30.1.17

पलाश(ढाक) के औषधीय गुण : Palash (Dhak) medicinal properties



    पलाश (पलास, परसा, ढाक, टेसू, किंशुक, केसू) एक वृक्ष है जिसके फूल बहुत ही आकर्षक होते हैं। इसके आकर्षक फूलो के कारण इसे "जंगल की आग" भी कहा जाता है। प्राचीन काल ही से होली के रंग इसके फूलो से तैयार किये जाते रहे है। भारत भर मे इसे जाना जाता है। एक "लता पलाश" भी होता है। लता पलाश दो प्रकार का होता है। एक तो लाल पुष्पो वाला और दूसरा सफेद पुष्पो वाला। लाल फूलो वाले पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है। सफेद पुष्पो वाले लता पलाश को औषधीय दृष्टिकोण से अधिक उपयोगी माना जाता है। वैज्ञानिक दस्तावेजो मे दोनो ही प्रकार के लता पलाश का वर्णन मिलता है। सफेद फूलो वाले लता पलाश का वैज्ञानिक नाम ब्यूटिया पार्वीफ्लोरा है जबकि लाल फूलो वाले को ब्यूटिया सुपरबा कहा जाता है। एक पीले पुष्पों वाला पलाश भी होता है।
    जिसकी समिधा यज्ञ में प्रयुक्त होती है, ऐसे हिन्दू धर्म में पवित्र माने गये पलाश वृक्ष को आयुर्वेद ने 'ब्रह्मवृक्ष' नाम से गौरवान्विति किया है। पलाश के पाँचों अंग (पत्ते,फूल, फल, छाल, व मूल) औषधीय गुणों से सम्पन्न हैं। यह रसायन (वार्धक्य एवं रोगों को दूर रखने वाला), नेत्रज्योति बढ़ाने वाला व बुद्धिवर्धक भी है।
*पलाश व बेल के सूखे पत्ते, गाय का घी व मिश्री समभाग मिलाकर धूप करने से बुद्धि शुद्ध होती है |
*वसंत ऋतु में पलाश लाल फूलों से लद जाता है। इन फूलों को पानी में उबालकर केसरी रंग बनायें। यह रंग पानी में मिलाकर स्नान करने से आने वाली ग्रीष्म ऋतु की तपन से रक्षा होती है, कई प्रकार के चर्मरोग भी दूर होते हैं।
इसके पत्तों से बनी पत्तलों पर भोजन करने से चाँदी के पात्र में किये गये भोजन के समान लाभ प्राप्त होते हैं।
*इसके पुष्प मधुर व शीतल हैं। उनके उपयोग से पित्तजन्य रोग शांत हो जाते हैं।
*.पलाश के बीज उत्तम कृमिनाशक व कुष्ठ (त्वचारोग) दूर करने वाले हैं।
.इसकी जड़ अनेक नेत्ररोगों में लाभदायी है।
पलाश के फूलों द्वारा उपचारः
*महिलाओं के मासिक धर्म में अथवा पेशाब में रूकावट हो तो फूलों को उबालकर पुल्टिस बना के पेड़ू पर बाँधें। अण्डकोषों की सूजन भी इस पुल्टिस से ठीक होती है।
*रतौंधी की प्रारम्भिक अवस्था में फूलों का रस आँखों में डालने से लाभ होता है।
*मेह (मूत्र-संबंधी विकारों) में पलाश के फूलों का काढ़ा (50 मि.ली.) मिलाकर पिलायें।
*आँख आने पर (Conjunctivitis) 
फूलों के रस में शुद्ध शहद मिलाकर आँख मे आंजे|
पलाश के बीजों द्वारा उपचारः




*पलाश के बीज आक (मदार) के दूध में पीसकर बिच्छूदंश की जगह पर लगाने से दर्द मिट जाता है।
1.पलाश के बीजों में पैलासोनिन नामक तत्त्व पाया जाता है, जो उत्तम कृमिनाशक है। 3 से 6 ग्राम बीज-चूर्ण सुबह दूध के साथ तीन दिन तक दें । चौथे दिन सुबह 10 से 15 मि.ली. अरण्डी का तेल गर्म दूध में मिलाकर पिलायें, इससे कृमि निकल जायेंगे।
*इसके बीजों को नींबू के रस के साथ पीस कर खुजली तथा एक्जिमा तथा दाद जैसी परेशानियां दूर करने में काम में लिया जाता है।
छाल व पत्तों द्वारा उपचारः
*नाक, मल-मूत्रमार्ग अथवा योनि द्वारा रक्तस्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (50 मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलायें।
*.बवासीर में पलाश के पत्तों की सब्जी घी व तेल में बनाकर दही के साथ खायें।
*बालकों की आँत्रवृद्धि (Hernia) में छाल का काढ़ा (25 मि.ली.) बनाकर पिलायें।
*इसकी पत्तियां रक्त, शर्करा ,ब्लड शुगर को कम करती हैं तथा ग्लुकोसुरिया को नियंत्रित करती है, इसलिए मधुमेह की बीमारी में यह खासा आराम देती हैं।
पलाश के गोंद द्वारा उपचारः
*पलाश का  गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।



*पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।
*पलाश की गोंद को बंगाल में किनो नाम से भी जाना जाता है और डायरिया व पेचिश जैसे रोगों की चिकित्सा में प्रयोग किया जाता है।
और भी-
*बवासीर के मरीजों को पलाश के पत्तों का साग ताजे दही के साथ खाना चाहिए लेकिन साग में घी ज्यादा चाहिए।
*बुखार में शरीर बहुत तेज दाहक रहा हो तो पलाश के पत्तों का रस लगा लीजिये शरीर पर 15 मिनट में सारी जलन ख़त्म हो जाती है।
*जो घाव भर ही न रहा हो उस पर पलाश की गोंद का बारीक चूर्ण छिड़क लीजिये फिर देखिये।
*फीलपांव या हाथीपाँव में पलाश की जड़ के रस में सरसों का तेल मिला कर रख लीजिये बराबर मात्रा में और फिर सुबह शाम 2-2 चम्मच पीजिये।
*नेत्रों की ज्योति बढानी है तो पलाश के फूलों का रस निकाल कर उसमें शहद मिला लीजिये और आँखों में काजल की तरह लगाकर सोया कीजिए- अगर रात में दिखाई न देता हो तो पलाश की जड़ का अर्क आँखों में लगाइए।
*दूध के साथ प्रतिदिन एक (पलाश) पुष्प पीसकर दूध में मिला के गर्भवती माता को पिलायें-इससे बल-वीर्यवान संतान की प्राप्ति होती है।
*यदि अंडकोष बढ़ गया हो तो पलाश की छाल का 6 ग्राम चूर्ण पानी के साथ निगल लीजिये।
*नारी को गर्भ धारण करते ही अगर गाय के दूध में पलाश के कोमल पत्ते पीस कर पिलाते रहिये तो शक्तिशाली और पहलवान बालक पैदा होगा।
*यदि इसी पलाश के बीजों को मात्र लेप करने से नारियां अनचाहे गर्भ से बच सकती हैं।

