जब मरीज और उसके परिजन इसके लिए सहमति दे देते हैं.
मस्तिष्क उद्दीपन उपचार में शामिल होती हैं:
विद्युतआक्षेपी उपचार (इलेक्ट्रोकन्वल्सिव थेरेपी- ईसीटी): इस थेरेपी में मस्तिष्क पर विद्युत प्रवाह दिया जाता है, इसका इस्तेमाल कुछ खास मनोरोगों के लक्षणों के इलाज में किया जाता है. ईसीटी का उपचार के तौर पर कब, कहां और क्यों इस्तेमाल किया जाता है, इस बारे में जानने के लिए यहां पढ़ें.
कपाल केंद्रित चुंबकीय उद्दीपन (ट्रांसक्रेनीअल मैग्नेटिक स्टीम्युलेशन- टीएमएस): ये एक ऐसी प्रविधि है जिसमें कुछ मनोरोगों के लक्षणों के इलाज के लिए मस्तिष्क की स्नायु कोशिकाओं को उद्दीप्त करने में चुंबकीय क्षेत्रों का इस्तेमाल किया जाता है.


मुझे कैसे पता चलेगा कि कोई विशिष्ट उपचार लाभदायक है?

मानसिक स्वास्थ्य पेशेवर मेडिकल केस हिस्ट्री को चेक करते हैं, लक्षणों का विश्लेषण करते हैं, परीक्षण और आकलन करते हैं, और बीमारी की सही पहचान के लिए परिवार के सदस्यों से बात करते हैं और उसके बाद ये फ़ैसला करते हैं कि इलाज के लिए कौनसा तरीक़ा अपनाया जाएगा. व्यक्ति और देखरेख करने वाले लोगों को पूरी प्रक्रिया से अवगत रखा जाता है. अगर व्यक्ति ऐसी स्थिति में है कि वे भी इलाज के तरीकों और उनसे क्या सुधार हो सकता है, इस बारे में जानकारी चाहते हैं और अपना इलाज का तरीका समझना चाहते हैं, तो वे ऐसा कर सकते हैं. अगर नहीं तो ये भी काफ़ी है कि व्यक्ति के परिजनों (देखरेख करने वालों) को बीमारी के बारे में पर्याप्त जानकारी हो और इस बारे में पर्याप्त सूचना हो कि उसका इलाज किस तरह चलाया जाएगा ताकि डॉक्टर के साथ इलाज के तरीके को लेकर पहले से ही सहमति बन सके.
क्या योगा का इस्तेमाल मानसिक बीमारी में बतौर इलाज किया जा सकता है?
मनोरोग से जुड़ी दवाओं के क्या दुष्प्रभाव होते हैं?
ये साबित हुआ है कि तमाम दवाओं के दुष्प्रभाव होते हैं. कुछ लोग इन दुष्प्रभावों को महसूस नहीं कर पाते हैं या वे उनका प्रबंध कर लेते हैं. इसके अलावा, मनोरोगों की दवाओं के मामले में, दुष्प्रभावों को एक सूचना शीट में दर्ज किया जाता है और आपकी दवाओं के साथ रखी जाती है. दुष्प्रभाव के बारे में और जानने के लिए अपने डॉक्टर से बात करें और जानिए कि उनसे कैसे निपटा जा सकता है.
मनोरोग से जुड़ी चिकित्सा के कुछ साइड अफेक्ट इस तरह से हैं:
नींद और सुस्ती
वजन बढ़ना
डायबिटीज़ की आशंका
रक्तचाप में उतारचढ़ाव जिससे चक्कर आने लगते हैं
कमज़ोर प्रेरणा, रुचि में कमी और अपनी देखरेख में कमी
आप निम्न महत्त्वपूर्ण चीज़ों पर गौर कर सकते हैं:
दवाओं के लाभ उसके हल्केफुल्के दुष्प्रभाव से ज़्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं
डॉक्टरों की सलाह के मुताबिक निर्धारित समय पर दवाएं लेना सबसे सही है ताकि स्वास्थ्य सुधार को गति मिल सके
दुष्प्रभाव रुक सकते हैं अगर आप कुछ समय तक लगातार दवाएं लेते रहें.
अगर आप तब भी दुष्प्रभाव का अनुभव करते हैं और दवाएं जारी रखने में हिचकते हैं, तो आप अपने डॉक्टर से बातें करें. वो आपकी दवा की खुराक कम कर सकता है, या दवा बदल सकता है.
उपचार के दौरान किसी भी समय, अपनी दवाएं अचानक मत रोक दीजिए, जब तक कि आपका डॉक्टर ऐसा करने के लिए न कहें.