*पेशाब में जलन हो रही हो या पेशाब रुक रुक कर हो रहा हो तो पलाश के फूलों का एक चम्मच रस निचोड़ कर दिन में बस 3 बार पी लीजिये।
*नाक-मल-मूत्रमार्ग अथवा योनि द्वारा रक्तस्राव होता हो तो छाल का काढ़ा (50 मि.ली.) बनाकर ठंडा होने पर मिश्री मिला के पिलायें- इसे इन्ही गुणों के कारण ब्रह्मवृक्ष कहना उचित है।
*प्रमेह (वीर्य विकार) : पलाश की मुंहमुदी (बिल्कुल नई) कोपलों को छाया में सुखाकर कूट-छानकर गुड़ में मिलाकर लगभग 10 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से प्रमेह नष्ट हो जाता है। ◆ टेसू की जड़ का रस निकालकर उस रस में 3 दिन तक गेहूं के दाने को भिगो दें। उसके बाद दोनों को पीसकर हलवा बनाकर खाने से प्रमेह, शीघ्रपतन (धातु का जल्दी निकल जाना) और कामशक्ति की कमजोरी दूर होती है।
*स्तम्भन एवम शुक्र शोधन हेतु : इसके लिए पलाश कि गोंद घी में तलकर दूध एवम मिश्री के साथ सेवन करें। दूध यदि देसी गाय का हो तो श्रेष्ठ है।
वसंत ऋतु में पलाश लाल फूलों से लद जाता है इन फूलों को पानी में उबालकर केसरी रंग बनायें- यह रंग पानी में मिलाकर स्नान करने से आने वाली ग्रीष्म ऋतु की तपन से रक्षा होती है तथा कई प्रकार के चर्मरोग भी दूर होते हैं।




*महिलाओं के मासिक धर्म में अथवा पेशाब में रूकावट हो तो फूलों को उबालकर पुल्टिस बना के पेड़ू पर बाँधें-अण्डकोषों की सूजन भी इस पुल्टिस से ठीक होती है।
पलाश के बीजों में पैलासोनिन नामक तत्त्व पाया जाता है जो उत्तम कृमिनाशक है- 3 से *6 ग्राम बीज-चूर्ण सुबह दूध के साथ तीन दिन तक दें -चौथे दिन सुबह 10 से 15 मि.ली. अरण्डी का तेल गर्म दूध में मिलाकर पिलायें इससे पेट के कृमि निकल जायेंगे।
*पलाश के बीज + आक (मदार) के दूध में पीसकर बिच्छूदंश की जगह पर लगाने से दर्द मिट जाता है
*वाजीकरण (सेक्स पावर) :  5 से 6 बूंद टेसू के जड़ का रस प्रतिदिन 2 बार सेवन करने से अनैच्छिक वीर्यस्राव (शीघ्रपतन) रुक जाता है और काम शक्ति बढ़ती है। 
* टेसू के बीजों के तेल से लिंग की सीवन सुपारी छोड़कर शेष भाग पर मालिश करने से कुछ ही दिनों में हर तरह की नपुंसकता दूर होती है और कामशक्ति में वृद्धि होती है।
*लिंग कि दृढ़ता हेतु : पलाश के बीजों के तेल कि हल्की मालिश लिंग पर करने से वह दृढ होता है। यदि तेल प्राप्त ना कर सकें तो पलाश के बीजों को पीसकर तिल के तेल में जला लें तथा उस तेल को छानकर प्रयोग करें। इससे भी वही परिणाम प्राप्त होते है।
*रतौंधी की प्रारम्भिक अवस्था में फूलों का रस आँखों में डालने से लाभ होता है।
आँख आने पर फूलों के रस में शुद्ध शहद मिलाकर आँखों में आँजें।

    26.1.17

    आयुर्वेद का चिकित्सा विज्ञान: Ayurveda Medical Science

      

      आयुर्वेद लगभग, 5000 वर्ष पुराना चिकित्‍सा विज्ञान है । इसे भारतवर्ष के विद्वानों नें भारत की जलवायु, भौगालिक परिस्थितियों,भारतीय दर्शन, भारतीय ज्ञान-विज्ञान के द्ष्टकोण को घ्‍यान में रखते हुये विकसित किया। यह मनुष्य के जीवित रहने की विधि तथा उसके पूर्ण विकास के उपाय बतलाता है, इसलिए आयुर्वेद अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह एक चिकित्सा पद्धति मात्र नही है, अपितु सम्पूर्ण आयु का ज्ञान है। आयुर्वेद का अर्थ है वह ज्ञान जिससे आयुष अथवा जीवन को विस्तार मिलता है. आयुर्वेद वह शास्त्र है जो भारत के समृद्ध औषधीय और चिकित्सीय संपदा का गोचर है. दुर्भाग्यवश हम अपनी ही धरोहर में मिले इस विज्ञान को भूलते जा रहे हैं जिसके प्रयोग से जीवन ना सिर्फ़ रोग मुक्त किया जाता है अपितु अप्रतिम रूप से स्वास्थ्य की ओर संचालित भी किया जा सकता है|
    संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो दुःखी होना चाहता हो। सुख की चाह प्रत्येक व्यक्ति की होती है, परन्तु सुखी जीवन उत्तम स्वास्थ्य पर निर्भर करता है। स्वस्थ और सुखी रहने के लिए यह आवश्यक है कि शरीर में कोई विकार न हो और यदि विकार हो जाए तो उसे शीघ्र दूर कर दिया जाये। आयुर्वेद का मुख्य लक्ष्य व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना एवं रोगी हो जाने पर उसके विकार का प्रशमन करना है। ऋषि जानते थे कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति स्वस्थ जीवन से है इसीलिए उन्होंने आत्मा के शुद्धिकरण के साथ शरीर की शुद्धि व स्वास्थ्य पर भी विशेष बल दिया है।
        आयुर्वेद आयुर्विज्ञान की प्राचीन भारतीय पद्धति है। यह आयु का वेद अर्थात आयु का ज्ञान है। जिस शास्त्र के द्वारा आयु का ज्ञान कराया जाय उसका नाम आयुर्वेद है। शरीर, इन्द्रिय सत्व, और आत्मा के संयोग का नाम आयु है। आधुनिक शब्दों में यही जीवन है। प्राण से युक्त शरीर को जीवित कहते है। आयु और शरीर का संबंध शाश्वत है। आयुर्वेद में इस सम्बन्ध में विचार किया जाता है। फलस्वरुप वह भी शाश्वत है। जिस विद्या के द्वारा आयु के सम्बन्ध में सर्वप्रकार के ज्ञातव्य तथ्यों का ज्ञान हो सके या जिस का अनुसरण करते हुए दीर्घ आशुष्य की प्राप्ति हो सके उस तंत्र को आयुर्वेद कहते हैं, आयुर्वेद अथर्ववेद का उपवेद है।
        आयुर्वेद के विकास क्रम और विकास के इतिहास पर दृष्टिपात करनें से ऐसा समझा जाता है कि आदिम काल के पूर्वजों नें रोंगों से मुक्ति पानें के लिये जिन जंगली जड़ी बूटियों, रहन, सहन और अन्‍य पदार्थों को रोगानुसार आरोग्‍यार्थ स्‍वरूप में स्‍वीकार किया, वे यह सारा ज्ञान अपनें बाद की पीढियों को देते चले गये। यह सारा ज्ञान श्रुति और स्‍मृति पर आधारित रहा। कालान्‍तर में यह ज्ञान एक स्‍थान पर एकत्र होता गया। जब गुरूकुलों की स्‍थापना हुयी तो धर्म, कर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इत्‍यादि की प्राप्ति के लिये यह कहा गया कि जब तक तन और मन स्‍वस्‍थ्य नहीं होंगे, ऐसा उद्देश्‍य प्राप्‍त करना कठिन है, इसलिये पहली आवश्‍यकता शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य बनाये रखना है। जब तक लिपि का आविष्‍कार नहीं हुआ था तब तक यह ज्ञान स्‍मृति और श्रुति के सहारे जीवित रहा। जब लिपियों का आविष्‍कार हुआ तब यह ज्ञान पत्‍थरों से लेकर भोजपत्र में संचित करके रखा गया।
        आयुर्वेद में आयु के हित (पथ्य, आहार, विहार), अहित (हानिकर, आहार, विहार), रोग का निदान और व्याधियों की चिकित्सा कही गई है। हित आहार, सेवन एवं अहित आहार त्याग करने से मनुष्य पूर्ण रुप से स्वस्थ रह सकता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ व्यक्ति ही जीवन के चरम लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है। पुरुषार्थ चतुष्टयं की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है अतः उसकी सुरक्षा पर विशेष बल देते हुए आयुर्वेद कहता है कि धर्म अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मुख्य साधन शरीर है। भाव प्रकाश, आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ, मे कहा गया है कि जिस शास्‍त्र के द्वारा आयु का ज्ञान, हित और अहित आहार विहार का ज्ञान, व्‍याधि निदान तथा शमन का ज्ञान प्राप्ति किया जाता है, उस शास्‍त्र का नाम आयुर्वेद है।
       


    भारत के अलावा अन्‍य देशों में यथा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, नेपाल,म्‍यामार, श्री लंका आदि देशों में आयुर्वेद की औषधियों पर शोध कार्य किये जा रहे हैं। बहुत से एन0जी0ओ0 और प्राइवेट संस्थान  तथा अस्‍पताल और व्‍यतिगत आयुर्वेदिक चिकित्‍सक शोध कार्यों में लगे हुये है।
    आयुर्वेद का इतिहास एवं मूलभूत सिद्धांत 
    आयुर्वेद प्राचीन भारत में चिकित्सा की प्रयोग की जाने वाली पद्धति है जिसमें रोग का निवारण जड़ से किया जाता है. इस विद्या का प्रयोग भारत के ऋषि-मुनि एवं ज्ञानियों द्वारा 2000 से 5000 वर्ष पूर्व किया जाता था. यह चिकित्सा प्रणाली वास्तव में modern medicine से ग़ूढ और अधिक प्रभावशाली है क्योंकि इसमे रोग के वास्तविक कारण का निवारण किया जाता है. शरीर में स्वास्थ का निर्माण कर यह चिकित्सा प्रणाली अनियमित जीवन शैली से उत्पन्न अनेक रोगों को सफलता पूर्वक निवृत्त करती है. आयुर्वेद के अनुसार मन और शरीर दोनों आपस में जुड़े हुए हैं. मन में उत्पन्न दोषों से ही शरीर में व्याधि प्रगट होती है तथा शारीरिक रोगों के निवारण के लिए मानसिक स्वास्थ का विशेष महत्व आयुर्वेद में निर्धारित है.
    प्राचीन काल में आयुर्वेद का विज्ञान मौखिक रूप से ही गुरु द्वारा शिष्य को दिया जाता था . ऋग्वेद में आयुर्वेद संबंधित चिकित्सा वर्णन सबसे पहले देखने को मिलता है. परंतु मूलतः आयुर्वेद अथर्ववेद का अंग है. बाद में सरल रूप देते हुए आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों को दर्शाने वाले कुछ लिखित मूलग्रंथ सुश्रुत, चरक और वागभट्ट द्वारा दिए गये हैं. इसके अलावा अन्य छोटे ग्रंथों में आयुर्वेदिक पद्धति के अनुरूप विभिन्न रोग क्षेत्रों में अनेक चिकित्सा प्रणालियों का वर्णन है. परंतु विस्मित करने वाली बात यह है कि सभी ग्रंथ और अलग प्रकार की चिकित्सा में आयुर्वेद के मूल सिद्धांतों पर ही केंद्रित हैं जिन्हे रोज़मर्रा के जीवन में भी सरलता पूर्वक प्रयोग किया जा सकता है. इससे भी अधिक आश्चर्य तब होता है जब हम प्रकृति तथा संपूर्ण ब्रह्मांड में आयुर्वेद के इन्ही मूलभूत सिद्धांतों को लागू पाते हैं. यह कहना कोई अतिशयोक्ति नही की आयुर्वेद एक विस्मयकारी, रहस्यदर्शी और वैज्ञानिक विद्या है जिसका विस्तार पूरे विश्व में मिलता है.
        आयुर्वेद में निहित तीन दोष - वात वायु और आकाश से निर्मित तत्व है जो की रुक्ष, ठंडा, खुरदुरा, सूक्ष्म, गतिशील, पारदर्शी और सूखाने वाला द्रव्य है. यह शरीर में हो रही आंदोलन और गति-संबंधी सभी कार्यों को होने में सहयोग देता है. शरीर में रक्त का आंदोलन, तंत्रिकायों में सूचना का प्रसारण, पेरिस्टल्स्स  (मांसपेशियों की वह लयबद्ध गतिमई क्रिया जिससे विभिन्न शारीरिक कार्य होते हैं- जैसे भोजन का निगलना), मलोत्सर्ग आदि सभी कार्य वात द्वारा ही संभव हैं. यदि इस दोष में असंतुलन उत्पन्न हो जाए तो यह इनमें से किसी भी क्रिया पर असर डाल सकता है.
       


    वात: 
    दोष की विकृति के कुछ लक्षण: शरीर का हलकापन, उँची आवाज़ को सहन ना कर पाना, कब्जियत, ठंडी और गर्म वस्तुओं  को ना सह पाना, आदि 
        पित्त: 
    इस दोष से अग्नि और जल दोनों के ही गुण निहित हैं. यह तीक्ष्ण, गर्म, क्षारमई, चिकनाई युक्त लसलसा, पीले रंग का पदार्थ है जिस से शरीर में हो रहे प्रत्येक रूपांतरण के कार्य में सहायता मिलती है. पाचन की क्रिया को सुचारू रूप से करना, चयपचय , इंद्रियों की संवेदनशीलता तथा ग्राहक (कुछ भी ग्रहण करना या लेना) शक्ति, ये सब पित्त द्वारा ही किया जाता है. पित्त में उत्पन्न दोष से इन अब कार्यों में तीक्ष्णता अथवा अवरोध उत्पन्न हो सकता है. इससे जलन या सूजन का आभास भी हो सकता है.पित्त दोष की विकृति के कुछ लक्षण: चिड़चिड़ापन, खाली पेट होने पर वमन होना, जोड़ों में सूजन, शरीर में कफ: पृथ्वी और जल से निर्मित यह दोष भारी, ठंडा, तैलीय, घना, स्निग्ध, मधुर, भोथरा, ठोस, स्थाई पदार्थ है. वसा बढ़ जाती है जिससे शरीर में भारीपन और आकार में बढ़ोत्तरी हो जाती है.
    कफ दोष की विकृति के कुछ लक्षण: अधिक श्लेष्मा का बनना, जीव्हा पर मोटी सफेद परत, 

    आयुर्वेद के अनुसार उपचार
    \आयुर्वेद के मूलभूत सिद्धांतों को समझकर हम इन रोगों को प्रारंभिक अवस्था में ही पकड़ सकते हैं तथा कुछ सरल उपायों द्वारा ही पुनः स्वस्थ को प्राप्त कर सकते हैं.
    यदि शरीर में रोग की अवस्था आ चुकी है फिर चाहे वह मध्यम अथवा तीव्र हो, उसे आयुर्वेदीय उपचार द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है.
     |
    आयुर्वेदिक और एलोपैथी की तुलना 
    *  आयुर्वेदिक दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता है,जबकि एलोपेथी दवा को एक बीमारी में इस्तेमाल करो तो उसके साथ दूसरीबीमारी अपनी जड़े मजबूत करने लगती है|
    * आयुर्वेद में सिद्धांत है कि इंसान कभी बीमार ही न हो |और इसके छोटे छोटे उपाय है जो बहुत ही आसान है | जिनका उपयोग करकेस्वस्थ रहा जा सकता है | जबकि एलोपेथी के पास इसका कोई सिद्दांत नहीं है|
    *आयुर्वेद का 85% हिस्सा स्वस्थ रहने के लिए हैऔर केवल 15% हिस्सा में आयुर्वेदिक दवाइयां आती है, जबकि एलोपेथी का15% हिस्सा स्वस्थ रहने के लिए है और 85 % हिस्सा इलाज के लिए है
    *  आयुर्वेद की दवाएं किसी भी बीमारी को जड़ से समाप्त करती है,जबकि एलोपेथी की दवाएं किसी भी बीमारी को केवल कंट्रोल में रखती है|
    *  आयुर्वेद का इलाज लाखों वर्षो पुराना है,जबकि एलोपेथी दवाओं की खोज कुछ शताब्दियों पहले हुवा |
    *  आयुर्वेद की दवाएं घर में, पड़ोस में या नजदीकी जंगल में आसानी से उपलब्ध हो जाती है, जबकि एलोपेथी दवाएं ऐसी है कि आप गाँव में रहते हो तो आपको कई किलोमीटर चलकर शहर आना पड़ेगा और डॉक्टर से लिखवाना पड़ेगा |
    *  आयुर्वेदिक दवाएं बहुत ही सस्ती है या कहे कि मुफ्त की है, जबकि एलोपेथी दवाओं कि कीमत बहुत ज्यादा है| एक अनुमान के मुताबिक एक आदमी की जिंदगी की कमाई का लगभग 40% हिस्सा बीमारीऔर इलाज में ही खर्च होता है|

    .    