सिर के बाल और नेत्रज्योति के लिए ब्रह्मास्त्र नुस्खा // Brahmastra Nuskha for head hair and sharp eyesight

  
आँखों की रोशनी बढ़ाता है और सिर के बालों को मजबूत बनाता है यह सरल प्रयोग, जरूर पढ़ें 
आधुनिक जीवनशैली की देन बहुत सारे रोगों में से दो समस्याएं बहुत प्रमुख हैं, आखों की रोशनी कम होना और सिर के बालों का कमजोर होकर टूट जाना । ये दोनों ही समस्याएं ऐसी हैं कि धीरे धीरे शुरू होकर स्थायी रूप से आपको परेशान करने लगती हैं । इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको एक ऐसा सरल प्रयोग बता रहे हैं जो बहुत से रोगियों पर आजमाया हुआ और बहुत अच्छे रिजल्ट देने वाला सिद्ध हुआ है । इस प्रयोग को हम आपके लिये प्रकाशित कर रहे हैं, जरूर लाभ उठाइयेगा ।

इस नुस्खे को तैयार करने के लिये आपको निम्नलिखित सामग्री की जरूरत पड़ेगी :-

* साबुत लहसुन चार
* बादाम की गिरी 200 ग्राम
*पिस्ता 200 ग्राम
* गाय के दूध से बना देशी घी आधा किलो
* शुद्ध शहद एक किलो
* काली मिर्च 200 ग्राम
*अलसी के बीज 500 ग्राम
* साबुत लहसुन चार
* बादाम की गिरी 200 ग्राम
*पिस्ता 200 ग्राम




तैयार करने की विधि-

इस नुस्खे को तैयार करने के लिये सबसे पहले अलसी के बीज को धूप में सुखाकर दरदरा कूट लें और काली मिर्च का मिक्सी में चलाकर बारीक पाउडर बना लें । इसके बाद लहसुन की चारों पोथियों की सभी कली को छिलकर बारीक बारीक कतर लें । बादाम और पिस्ते को भी बारीक बारीक काट लें । सभी सामान के तैयार हो जाने के बाद इनको एक साथ मिला लें । अब देशी घी को कढ़ाही में डालकर बस इतना गर्म करें की घी पिघल जाये । अब इस पिघले हुये घी में सभी सामान डालकर मिला दें । सबसे आखिर में जब घी ठण्डा होना शुरू हो जाये तो उसमें शहद भी मिलाकर बहुत अच्छी तरह से मिला लें और काँच के मर्तबान या शीशी में भरकर रख लें ॰आपका नुस्खा तैयार है ।



सेवन विधि :-

इस नुस्खे को सभी उम्र के लोग  खा सकते हैं । उम्र के अनुसार खुराक की मात्रा निम्न प्रकार रहेगी
3 साल तक के बच्चे एक तिहाई चम्मच सुबह और शाम
3 से 8 साल तक के बच्चे आधा चम्मच सुबह और शाम
8 से 16 साल तक के युवा एक चम्मच सुबह और शाम
16 साल से ऊपर दो चम्मच सुबह और शाम




12.9.17

रतौंधी के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार //Home remedies of night blindness

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रतौंधी, आंखों की एक बीमारी है। इस रोग के रोगी को दिन में तो अच्छी तरह दिखाई देता है, लेकिन रात के वक्त वह नजदीक की चीजें भी ठीक से नहीं देख पाता।

रोगी की आँखों की जाँच के दौरान पता चलता है कि आँखों का कॉर्निया (कनीनिका) सूख-सा गया है और आई बॉल (नेत्र गोलक) धुँधला व मटमैला-सा दिखाई देता है। उपतारा (आधरिस) महीन छिद्रों से युक्त दिखता है तथा कॉर्निया के पीछे तिकोनी सी आकृति नजर आती है। आँखों से सफेद रंग का स्त्राव होता है।
रतौंधी का कारण व लक्षण
रतौंधी का सबसे आम कारण रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा, एक विकार है जिसमें रेटिना में रॉड कोशिका धीरे - धीरे उनके प्रकाश के लिए प्रतिक्रिया करने की क्षमता खो देते है। इस आनुवंशिक हालत से पीड़ित मरीजों को प्रगतिशील रतौंधी है और अंत में उनके दिन दृष्टि भी प्रभावित हो सकता है। एक्स - जुड़े जन्मजात स्थिर रतौंधी, जन्म से छड़ या तो सब पर काम नहीं है, या बहुत कम काम करते हैं, लेकिन हालत बदतर नहीं मिलता है। रात का अंधापन का एक अन्य कारण retinol, या विटामिन ए की कमी है, मछली के तेल, लीवर और डेयरी उत्पादों में पाया जाता है।
"अपवर्तक दृष्टि सुधार सर्जरी" रतौंधी का एक व्यापक कारण है, जो विपरीत संवेदनशीलता समारोह की हानि (सीएसएफ) जो कॉर्निया के प्राकृतिक संरचनात्मक अखंडता में शल्य चिकित्सा के हस्तक्षेप से उत्पन्न प्रकाश स्कैटर intraocular से प्रेरित है।
आधुनिक परिवेश में युवा वर्ग में शारीरिक सौंदर्य आकर्षण को विकसित करने पर अधिक ध्यान देते हैं। ऐसे में वे शरीर के विभिन्न अंगों के स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं दे पाते।
ऐसे में नेत्रों को बहुत हानि पहुंचती है और अधिकतर युवक-युवतियां रतौंधी रोग से पीड़ित होते हैं। रतौंधी रोग में रात्रि होने पर रोगी को स्पष्ट दिखाई नहीं देता। यदि इस रोग की शीघ्र चिकित्सा न कराई जाए तो रोगी नेत्रहीन हो सकता है।
विटामिन ‘ए’ की कमी से होनेवाला यह आंखों का प्रमुख रोग है। इस रोग से ग्रसित व्यक्ति को रात्रि के समय दिखाई देना बंद हो । जाता है तथा रोगी की आंखों के सम्मुख काले-पीले धब्बे आने लगते हैं। जिससे उसे काफी असुविधा होती है। यह रोग अधिक समय तक धूप में रहने तथा आहार में विटामिन ‘ए’ की कमी से होता है।
रतौंधी का उपचार
* आंवलाः रतौंधी होने की स्थिति में प्रतिदिन एक आवले का सेवन करें। गाजरः रतौंधी के रोगियों के लिए गाजर अचूक औषधि है। अत: इसका नियमित सेवन करना चाहिए। यदि संभव हो सके तो सुबह-शाम एक-एक गिलास गाजर का रस जरूर पीएं। इससे रतौंधी में काफी फायदा पहुंचेगा।
* सेवः प्रात:काल एक सेव नित्य चबा-चबाकर खाने से काफी आराम मिलता है।
*बेलः बेलपत्र के रस को पीने से तथा बेलपत्र के रस मिश्रित पानी से पुतलियों को धोते रहने से कुछ ही दिनों में चमत्कारी असर होता है। बेल की सात कोंपलें और काली मिर्च के सात दाने पीसकर दो चम्मच पिसी हुई मिश्री में मिलाकर सुबह नाश्ते से पहले चटनी की तरह खाएं। यह प्रयोग सर्दियों के मौसम में करें। जबकि गर्मियों में इस चटनी का शरबत बनाकर पीएं। अगर वायु व कफ की शिकायत हो तो इसमें एक चम्मच शहद भी मिला लें। इस प्रयोग से रतौंधी में काफी लाभ होता है
* केलाः केले के पत्तों का रस आंखों पर लगाने से रतौंधी दूर हो जाती है। आमः प्रतिदिन एक आम सुबह-शाम खाएं। इससे शरीर में विटामिन ‘ए’ की कमी पूरी होगी और रतौंधी में भी आराम मिलेगा।