    24.1.17

    हंसने के नायाब फायदे: Benefits of Laughter

        

         वैसे तो हंसने-हंसाने के लिए किसी बहाने की जरूरत नहीं होती लेकिन आपके ठहाकों में छिपी खुशहाली आपकी सेहत के लिए इतनी फायदेमंद है कि इसके फायदे जानने के बाद आप हर वक्त हंसने का बहाना खोजेंगे।
        जीवन हंसने का नाम..हंसते रहो सुबह-शाम’ अगर इस बात को आप अपने जीवन में उतार लेते हैं तो कोई भी बीमारी चाहे वह मानसिक हो या शारीरिक आपके निकट नहीं आएगी। हंसने को बेस्ट मेडिसिन का दर्जा मिला हुआ है। जिसके पास भी दूसरों को हंसाने की क्वालिटी होती है वह किसी डॉक्टर से कम नहीं है।
    आज की भाग दौङ भरी जिंदगी, ऊपर से काम का प्रेशर हममे में से कई लोगों को तो याद भी न होगा कि पिछली बार कब खिलखिला कर हँसे थे। जबकी हँसना हम सभी के लिये अति महत्वपूर्ण है किन्तु हम उसे नजर अंदाज कर देते हैं। मित्रों हँसने से हमारी जिंदगी किस तरह स्वस्थ एवं खुशनुमा हो सकती है

        आपको भले ही कुछ न आता हो लेकिन आप दूसरों को हंसाने का काम करते हैं तो यह एक सबसे बड़ी सेवा है। डॉक्टर्स के मुताबिक हंसने से न केवल स्वास्थ्य सही रहता है बल्कि काम करने के लिए स्फूर्ति आती है औए शरीर ऊर्जा से लबालब रहता है। यही नहीं, हंसने से जिंदगी भी बढ़ती है।
    आजकल तो देखा गया है कि लोग हंसने के लिए पैसे देकर थैरपी लेते हैं। यही नहीं, लोग अपने आप को स्वस्थ रखने के लिए और हंसने के लिए कॉमेडी फिल्मों और कॉमेडी शो पर भी अपना समय देते हैं।

    हंसने से ठीक रहता है रक्त संचार-
       युनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के शोधकर्ताओं का दावा है कि हंसने का संबंध शरीर के रक्त संचार से है। उन्होंने अपने अध्ययन में प्रतिभागियों को दो समूहों में रखा। पहले समूह को कॉमेडी कार्यक्रम दिखाया और दूसरे को ड्रामा। शोध में पाया गया कि कॉमेडी कार्यक्रम देखने वाली प्रतिभागी जो खुलकर हंस रहे थे उनका रक्त संचार अन्य की अपेक्षा काफी बेहतर था। 
    समस्यायों (Problem) का निदान – 
        सब जानते है और दीखता भी है कि हंसले वाले लोगो किसी भी समस्या (Problem) को बाकि लोगो की तुलना में बड़ी जल्दी सुलझा लेते है क्योंकि ऐसे में जिन्दगी के प्रति एक अच्छा और सकारात्मक नजरिया जो विकसित होता है और यह समस्याओं (Problem) को दूर करने में हमारी बहुत मदद करता है | शोध बताते है कि मात्र 10 मिनट हंसने (laughing) से हमे इतनी उर्जा मिल जाती है जितना सुबह सुबह मस्त वाले वातावरण में एक किलोमीटर की walk करने से हमे मिलती है | हंसने (laughing) से हमारा रक्त्चाप भी सामान्य हो जाती है और फेफड़े भी मजबूत होते है तथा उनकी क्षमता में भी वृद्धि होती है | थोड़ी देर का हँसना हमारे हृदय की क्षमता को भी बढाता है और रक्त प्रवाह भी संतुलित हो जाता है और हमारे शरीर के लिए हंसी फायदे (benefits) की डोज है |




    दर्द से आराम दिलाए
        कई शोधों में यह पाया गया है कि स्पोंडलाइटिस या कमर के दर्द जैसे असहनीय दर्द में आराम के लिए हंसना एक प्रभावी विकल्प है। डॉक्टर लाफिंग थेरेपी की मदद से इन रोगों में रोगियों को आराम पहुंचाने का प्रयास करते हैं। इतना ही नहीं, 10 मिनट तक ठहाके लगाने से आपको दो घंटे तक दर्द से राहत या नींद आ सकती है।
    हँसी प्रतिरक्षा तंत्र की मजबूती के लिए Laughter to strengthen the immune system
    रोजाना अधिक हँसने से हमारे शरीर में उचित रूप से ऑक्सीजन मिलता है. जिससे शरीर प्रतिरक्षा तंत्र की मजबूती होती है और शरीर स्वस्थ रहता है.
    दिल की मजबूती के लिए – 
       हँसना दिल के लिए बहुत ही अच्छा होता हैं. हँसने से हार्ट अटैक जैसी घातक बिमारी से भी छुटकारा पाया जा सकता हैं. हार्ट अटैक एक ऐसा रोग हैं. जिससे लोगों की मृत्यु होने की भी सम्भावना काफी अधिक होती हैं. हँसने से ह्रदय का व्यायाम होता हैं. जिससे रक्त शुद्ध हो जाता है और इस शुद्ध रक्त का संचार पूरे शरीर में होता हैं. जिसे हार्ट अटैक का रोग आपके शरीर से बिल्कुल्दूर हो जाता हैं.
    कैलोरी की खपत
      रिसर्च में पाया है कि हंसने से शरीर की कैलोरी की खपत होती है बल्कि ब्लड सुगर का स्तर भी कंट्रोल में रहता है। इसलिए अपने बॉडी को संतुलित रखने के लिए हंसना कभी न भूलें।
    तनाव कम करने के लिए हँसी 
       तनाव जिसे आम बोलचाल की भाषा में टेंशन भी कहा जाता है. टेंशन को खत्म करने के लिए हँसना फायदेमंद होता है. इसलिए रोजाना खूब हँसे और प्रशन्न रहने का प्रयास करें.



    य़दि सुबह के समय हास्य ध्यान योग किया जाए तो दिन भर प्रसन्नता रहती है। यदि रात में ये योग किया जाये तो नींद अच्छी आती है। हास्य योग से हमारे शरीर में कई प्रकार के हारमोंस का स्राव होता है, जिससे मधुमेह, पीठ-दर्द एवं तनाव से पीङित व्यक्तियों को लाभ होता है।
    जीवन बढ़ता है=
       डॉक्टर का मानना है कि जो इंसान दिल से और खुलकर हंसता या मुस्कुराता है उसे सब पसंद तो करते ही हैं, साथ ही उसका जीवन भी कुछ साल और बढ़ जाता है। इसके अलावा हंसने से दर्द में भी आराम मिलता है।
    नकारात्मत से सकारात्मक उर्जा की ओर
    यदि आप नकारात्मक बातों को ज्यादा महत्व देते हैं तो आज से हंसना शुरू कर दे। आपकी नकारात्मक सोच सकारात्मक में बदल जाएगी। आप किसी भी परेशानी से निराश नहीं होंगे बल्कि परेशानी में क्या अवसर है उसके बारे में विचार करेंगे।
    रोगों को दूर करने के लिए – 
       रोगों से राहत पाने के लिए भी हँसना बहुत ही फायदेमंद होता हैं. यदि आप रोजाना सुबह उठकर किसी पार्क में जाकर ताज़ी हवा में हँसने की योगा करें. तो आपकई शरीर में कुछ नए हार्मोन्स उत्पन्न होते हैं. ये हार्मोन्स शरीर को विभिन्न रोगों से बचाने में बहुत ही सहायक होते हैं. हँसने की योगा करने से आपको नींद अच्छी आएगी तथा आपको पीठ दर्द, कमर दर्द, मधुमेह जैसी अन्य बिमारियों से छुटकारा मिल जाता हैं.
    थकावट और आलस्य को दूर करता है-
       अगर आपके अंदर उर्जा की कमी है या आप थकावट और आलशीपन के शिकार हैं अपने जीवन में लाफिंग थैरिपी को शामिल करें। फिर देखिए बदलाव। आप देखेंगे कि आप न केवल उर्जावान हो रहे हैं बल्कि आपकी मानसिक क्षमता में बढ़ोतरी हुई है।
    हँसी खूबसूरती में बढ़ोतरी के लिए 




        हँसने से ना केवल हमारा शरीर स्वस्थ रहता है बल्कि हमारी सुंदरता भी बढ़ती है. जोर से हँसने से हमारे शरीर की मांसपेशियों की एकसरसाइज हो जाती हैं. जिससे चेहरे पर एक अलग ही चमक व निखार आ जाता हैं और चेहरे पर झुर्रियां भी जल्दी नहीं पड़ती.
    हंसने से हमारे मूड में तेजी से बदलाव आता है और हमारे आत्मविश्वास के स्तर में इजाफा होता है और हंसने (laughing) से न केवल हम ही खुश होते है बल्कि हमारे आस पास के वातावरण को भी हम खुशनुमा बना देते है 
    फिटनेस के लिए –
        हर व्यक्ति यही चाहता हैं कि वह हमेशा फिट रहे और अपने सभी काम स्फूर्ति के साथ कर पाए. किसी विद्वान ने कहा हैं किहंसी अनेक मर्जों की दवा हैं. यह कहावत बिल्कुल ठीक हैं. प्रतिदिन यदि आप अपने दिन की शुरुआत एक घंटे तक हँसने के बाद करें तो वह व्यक्ति हमेशा फिट रहता हैं तथा इसके साथ ही और व्यक्तियों की तुलना में रोजाना हँसने वाले व्यक्ति को बुढापे की स्थिति का भी सामना देरी से करना पड़ता हैं. यह बात तो सच की हर व्यक्ति के जीवन में बुढ़ापा जरूर आता हैं लेकिन हँसते रहने वाले व्यक्तियों को यह बुढ़ापा अन्य व्यक्तियों की भांति अत्यधिक परेशान नहीं करता. हमेशा हँसते रहने वाला व्यक्ति बुढ़ापे की अवस्था में भी अपने कार्य को करने में समर्थ रहता हैं तथा अपने कार्य को अधिक सक्रियता से कर पाता हैं.

    19.1.17

    मोच, चोट और सूजन के उपाय :Sprains, bruising and inflammation treatment

       


       कई बार काम करते समय, खेलते कूदते सीढ़ी चढ़ते हमें यह मालूम ही नहीं हो पाता कि हमारे हाथ-पाँव या कमर में मोच लग गई है, लेकिन कुछ समय बाद उस जगह दुःखने पर हमें यह पता लगता है। मोच आने पर उस अंग पर सूजन आ जाती है और काफी दर्द होने लगता है , अगर आपको असहनीय दर्द या ज्यादा परेशानी है तो आप तुरंत डॉक्टर को दिखाएँ ,लेकिन यदि मोच छोटी है तो आप उस का घरेलू उपचार भी कर सकते है ।चोट कभी भी लग सकती है और मोच कभी भी आ सकती है और यह ऐसे समय पर
    आती है जब आप या तो अपने घर पर होतें हैं या एैसी जगह जो अस्पताल से काफी
    दूर होता है एैसे समय पर आप कुछ घरेलू  नुस्खे अपना सकते हैं जो प्राचीन काल
    में इस्तेमाल किये जाते रहे हैं और जिनसे मोच, चोट और सूजन में राहत मिल सकती
    है।
    मोच, चोट और सूजन के लिए घरेलू उपाय

    *आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है। सूजन दूर हो जाती है।
    *चोट के कारण कटे हुए स्थान पर पिसी हुई हल्दी भर देने से खून का बहना बंद
    हो जाता है तथा हल्दी कीटाणुनाशक भी होती है।



    * 2 कली लहसुन, 10 ग्राम शहद, 1 ग्राम लाख एवं 2 ग्राम मिश्री इन सबको चटनी जैसा पीसकर, घी डालकर देने से टूटी हुई अथवा उतरी हुई हड्डी जल्दी जुड़ जाती है।

    *लकड़ी-पत्थर आदि लगने से आयी सूजन पर हल्दी एवं खाने का चूना एक साथ पीसकर गर्म लेप करने से अथवा इमली के पत्तों को उबालकर बाँधने से सूजन उतर जाती है।
    * यदि आप के पैर में मोच आ गई है तो आप तेजपात को पीसकर मोच वाले स्थान
    पर लगायें ।
    *मोच अथवा चोट के कारण खून जम जाने एवं गाँठ पड़ जाने पर बड़ के कोमल पत्तों पर शहद लगाकर बाँधने से लाभ होता है।
    *अगर आपके पैर या हाथ में मोच आ गई है तो बिना देर किए थोडा सा बर्फ एक कपड़े में रखकर सूजन वाले जगह पर लगायें इससे सूजन कम हो जाता है। बर्फ लगाने से सूजन वाले जगह पर रक्त का संचालन अच्छी तरह से होने लगता है जिससे दर्द धीरे-धीरे कम होने लगता है।
    * हल्दी और सरसों के तेल को मिला लें और इसे हल्की आंच में गर्म करके फिर इसे
    मोच वाली जगह पर लगाएं और किसी कपड़े से इसे ढक दें।
    *अरनी के उबाले हुए पत्तों को किसी भी प्रकार की सूजन पर बाँधने से तथा 1 ग्राम हाथ की पीसी हुई हल्दी को सुबह पानी के साथ लेने से सूजन दूर होती 



    * पका हुआ लहसुन और अजवायन को सरसों के तेल में मिलाकर गर्म करें। और फिर इस तेल की मालिश मोच वाले हिस्से पर करें। आपको राहत मिलेगी।

    * महुआ और तिल को कपड़े में बांध कर लगाने से हड्डी की मोच ठीक हो सकती
    है।
    * 1 से 3 ग्राम हल्दी और शक्कर फाँकने और नारियल का पानी पीने से तथा खाने का चूना एवं पुराना गुड़ पीसकर एकरस करके लगाने से भीतरी चोट में तुरंत लाभ होता है|
    * एलोवेरा के गूदे को सूजन और मोच वाली जगह पर लगाने से आराम मिलता है।
    * इमली की पत्तियों को पीसें और इसे आग में थोड़ा गुनगुना करें। और इसे मोच
    वाली जगह पर लगाने से दर्द से तुरंत राहत मिलती है।
    * ढ़ाक के गोंद को पानी में मिलाकर उसका लेप करने से चोट में सूजन सही हो
    जाती है ।
    *मोच को ठीक करने का एक और कारगर उपाय यह है कि आप अनार के पत्ते पीसकर मोच वाली जगह पर मलें।
    * चोट किसी भी स्थान पर लगी हो तो आप कपूर और घी की बराबर मात्रा में मिलाकर चोट वाले स्थान पर कपडे से बांधे एैसा करने से चोट का दर्द कम हो जाता
    है तथा रक्त बहना भी बंद हो जाता है।