क्या खांए?

प्रतिदिन काली मिर्च का चूर्ण घी या मक्खन के साथ मिसरी मिलाकर सेवन करने से रतौंधी नष्ट होती है।
प्रतिदिन टमाटर खाने व रस पीने से रतौंधी का निवारण होता है।
आंवले और मिसरी को बारबर मात्रा में कूट-पीसकर 5 ग्राम चूर्ण जल के साथ सेवन करें।
हरे पत्ते वाले साग पालक, मेथी, बथुआ, चौलाई आदि की सब्जी बनाकर सेवन करें।
अश्वगंध चूर्ण 3 ग्राम, आंवले का रस 10 ग्राम और मुलहठी का चूर्ण 3 ग्राम मिलाकर जल के साथ सेवन करें।
मीठे पके हुए आम खाने से विटामिन ‘ए’ की कमी पूरी होती है। इससे रतौंधी नष्ट होती है।
सूर्योदय से पहले किसी पार्क में जाकर नंगे पांव घास पर घूमने से रतौंधी नष्ट होती है।


शुद्ध मधु नेत्रों में लगाने से रतौंधी नष्ट होती है।

किशोर व नवयुवकों को रतौंधी से सुरक्षित रखने के लिए उन्हें भोजन में गाजर, मूली, खीरा, पालक, मेथी, बथुआ, पपीता, आम, सेब, हरा धनिया, पोदीना व पत्त * गोभी का सेवन कराना चाहिए।
क्या न खाएं?
चाइनीज व फास्ट फूड का सेवन न करें।
उष्ण मिर्च-मसाले व अम्लीय रसों से बने खाद्य पदार्थो का सेवन से अधिक हानि पहुंचती है।
अधिक उष्ण जल से स्नान न करें।
आइसक्रीम, पेस्ट्री, चॉकलेट नेत्रो को हानि पहुंचाते है।
अधिक समय तक टेलीविजन न देखा करें। रतौंधी के रोगी को धूल-मिट्टी और वाहनों के धुएं से सुरक्षित रहना चाहिए।
रसोईघर में गैंस के धुएं को निष्कासन करने का पूरा प्रबंध रखना चाहिए।
खट्टे आम, इमली, अचार का सेवन न करें।



11.9.17

सोरायसिस(Psoriasis) रोग के कारण ,लक्षण और उपचार //psoriasis: home remedies



     छालरोग या सोरियासिस (अंग्रेज़ी:Psoriasis) एक चर्मरोग है। सामान्य भाषा में इसे अपरस भी कहते हैं। यह रोग एक असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। छाल रोग सामान्यतः बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह दीर्घकालिक विकार है जिसका अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। इसके सही कारणों की जानकारी नहीं है। अद्यतन सूचना से यह मालूम होता है कि सोरिआसिस निम्नलिखित दो कारणों से होता हैः
वंशानुगत पूर्ववृत्ति
स्वतः असंक्राम्य प्रतिक्रिया 