    * सरसों के तेल में नमक को मिला लें और इसे गर्म करके मोच वाली जगह पर लगाएं। एैसा करने मोच में राहत मिलती है।
    * हाथ पैरों की ऐठन और पैर की मोच पर अखरोट का तेल लगाने से दर्द से राहत
    मिलती है।
    * चूने को शहद के साथ मिला लें और इससे मोच वाली जगह पर आराम से मालिश
    करें। इस उपाय से भी मोच में बहुत राहत मिलती है।

    मोच, चोट और सूजन मे लेने योग्य आहार

    *विटामिन डी आपकी हड्डियों के निर्माण और मरम्मत के लिए, आपके शरीर को कैल्शियम और फॉस्फोरस के अवशोषण में मदद करता है। अंडे, दूध और कुछ प्रकार की मछलियाँ विटामिन डी प्रदान करती हैं; सूर्य के सम्मुख होने पर आपका शरीर भी इसका निर्माण करता है।
    *जिंक घाव और ऊतकों की मरम्मत में सहायता करता है और हड्डियों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जिंक के उत्तम स्रोत में जौ, गेहूँ, चिकन और पालक आते हैं।



    *ओमेगा 3 फैटी एसिड सूजन कम करने में सहायक होते हैं, इन एसिड्स के उत्तम स्रोत में मीठे पानी की मछली, अखरोट, अलसी के बीज और पत्तागोभी आते हैं।
    *माँसपेशियों और जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए प्रोटीन की आवश्यकता होती है। प्रोटीन के अच्छे स्रोतों में अंडा, चिकन, मछली, मेवे दूध आदि हैं।
    *कैल्शियम हड्डियों को पोषण देने वाला खनिज है। कैल्शियमयुक्त भोज्य पदार्थों में ब्रोकोली, दूध, केल, फलियाँ, पनीर, सोयाबीन, दही, मछली आदि हैं।
    *बीटा कैरोटीन कोलेजन का, जो कि मोच के दौरान क्षतिग्रस्त स्नायुओं का निर्माण करता है, मुख्य कारक तत्व है। प्राकृतिक बीटा कैरोटीन के अच्छे स्रोतों में गहरे हरे रंग की पत्तेदार सब्जियाँ जैसे पालक या केल, ब्रोकोली, और गाजर आदि हैं।
    *विटामिन सी शरीर की सूजन घटाने में सहायक होता है। विटामिन सी के बढ़िया स्रोतों में पत्तागोभी, शिमला मिर्च, कीवी, खट्टे फल जैसे संतरे, नीबू और ग्रेपफ्रूट आदि हैं।


    18.1.17

    पानी से चिकित्सा :जल के औषधीय गुण: Water therapy

       

        जल प्रकृति का अनुपम और अनमोल उपहार है। यदि धरती पर जल नहीं होता तो आज जीवन संभव नहीं होता। जल केवल प्यास बुझाने की वस्तु मात्र नहीं है। अपितु यह जीवनदाता है यानि इंसान की मूल जरूरत है। इसके बगैर एक सप्ताह भी जिंदा रहना मुश्किल है। हमारे शरीर में 70 प्रतिशत जल का भाग है। यही कारण है कि इसकी कमी जहां अनेक रोगों का कारण बनती है, वहीं इसकी समुचित मात्रा रोगों से निजात दिलाती है।
      संसार में जितनी भी चिकित्सा पद्धतियां हैं उनमें जल चिकित्सा सबसे प्राचीन है। प्राकृतिक, आयुर्वेद और यूनानी चिकित्सा पद्धतियों में इसका काफी महत्ता बताई गई है। अब तो इसे एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में भी अपनाया जा रहा है। जापान में तो जल चिकित्सा पद्धति काफी लोकप्रिय है। तथा अनेक रोगों का उपचार इससे किया जा रहा है। यह किसी औषधि से कम नहीं है।
      जल को आप साधारण वस्तु न समझें। क्या आप जानते हैं कि यह हमारे शरीर को किस तरह से स्वस्थ और निरोगी रखकर दीर्घायु बनाता है। आइए, डालते हैं जल के औषधीय गुणों पर एक नजर-

    * जल के सेवन से शरीर की नाड़ियां उत्तेजित होती हैं तथा मांसपेशियां संकुचित।
    *जल की कमी से जोड़ों को आधार प्रदान करने वाली गद्दियों में लचीलापन समाप्त हो जाता है थथा वे सिकुड़ जाती हैं।
    * जल का सेवन नए ऊतकों के निर्माण में सहायक होता है तथा उन्हें सुरक्षात्मक कुशन प्रदान करता है।
    * शरीर में लगातार मेटाबोलिक क्रिया चलती रहती है जिसमें पानी की लगातार जरूरत होती है। इन्हीं क्रियाओं के फलस्वरूप हमें एनर्जी मिलती है। प्रातःकाल पिया गया पानी उषापान कहलाता है। इससे मनुष्य के यौवन और आयु में वृद्धि होती है।
    * जो लोग पानी कम पीते हैं उनकी याददाश्त कमजोर होती है।
    40. पानी पीने से मुंह में लार और थूक बनता है। लार पाचन क्रिया में महत्वपूर्ण योगदान देती है।
    1. पानी पीने से थकान दूर होती है। तथा राहत मिलती है। इसलिए जब भी थके-मांदे घर लौंटे तो एक गिलास पानी अवश्य पिएं।
    * यदि बुखार बहुत तेज हो तो रोगी को हर आधे घंटे में ठंडा पानी पिलाते रहना चाहिए।
    * यदि कोई व्यक्ति मूर्छित हो गया हो तो उसके चेहरे पर ठंडे पानी के छींटे मारें या उसे शीतल जल से भरे टब में लिटा देना चाहिए।
    * बच्चों के सूखा रोग में प्रतिदिन ठंडे जल से स्नान कराने से लाभ होता है।
    * यदि टॉसिल्स बनने की शिकायत हो तो गर्म पानी में एक चुटकी नमक डालकर गरारे करने से लाभ होता है।
    * यदि कब्ज की शिकायत हो तो रात को सोते समय तथा सुबह उठने के बाद गर्म जल का सेवन करना चाहिए।
    * सर्दियों में कफ की शिकायत हो तो सूर्य तापित जल का सेवन करना चाहिए।
    * काली खांसी होने पर भी प्रतिदिन शीतल जल से ही स्नान करने से राहत मिलती है।
    * हिस्टीरिया में रोजाना शीतल जल से स्नान करने से दौरे की आकृति और तीव्रता कम हो जाती है।
    * आग से शरीर का कोई अंग जल या झुलस जाए तो तुरंत प्रभावित अंग पर ठंडा पानी का छिड़काव करें। यह छिड़काव तब तक करें जब तक कि जलन पूर्णतः बंद नहीं हो जाती।