सोरियासिस रोग  की पहचान -
लाल खुरदरे धब्बे, त्वचा के अनुपयोगी परत में त्वचा कोशिकाओं की संख्या बढ़ जाने के कारण पैदा होते हैं। सामान्यतः त्वचा कोशिकाएं पुरानी होकर शरीर के तल से झड़ती रहती है। इस प्रक्रिया में लगभग 4 सप्ताह का समय लग जाता है। कुछ व्यक्तियों को सोरिआसिस होने पर त्वचा कोशिकाएं 3 से 4 दिन में ही झड़ने लगती है। यही अधिकाधिक त्वचा कोशिकाओं का झड़ाव त्वचा पर छालरोग के घाव पैदा कर देता है। छालरोग में त्वचा पर लाल, खुरदरे धब्बे, खुजली और मोटापा, चिटकना और हथेलियों या पैर के तलवों में फफोले पड़ना, के लक्षण से पहचाने जाते हैं। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है।
     कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की खराबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बेटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं। छाल रोग से व्यक्तियों पर भावनात्मक तथा शारीरिक प्रभाव पड़ सकते हैं। छाल रोग आर्थरायटिस वाले व्यक्तियों को होते हैं। इससे दर्द होता है तथा इससे व्यक्ति अशक्त भी हो सकता है। छाल रोग संक्रामक नहीं है। यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को नहीं लगता ! प्राय सोरायसिस के रोगी अपने इस रोग को आम दाद-खाज खुजली के रोग से जोड़कर लंबे समय तक इसका उपचार कराने से कतराते रहते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि जब यह रोग काफी पुराना तथा जटिल हो जाता है तब रोगी इसके इलाज के लिए चिंतित होता है। रोग के संदर्भ में विशेष बात यह ध्यान देने योग्य है कि रोग जितना पुराना हो जाता है उसके उपचार में उतना ही समय लगता है
*मनुष्य की सामान्य त्वचा पर सोरायसिस रोग पपड़ीदार, रक्तिम;रक्तवर्णितद्ध वह विकार है जो चकतों के रूप में अलग से उभरे होते हैं। यह कुछ-कुछ मछली की उपरी खाल की तरह होते हैं। यह चकते प्राय हाथ-पैर, घुटनों, कोहनी, सिर के बालों के नीचे और पीठ के निचले हिस्सों पर देखने को मिलते हैं। इन चकतों का आकार मुख्यत 2-4 मिमि से लेकर कुछ सेमी तक हो सकता है, जिनमें खुजली की शिकायत भी रोगी को होती है। आयुर्वेद में इस रोग को एककुष्ठ कहा जाता है। यह रोग सामान्यतया शरीर में हो जाने वाली दाद-खाज से भिन्न प्रकृति का है। जहां दाद-खाज का घरेलू उपचार संभव है वहीं सोरायसिस के रोगी को चिकित्सकीय उपचार की परम आवश्यकता होती है। उपयुक्त उपचार के अभाव में रोगी के प्राणों पर भी संकट उत्पन्न हो सकता है।


सोरियासिस (PSORIASIS) "अपरस रोग / छाल रोग" :

* सोरायसिस (Psoriasis) त्वचा पर होने वाली Autoimmune रोग है | जिसके होने से त्वचा का कोशिका मरने लगता है और लाल एवं सफ़ेद धब्बे के रूप में शारीर में दिखने लगता है | यह रोग प्रतिराकक्षा प्रणाली के गलत संदेश के कारण कोशिकाओ की तीव्र वृद्धि दर के कारण उत्पन होता है | लोग इस बीमारी को छुवाछुत मानते है ,परंतू यह बीमारी छुवाछुत के कारण नहीं फैलता है | यह genetic एवं और immune system से सम्बंधित है, न की छुआछुत से | यह बीमारी किसी को भी हो सकता है ,चाहे वो लड़का हो या लड़की | यह शारीर के किसी भी भाग में हो सकता है | एक बार यह किसी के शारीर में होने के बाद ऊम्र भर रह जाता है |
*सोरियासिस / अपरस रोग / छाल रोग (अंग्रेज़ी: PSORIASIS) एक प्रकार का असंक्रामक दीर्घकालिक त्वचा विकार (चर्मरोग) है जो कि परिवारों के बीच चलता रहता है। यह रोग सर्दियों के मौसम में होता है। यह रोग उन व्यक्तियों को होता है जो अधिक परेशानियों से घिरे रहते हैं। छाल रोग सामान्यतया बहुत ही मंद स्थिति का होता है। इसके कारण त्वचा पर लाल-लाल खुरदरे धब्बे बन जाते हैं। यह ऐसा दीर्घकालिक विकार है जिसका यह अर्थ होता है कि इसके लक्षण वर्षों तक बने रहेंगे। ये पूरे जीवन में आते-जाते रहते हैं। यह स्त्री-पुरुष दोनों ही को समान रूप से हो सकता है। सोरियासिस में त्वचा में कोशिकाओं की संख्या बढने लगती है। चमडी मोटी होने लगती है और उस पर खुरंड और पपडियां उत्पन्न हो जाती हैं। इस रोग के भयानक रुप में पूरा शरीर मोटी लाल रंग की पपडीदार चमडी से ढक जाता है। इस रोग का प्रभाव अधिकतर व्यक्तियों की हाथों-पैरों, कलाइयों, कोहनियों, कमर, हथेलियों, घुटनों, खोपडी तथा कंधों पर होता है।
*सोरायसिस रोग जब किसी व्यक्ति को हो जाता है तो जल्दी से ठीक होने का नाम नहीं लेता है। यह छूत का रोग नहीं है। इस रोग का शरीर के किसी भाग पर घातक प्रभाव नहीं होता है। जब यह रोग किसी को हो जाता है तो उस व्यक्ति का सौन्दर्य बेकार हो जाता है तथा वह व्यक्ति भद्दा दिखने लगता है। यदि इस बीमारी के कारण भद्दा रूप न हो और खुजली न हो तो सोरायसिस के साथ आराम से जिया जा सकता है।
सोरायसिस रोग होने के लक्षण-
जब किसी व्यक्ति को सोरायसिस हो जाता है तो उसके शरीर के किसी भाग पर गहरे लाल या भूरे रंग के दाने निकल आते है। कभी-कभी तो इसके दाने केवल पिन के बराबर होते हैं। ये दाने अधिकतर कोहनी, पिंडली, कमर, कान, घुटने के पिछले भाग एवं खोपड़ी पर होते हैं। कभी-कभी यह रोग नाम मात्र का होता है और कभी-कभी इस रोग का प्रभाव पूरे शरीर पर होता है। कई बार तो रोगी व्यक्ति को इस रोग के होने का अनुमान भी नहीं होता है। शरीर के जिस भाग में इस रोग का दाना निकलता है उस भाग में खुजली होती है और व्यक्ति को बहुत अधिक परेशान भी करती है। खुजली के कारण सोरायसिस में वृद्धि भी बहुत तेज होती है। कई बार खुजली नहीं भी होती है। जब इस रोग का पता रोगी व्यक्ति को चलता है तो रोगी को चिंता तथा डिप्रेशन भी हो जाता है और मानसिक कारणों से इसकी खुजली और भी तेज हो जाती है।
सोरायसिस रोग के हो जाने के कारण और भी रोग हो सकते हैं जैसे- जुकाम, नजला, पाचन-संस्थान के रोग, टान्सिल आदि। यदि यह रोग 5-7 वर्ष पुराना हो जाए तो संधिवात का रोग हो सकता है।
 सोरियासिस का शरीर पर प्रभाव क्षेत्र:-
अपरस रोग में रोगी की त्वचा पर जगह-जगह लाल-लाल से खुरदरे दाग-धब्बे हो जाते हैं। जितने यह दाग-धब्बे भयानक लगते हैं उतनी ज़्यादा इनमें खुजली नहीं होती है। जब यह रोग किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग पर होता है तो उस भाग की त्वचा का रंग गुलाबी (लाल) होकर सूज जाता है और फिर त्वचा के ऊपर सफेद सादी, सूखी एवं कड़ी खाल (त्वचा की पतली परत) जम जाते हैं। त्वचा सूखकर फट सी जाती है। जब ऊपर की पपड़ी उतरती हैं तो त्वचा से रक्त निकलने लगता हैं। लेकिन इसमें से कुछ मवाद आदि नहीं निकलता। ये लक्षण हल्के-फुल्के से लेकर भारी मात्रा में होते हैं। इससे विकृति और अशक्तता की स्थिति पैदा हो सकती है|
सोरायसिस रोग होने का कारण:-
*बहुत अधिक संवेदनशीलता तथा स्नायु-दुर्बलता होने के कारण भी सोरायसिस रोग हो सकता है।
* अति शीघ्र बढ़ने या ख़राब होने का कारण:-
कुछ कारक है जिनसे छाल रोग से पीड़ित व्यक्तियों में चकते पड़ सकते हैं। इन कारकों में त्वचा की ख़राबी (रसायन, संक्रमण, खुरचना, धूप से जलन) मद्यसार, हार्मोन परिवर्तन, धूम्रपान, बीटा-ब्लाकर जैसी औषधी तथा तनाव सम्मिलित हैं।
*अंत:स्रावी ग्रन्थियों में कोई रोग होने के कारण सोरायसिस रोग हो सकता है।
*पाचन-संस्थान में कोई खराबी आने के कारण भी यह रोग हो सकता है।
 Psoriasis के प्रकार:-
सोरायसिस के मुख़्य प्रकार जो की उनके लक्षणों और होने वाले भागो के अनुसार बांटे गए है -
1 -पट्टिका psoriasis:
यह बात के रोगियों को पीड़ा से psoriasis के सब के साथ 80% psoriasis है के प्रकार व्यापक अधिकांश. यह चांदी सफेद रंग और लाल रंग के धब्बे सूजन के पैमाने से भिन्न है. एक यह घुटने, कोहनी, पीठ के निचले हिस्से पर खोज सकते हैं, और खोपड़ी, लेकिन यह कहीं भी हो सकता है.