    * अस्थमा या दमा रोग मे रोगी को रोजाना सुबह उठते ही एक गिलास ठंडा पानी पीना चाहिए।
    * जल हमारे शरीर शुद्धिकरण के लिए आवश्यक है। इसके अभाव में विजातीय तत्व शरीर से बाहर नहीं निकल पाते। पसीना और मूत्र तभी बनेगा जब आप पानी पिएंगे।
    *पानी का समुचित मात्रा में सेवन करने से खाए गए पोषक तत्वों का अवशोषण होता है।
    * रक्त बनाने में आंतों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि छोटी एवं बड़ी आंत सक्रिय बनी रहे तो रक्त निर्माण निर्बाध गति से होता है।
    * जो लोग पानी पीने में कंजूसी बरतते हैं उन्हें कब्ज की शिकायत सदैव बनी रहती है। पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करने से आंतों की सक्रियता बढ़ती है तथा मल निष्कासन में परेशानी नहीं होती। बवासीर, फिशर तथा फ्रिश्चुला जैसी बीमारियां भी उन्हें घेरती हैं, जो पानी कम पीते हैं।
    * मोटापे से परेशान हो तो पानी डटकर पिएं। इससे पेट भरा-भरा लगता है और शरीर को खाद्य सामग्री की जरूरत कम पड़ती है।
    * गुर्दे शरीर का महत्वपूर्ण अंग हैं। यदि आप पानी कम पीते हैं तो इससे उनकी कार्यक्षमता प्रभावित होती है जबकि पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से वे भलीभांति कार्य करते हैं।
    * पीलिया रोग में भी जल का सेवन बहुत लाभदायक है। इससे रक्त में व्याप्त अशुद्धियां बाहर निकल जाती हैं।
    *जी घबराना, हृदय की धड़कन बढ़ने आदि पर घूंट-घूंट कर ठंडा जल पीने से तुरंत राहत मिलती है।
    *बुखार होने पर रोगी के माथे व पेट पर ठंडे पानी की पट्टी रखनी चाहिए। इससे बुखार उतरने में मदद मिलती है।
    * तांबे के बर्तन में रात भर रखा पानी सुबह पीने से पेट संबंधी रोगों का नाश होता है।
    * जो लोग पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करते हैं उन्हें बुढ़ापा देर से आता है। उनके चेहरे पर समय से पूर्व झुर्रियां भी नहीं पड़तीं।
    *प्रातः शीतल जल के छींटे आंखों पर मारने से नेत्र ज्योति बढ़ती है।
    *महिलाओं को अपने स्तन पुष्ट करने के लिए स्नान करते समय ठंडा एवं गर्म जल बारी-बारी से स्तनों पर डालना चाहिए। इससे उनमें कसाव पैदा होता है।
    27. आईफ्लू यानि कंजेक्टिवाइटिस होने पर दिन में कई बार साफ, शीतल जल से आंखें धोने से राहत मिलती है।
    * जल ही शरीर के तापक्रम को नियमित करके शरीर की गर्मी को समान रूप से बनाए रखता है।



    * गर्मियों में घर से बाहर निकलने पर लू लगने का अंदेशा रहता है। ऐसे में घर से निकलने से पूर्व एक गिलास ठंडा पानी पी लिया जाए तो लू से बचाव हो सकता है।
    * स्तनपान कराने वाली माताओं को पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए। इससे उनमें दूध की मात्रा बढ़ती है।
    * आंखों में छोटा-मोटा कीड़ा, कचरा आदि घुस गया हो तो साफ शीतल जल से आंख धोने से अवांछित वस्तु निकल जाएगी तथा आपको राहत मिलेगी।
    *नकसीर फूटने पर रोगी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखें। इससे नाक से होने वाला रक्तस्राव बंद हो जाएगा।
    * रक्त को तरल व गतिशील बनाए रखने में जल विशेष उपयोगी है।
    * पर्याप्त मात्रा में जल पीने से ही शरीर की हड्डियां और जोड़ क्रियाशील रहते हैं।
    * डिहाइड्रेशन में तो जल का सेवन किस संजीवनी बूटी से कम नहीं उल्टी, दस्त, लू आदि की वजह से हुए डिहाइड्रेशन से जान भी जा सकती है। उल्टी-दस्त होने पर पानी में ‘ओआरएस’ का घोल बनाकर लेना चाहिए।
    * शरीर को जल की आवश्यकता प्राकृतिक बात है। यदि आप पानी नहीं पिएंगे तो जल की पूर्ति आपके रक्त, मांसपेशियों और विभिन्न कोशिकाओं से होती हैं। इससे अन्य शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
    * जल में प्राकृतिक रूप से रोगों से लड़ने की शक्ति होती है। जो लोग समुचित मात्रा में जल का सेवन करते हैं वे रोगाणुओं के हमले से बचे रहते हैं।
    * शीतल जल से स्नान करने से न केवल शरीर में व्याप्त मैल, गंदगी ही दूर होती है अपितु ताजगी एवं स्फूर्ति का एहसास भी होता है।
    *पर्याप्त मात्रा में पानी पीना बड़ी आंत के कैंसर से बचाता है।



    *समुचित मात्रा में पानी का सेवन स्तन कैंसर की आशंका कम करता है। पानी अधिक पीने से ब्लड कैंसर का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है।
    *पथरी होने पर रात्रि भोजन के पश्चात् एक गिलास गर्म पानी पीना चाहिए।
    *यदि पैरों में सूजन आ गई हो तो गर्म पानी में थोड़ा सा नमक डालकर उसमें पैर डुबोकर रखें
    *यदि कमर या पीठ दर्द सताए तो गर्म पानी की थैली से सिकाई करने से लाभ होता है।
    *नमकीन पानी में नहाने से गठिया के दर्द में राहत मिल सकती है।हाल में हुए शोध से पता चलता है कि उच्च सांद्रता वाले नमक के घोल के सूजन के कारण फैली कोशिकाओं को राहत मिलती है और इससे किसी तरह का साइड इफेक्ट भी नहीं होता है।
    आप जो भी जल का सेवन करें, वह शुद्ध और कीटाणु रहित होना चाहिए। प्रदूषण जल बीमारियों का कारण बन सकता है। वैसे तो जब प्यास लगे, पानी पीना चाहिए लेकिन व्यायाम या संभोग के तुरंत पश्चात् नहीं पीना चाहिए। इसी प्रकार भोजन के तुरंत बाद, चाय, दूध पीने के तुरंत बाद, शौच के तुरंत बाद, तेज धूप से लौटने के तुरंत बाद तथा पके फल और मेवे खाने के तुरंत बाद पानी का सेवन नहीं करना चाहिए।

    17.1.17

    हाथ-पैर सुन्‍न पड़ जाएं तो अपनाएं ये घरेलू उपचार:home remedies for numb hands and feet

      

    अक्सर जब आप कभी एक ही अवस्था में बैठे रह जाते हैं तो आपके हाथ और पैर सुन्नं पड़ जाते हैं, जिसके कारण आपको कभी कोई भी चीज़ को छूने का एहसास मालूम नहीं पड़ता है। यही नहीं, इसके अलावा आपको प्रभावित स्थान पर दर्द, कमजोरी या ऐठन भी महसूस होती होगी। 
       इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे लगातार हाथों और पैरों पर प्रेशर, किसी ठंडी चीज को बहुत देर तक छूते रहना, तंत्रिका चोट, बहुत अधिक थकान, धूम्रपान, मधुमेह, विटामिन या मैग्नीशियम की कमी आदि। अगर यह समस्या कुछ मिनटों तक रहती है तो परेशानी की बात नहीं है, लेकिन अगर यही कई- कई घंटों तक बनी रहे तो आपको डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता है।  हाथ -पैर का सुन्न हो जाना बड़ा ही कष्टदायक होता है क्योंकि ऐसे में फिर आपका कहीं मन नहीं लगता। पर आप चाहें तो इस समस्या को घरेलू उपचार से ठीक कर सकते हैं।
    गर्म पानी का सेंक-



    सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।

    मसाज सबसे अच्छा ऑप्शन-
    हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगालियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।
    ऑक्सीजन में सुधार करें एक्सरसाइज-
    व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है। 
    मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें
    हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं। 
    हल्दी-



    हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।
    खूब खाएं Vitamin B फूड-
    अगर हाथ-पैरों में जन्न-जन्नाशहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।
    दालचीनी का उपयोग करें-
    दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें। 
    प्रभावित हिस्‍से को ऊपर उठाएं-
    हाथ और पैरों के खराब ब्लड सर्कुलेशन से ऐसा होता है। इसलिए उस प्रभावित हिस्से को ऊपर की ओर उठाइए जिससे वह नॉर्मल हो सके। इससे सुन्न वाला हिस्सा ठीक हो जाएगा। आप अपने प्रभावित हिस्से को तकिए पर ऊंचा कर के भी लेट सकते हैं।

    सावधान,बासी खाना खाने से होते हैं ये नुकसान

       