उलटा छालरोग:

कांख, स्तनों के नीचे, कमर, त्वचा गुप्तांग क्षेत्र में सिलवटों, नितंबों सबसे आम जगहों पर जहां उलटा छालरोग से पता चला है.
3-Erythrodermic छालरोग:
Erythrodermic सोरायसिस बीमारी का सबसे अधिक भाग के भड़काऊ प्रकार है कि अक्सर पूरे शरीर पर फैल रहा है के लिए एक है. Erythrodermic छालरोग अक्सर अस्थिर पट्टिका psoriasis के लिए नेतृत्व कर सकते हैं. प्रासंगिक, व्यापक, उज्ज्वल लालिमा इस अवधि के दौरान त्वचा की मुख्य विशेषताएं हैं.
4-Guttate छालरोग:
अभिव्यक्ति छोटे आकार के छोटे लाल धब्बे बचपन या जवानी अवधि में शुरुआत के माध्यम से पता चला है.
5-Pustular psoriasis:
एक नियम के रूप में वयस्कों में मनाया, pustular psoriasis के आसपास लालिमा के साथ मवाद के गैर संक्रामक फफोले के माध्यम से प्रकट होता है. रोग के रूप में यह एक संक्रमण नहीं है, नहीं फैलता है.
6-Palmo पदतल Psoriasis:
पीपीपी या Palmo पदतल Psoriasis (Palmoplantar Pustulosis) काफी अलग तरह से प्रकट होता है. स्पॉट हथेलियों और तलवों पर स्थित हैं|
7-कील Psoriasis: नाखून परिवर्तन
8-खोपड़ी Psoriasis:
यह सिर के पीछे होता है, लेकिन खोपड़ी के अन्य क्षेत्रों में भी यह हो सकता है.
9-Psoriatic गठिया:
Psoriatic गठिया में दर्द होता है और ज्यादा रोग जोड़ों के आसपास सूजन, जोड़ों का दर्द, तराजू, लाली बढ़ती है, त्वचा के घावों psoriatic गठिया के दौरान देखा जाता है.
 

रोक थाम:-
• त्वचा का पानी से संपर्क सीमित रखें।
• त्वचा को खरोंचे नहीं।
• धूप तीव्रता सहित त्वचा को चोट न पहुंचने दें। धूप में जाना इतना सीमित रखें कि धूप से जलन न हो

• स्थिति को और बिगाड़ने वाली औषधी का सेवन न करें।
• तनाव पर नियंत्रण रखें।
• ऐसे कपड़े पहने जो त्वचा के संपर्क में आकर उसे नुकसान न पहुंचाएँ।
• फुहारा और स्नान को सीमित करें, तैरना सीमित करें।

• संक्रमण और अन्य बीमारियाँ हो तो डाक्टर को दिखाएं।
प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार:
• अपरस रोग से पीड़ित व्यक्ति को यदि कब्ज की शिकायत हो तो उसे गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप रोगी का यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।


अपरस रोग से पीड़ित रोगी को उपचार करने के लिए सबसे पहले उसके शरीर के दाद वाले भाग पर थोड़ी देर गर्म तथा थोड़ी देर ठण्डी सिकाई करके गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

• रोगी व्यक्ति के अपरस वाले भाग को आधे घण्टे तक गर्म पानी में डुबोकर रखना चाहिए तथा इसके बाद उस पर गर्म गीली मिट्टी की पट्टी लगाने से लाभ होता है।
• रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ़ करना चाहिए और फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए। इसके फलस्वरूप अपरस रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जा• रोगी को अपने शरीर के अपरस वाले भाग को प्रतिदिन नमक मिले गर्म पानी से धोना चाहिए और उस पर जैतून का तेल या हरे रंग की बोतल व नीली बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए। इसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।ता है।
• सोरियासिस या अपरस रोग का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को कम से कम 7 से 15 दिनों तक फलों का सेवन करना चाहिए और उसके बाद फल-दूध पर रहना चाहिए।
• अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नीबू का रस पानी में मिलाकर प्रतिदिन कम से कम 5 बार पीना चाहिए और सादा भोजन करना चाहिए।
• अपरस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को दाद वाले भाग पर रोजाना कम से कम 2 घण्टे तक नीला प्रकाश डालना चाहिए।
• अपरस रोग से पीड़ित रोगी को आसमानी रंग की बोतल के सूर्यतप्त जल को 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन दिन में 4 बार पीने से अपरस रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
• अपरस रोग से पीड़ित रोगी को नमक का सेवन नहीं करना चाहिए।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन सुबह के समय में स्नान करना चाहिए और उसके बाद घर्षण स्नान करना चाहिए और सप्ताह में 2 बार पानी में नमक मिलाकर स्नान करना चाहिए।
• रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन अपने शरीर के रोगग्रस्त भाग पर नीला प्रकाश डालना चाहिए। इसके अलावा रोगी को रोजाना हल्का व्यायाम तथा गहरी सांस लेनी चाहिए। जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है।
• ज़्यादा मिर्च मसालेदार चीज़ें न खाएं।
सोरियासिस (छाल रोग) का घरेलू नुस्खों से इलाज-
• पत्ता गोभी का सूप सुबह शाम पीने से सोरियासिस में लाभ होता है।
• केले का पत्ता प्रभावित जगह पर रखें। ऊपर कपड़ा लपेटें।
• बादाम 10 नग का पावडर बनाले। इसे पानी में उबालें। यह दवा सोरियासिस रोग की जगह पर लगावें। रात भर लगी रहने के बाद सुबह मे पानी से धो डालें। यह नुस्खा अच्छे परिणाम प्रदर्शित करता है।

• एक चम्मच चंदन का पावडर लें। इसे आधा लिटर में पानी मे उबालें। तीसरा हिस्सा रहने पर उतार लें। अब इसमें थोडा गुलाब जल और शक्कर मिला दें। यह दवा दिन में 3 बार पियें। बहुत कारगर उपाय है।
•विटामिन `ई´ युक्त पदार्थों का अधिक सेवन करने से यह रोग कुछ ही महीनों में ठीक हो जाता है।
• पत्ता गोभी सोरियासिस में अच्छा प्रभाव दिखाता है। ऊपर का पत्ता लें। इसे पानी से धोलें। हथेली से दबाकर सपाट कर लें। इसे थोडा सा गरम करके प्रभावित हिस्से पर रखकर उपर सूती कपडा लपेट दें। यह उपचार लम्बे समय तक दिन में दो बार करने से जबर्दस्त फ़ायदा होता है।
• नींबू के रस में थोडा पानी मिलाकर रोग स्थल पर लगाने से सुकून मिलता है।
• शिकाकाई पानी में उबालकर रोग के धब्बों पर लगाने से नियंत्रण होता है।
• इस रोग को ठीक करने के लिये जीवन शैली में बदलाव करना जरूरी है। सर्दी के दिनों में 3 लीटर और गर्मी के मौसम मे 5 से 6 लीटर पानी पीने की आदत बनावें। इससे विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकलेंगे।
आहार का महत्त्व-
*जौ, बाजरा तथा ज्वार की रोटी इस रोग से पीड़ित रोगी के लिए बहुत अधिक लाभदायक है।
*व्यक्ति को जो आहार अच्छा लगे, वही उसके लिए उत्तम आहार है क्योंकि छाल रोग से पीड़ित व्यक्ति खान-पान की आदतों से उसी प्रकार लाभान्वित होता है जैसे हम सभी होते हैं। कई लोगों ने यह कहा है कि कुछ खाद्य पदार्थों से उनकी त्वचा में निखार आया है या त्वचा बेरंग हो गई है।
*इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को 1 सप्ताह तक फलों का रस (गाजर, खीरा, चुकन्दर, सफेद पेठा, पत्तागोभी, लौकी, अंगूर आदि फलों का रस) पीना चाहिए। इसके बाद कुछ सप्ताह तक रोगी व्यक्ति को बिना पका हुआ भोजन खाना चाहिए जैसे- फल, सलाद, अंकुरित दाल आदि और इसके बाद संतुलित भोजन करना चाहिए।
*सोरायसिस रोग से पीड़ित रोगी को दूध या उससे निर्मित खाद्य पदार्थ, मांस, अंडा, चाय, काफी, शराब, कोला, चीनी, मैदा, तली भुनी चीजें, खट्टे पदार्थ, डिब्बा बंद पदार्थ, मूली तथा प्याज का सेवन नहीं करना चाहिए।

*नारियल, तिल तथा सोयाबीन को पीसकर दूध में मिलाकर प्रतिदिन पीने से रोगी व्यक्ति को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*आंवले का प्रतिदिन सेवन करने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।



2.9.17

पेशाब मे जलन हो या खून आता हो तो करें ये उपाय




     पेशाब में जलन हो या खून गिर रहा हो तो उसे अनदेखा बिलकुल न करे , सही से इलाज कराये|क्योंकि अगर ऐसी परेशानी का समाधान सही समय पर नही होता तो ये विकराल रूप ले लेते हैं| पेशाब से खून आने के बहुत से कारण हो सकते हैं जो मै निचे आपको बताने जा रहा हु|इसमें बहुत सी परेशानी होती है जैसे पेशाब लाल होना, यूरिन में ब्लड आना, पस आना, पेशाब पीला होना|
पेशाब में खून आने का कारण –
यूरिनरी ट्रैक्‍ट इंफेक्‍शन (यूटीआई) महिलाओं में होने वाली बेहद आम समस्या होती है|मूत्र मार्ग में संक्रमण होने के कारण महिलाओं को काफी समस्या होती है, और जलन के साथ-साथ कई बार पेशाब के साथ खून भी आने लगता है|
 अगर किसी इंसान को गुर्दे में पथरी की समस्या हो तो भी कई बार पेशाब में खून आ सकता है|ऐसा इसलिये क्‍योंकि पथरी की वजह से पेशाब की प्राकृतिक प्रक्रिया में रूकावट पैदा हो जाती है|इसका उपचार हो सकता है, इसलिए समय रहते डॉक्‍टर से सम्‍पर्क करें|इसके अलावा गुर्दे या पित्‍ताशय में ट्यूमर होने पर भी पेशाब में खून आने लगता है|ऐसे में डॉक्‍टरों द्वारा सर्जरी की मदद से इलाज किया जाता है|
    पेशाब या मल में खून आने का ग्‍लोमेरूलोनेफ‍रिटिस या ग्‍लोमेरूलर नेफीरिटिस सबसे आम कारण होता है|बढ़ते बच्‍चों और छोटे बच्‍चों में यह समस्‍या सबसे ज्‍यादा देखने को मिलती है|लेकिन कई बार बड़े लोग को भी इस समस्‍या का सामना करना पड़ता है|
     महिलाओं में सिस्‍ट का बढ़ जाना आम बात है|ये समस्या काफी पीड़ादायक होती है और इसके कारण पेशाब में खून भी आने लगता है|आमतौर पर सिस्‍ट, गुर्दे में बढ़ता है जिसके कारण पेशाब करने में दर्द औश्र जलन की समस्या होती है| एक समय के बाद खून भी आना शुरू हो जाता है|



पेशाब में खून आने का घरेलू उपचार –

    *रात को सोते समय एक गिलास पानी में मुनक्का भिगो दें|सुबह मुनक्का उसी पानी के साथ पीस लें|इसे छानकर इसमें थोड़ा भुना पिसा जीरा मिलाकर पी ले|इससे पेशाब की जलन मिट जाती है और पेशाब खुलकर आता है साथ ही खून का आना भी बंद हो जाता है
*एक गिलास पानी में दो चम्मच धनिया और एक चम्मच पिसा हुआ आंवला रात को भिगो दें|सुबह उसी पानी में मसल कर छानकर पी लें|ऐसा ही पानी शाम को भी पिएँ| इस पानी को सुबह शाम पीने से पेशाब में जलन मिट जाती है साथ ही खून गिरने में भी राहत मिलती है|
*आधे ग्लास पानी में आधा गिलास लौकी का रस,चार चम्मच पिसी मिश्री और एक ग्राम कलमी शोरा मिलाकर पीने से पेशाब की रूकावट दूर होकर पेशाब आना शुरू हो जाता है|एक खुराक काफी होती है|अगर असर नहीं हो तो एक घंटे बाद एक खुराक और लेनी चाहिए|पेशाब में खून से भी राहत मिल सकता है|
*एक कटोरी गेंहू रात को एक गिलास पानी में भिगो दें|सुबह इसी पानी के साथ इसे बारीक पीस ले|इसमें एक चम्मच मिश्री मिलाकर पी लें|इसे एक सप्ताह तक लगातार पीने से पेशाब के साथ वीर्य जाना बंद होता है|खून आना भी बंद हो सकता है|
*दो चम्मच आंवले का रस और दो चम्मच शहद मिलाकर कुछ दिन लगातार पीने से पेशाब के साथ वीर्य या धातू जाना बंद होता है|अगर पेशाब में खून की समस्या हो तो आराम मिल सकता है|




27.8.17

घुटनों के दर्द के लिए चमत्कारी उपाय //Miracle remedies for knee pain




दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट - 
किसी चोट का दर्द हो या घुटने का दर्द आप इस दर्द निवारक हल्दी के पेस्ट को बनाकर अपनी चोट के स्थान पर या घुटनों के दर्द के स्थान पर लगाइए इससे बहुत जल्दी आराम मिलता है. दर्द निवारक हल्दी का पेस्ट कैसे बनाएं इसके लिए आप सबसे पहले एक छोटा चम्मच हल्दी पाउडर लें और एक चम्मच पिसी हुई चीनी  या शहद मिला लें, और एक चुटकी चूना मिला दें और थोड़ा सा पानी डाल कर इसका पेस्ट जैसा बना लें। इस लेप को बनाने के बाद अपने चम्मच के स्थान पर या जो घुटना दर्द करता है उस स्थान पर  लगा ले और ऊपर से  बैंडेज या कोई पुराना सूती कपड़ा बांध दें | इसको रातभर लगा रहने दें , सुबह सादा पानी से इसको  ले इस तरह से लगभग 1 सप्तासे लेकर 2 सप्ताह तक इसको लगाने से आपके घुटने की सूजन मांसपेशियों में खिंचाव अंदरुनी होने वाले दर्द में बहुत जल्दी आराम मिलता है |



दर्द के आराम दिलाये सौंठ का लेप - 
सौंठ से बनी दर्द निवारक दवा सौंठ भी एक बहुत अच्छा दर्द निवारक दवा के रूप में फायदेमंद साबित हो सकता है, सौंठ से दर्द निवारक दवा बनाने के लिए  आप एक छोटा चम्मच सौंठ का पाउडर व थोड़ा तिल का तेल लें  इन दोनों को मिलाकर एक गाढ़ा पेस्ट जैसा बना ले। दर्द या मोच के स्थान पर या चोट के दर्द में आप इस दर्द निवारक सौंठ के पेस्ट को हल्के हल्के प्रभावित स्थान पर लगाएं और इसको दो से 3 घंटे तक लगा रहने दें इसके बाद इसे पानी से धो लें ऐसा करने से 1 सप्ताह में आपको घुटने के दर्द में पूरा आराम मिल जाता है और अगर मांसपेशियों में भी खिंचाव महसूस होता है तो वह भी जाता रहता है।
 

खजूर से घुटने में दर्द का इलाज -
 सर्दियों के मौसम में रोजाना 5-6 खजूर खाना बहुत ही लाभदायक होता है, खजूर का सेवन आप इस तरह भी कर सकते हैं रात के समय 6-7 खजूर पानी में भिगो दें और सुबह खाली पेट इन खजूर को खा ले और साथ ही वह पानी भी पी ले जिनको जिसमें आपने रात में खजूर भिगोए थे. यह घुटनों के दर्द के अलावा आपके जोड़ों के दर्द में भी आराम दिलाता है।
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