    व्यस्त दिनचर्या के चलते अधिकांश कामकाजी लोगों के लिए सुबह-शाम ताजा भोजन बनाना संभव नहीं होता इसलिए वह बासी भोजन खाने लगते हैं, जिसके कारण कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं, इसलिए बासी भोजन से बचना जरूरी है। आज कल लोगों में बासी खाना खाने का प्रचलन काफी ज्‍यादा बढ़ गया है। ऐसा ज्‍यादातर ऑफिस जाने वाले लोगों के साथ ही होता है जिनके बार बार-बार खाना बनाने का समय नहीं होता। पर दोस्‍तों, खाना चाहे कितना भी सादा या बेस्‍वाद क्‍यूं ना हो, अगर वह ताजा और गरम है तो वह फ्रिज में रखे खाने से लाख गुना अच्‍छा ही होता है।
    बासी भोजन खाने से कई तरह की बीमारियां होने लगती हैं, इसलिए बासी भोजन से बचना जरूरी है। इसके काराण मोटापा, हृदयरोग, कोलेस्ट्रोल जैसी समस्याओं में बढ़ोतरी हो रही है।
    पनपते हैं बैक्टीरिया
    जब हम ताजा बना खाना खाते है तो बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों का समावेश होने का खतरा कम रहता है। खाने को बनाने के तुरंत बाद फ्रिज में नहीं रखना चाहिए बल्कि कमरे के तापमान के अनुसार होने तक इंतजार करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से सूक्ष्मजीव कई गुणा होकर आपके भोजन खराब होने का कारण बनते हैं।
    दूसरे आहार भी हो जाते हैं दूषित
    फ्रिज में रखा अधिक पुराना भोजन प्रयोग न करें। यह आपके स्वास्थ्य हेतु हानिकारक हो सकता है। बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्मजीवों के साथ आहार फ्रिज में रखने से वह फ्रिज में रखें अन्य आहार को भी दूषित कर सकते हैं। जो आहार आपको लगता है कि आपने सुरक्षित रूप से जमा किया है वह खाद्य पदार्थ खराब होकर बीमारी के विकास की आंशका को बढ़ा सकते हैं।
    बचा हुआ खाना कब तक करें प्रयोग
    तीन से अधिक दिनों के लिए कभी फ्रिज में न रखें। अगर मीट को फ्रिज में रखना है तो इन्हें फ्रिज में कवर करके दूसरे खाने से अलग रखें। अगर आप बचा हुआ खाना खा भी रहें हैं तो इसे पहले लगभग 70 डिग्री सेल्सियम पर ठीक से गर्म कर लें। यूनाइटेड स्टेट्स डिपार्टमेंट ऑफ एग्रीकल्चर के अनुसार, बचे हुए खाने को 3 से 4 दिनों के लिए और फ्रोजन फूड को 3 महीने तक रखा जा सकता है। हालांकि वह उपभोग के लिए सुरक्षित होते हैं लेकिन लंबे समय तक रखने से वह नमी और स्वाद खो देते हैं।
    समाप्त हो जाती है पौष्टिकता
    लंबे समय तक भोजन को फ्रिज में रखने से इनमें पोषक तत्वों की कमी होने लगती है। पोषक तत्वों की हानि के साथ, खाद्य पदार्थ बेकार हो जाते है। इसलिए, बचे हुए खाने को लंबे समय तक स्टोर नहीं किया जाना चाहिए।
    बासी खाना खाने से आपको फूड पाइजनिंग की समस्या हो सकती है। अधिक समय तक रखा हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिये फायदेमंद नहीं होता क्योंकि इसमें स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने वाले बैक्टीरिया उत्पन्न हो जाते है।
    डेयरी प्रोडक्ट
    बासी भोजन में तो बैक्टीरिया पनपते ही हैं, साथ ही साथ डेयरी प्रोडक्ट्स में भी बैक्टीरिया बहुत तेजी से बढ़ते हैं। इसलिए डेयरी प्रोडक्ट्स पाश्चरीकृत होने चाहिये ताकि उनमें बैक्टीरिया न पनप सकें। पाश्चरीकृत दूध और पाश्चरीकृत दूध से ही बने दूध के अन्य उत्पादों का सेवन करना चाहिये। ये आपको नुकसान नहीं पहुंचाएंगे और शरीर के लिये भी पौष्टिक होंगे।
    डायरिया
    फ्रिज में रखा खाना बार बार-बार गरम व ठंडा करने की इस प्रक्रिया के दौरान भोजन में विद्यमान आवश्यक पोषक पदार्थ तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही इनमें हानिकारक जीवाणुओं का समावेश भी हो जाता है। और इस खाने को खाने से आपको डायरिया की समस्या भी हो सकती है।

    15.1.17

    मुंह की बदबू से परेशान है तो अपनाएं ये उपाय : The stench of mouth treatment

       

     भले ही आपने महंगे और अच्छे कपड़े पहन हुए हों और मेकअप भी परफेक्ट हो लेकिन मुंह की दुर्गंध आपकी इस अच्छी-खासी इमेज को मिनटों में बर्बाद कर सकती है.
    अगर आपके मुंह से बदबू आ रही है तो न कोई आपके साथ बैठना पसंद करेगा और न ही बात करना. ऐसी स्थिति में आपका आत्मविश्वास भी डगमगा जाता है. कई बार ये खाने-पीने की वजह से होता है तो कई बार मुंह से जुड़ी कुछ बीमारियों की वजह से. पर अच्छी बात ये है कि इसे दूर करने के कुछ घरेलू और असरदार उपाय हैं. इनके इस्तेमाल से आप मुंह की बदबू को दूर कर सकती हैं और अपने दोस्तों संग एकबार फिर से हंस-बोल सकती हैं:
    मुंह की दुर्गन्ध की बदबू एक ऐसी स्वास्थ समस्या है जो कई लोगों में पाई जाती है कई बार तो लोग इस समस्या से अंजान होते हैं। साँस की दुर्गंध उन बैक्टीरिया से पैदा होती है, जो मुँह में पैदा होते हैं और दुर्गंध पैदा करते हैं। नियमित रूप से ब्रश नहीं करने से मुँह और दांतों के बीच फंसा भोजन बैक्टीरिया पैदा करता है। इस बदबू के कई कारण होते हैं, जैसे-गंदे दांत, पाचन की समस्या आदि
    मुंह की दुर्गन्ध के कारण- 
    *भोजन है मुंह की दुर्गन्ध का कारण – 
    आपके दांतों में और इसके आसपास भोजन के टुकड़ो के फसने कारण मुंह में बैक्टीरिया पनपने लगते है जिस कारण हमारे मुंह से बदबू आने लगती है इसीलिए भोजन करने के बाद अपने मुंह की अच्छी तरह से सफाई करना आवस्यक है|
    ग्रीन टी के इस्तेमाल से
    ग्रीन टी के इस्तेमाल से मुंह की बदबू को कम किया जा सकता है. इसमें एंटीबैक्ट‍िरियल कंपोनेंट होते हैं जिससे दुर्गंध दूर होती है.*निम्बू का रस मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए –
    नींबू रस का प्रयोग मुंह से बदबू को खत्म करने में किया जा रहा है। नींबू के रस में एक चुटकी काला नमक मिलाकर मुंह की सफाई करने से मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा मिलता है|
    अनार की छाल




    अनार के छिलके को पानी में उबालकर उस पानी से कुल्ला करने से मुंह की बदबू दूर हो जाती है.
    *कच्चा अमरुद मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए –
    यह मसूढ़े और दातों के स्वास्थ्य को बढ़ाने में सहायता करता है। यह न केवल मुंह की दुर्गंध को रोकता है बल्कि मसूढ़ों से आने वाले खून को भी रोकता है।
    *इलायची के दाने चबायें पाए मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा –
    अगर आप दुर्गंध सासों से छुटकारा पाना चाहते हैं तो आपको कुछ इलायची बीजों को चबाना चाहिये|.
    *लौंग मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा पाने के लिए – 
     हर भोजन के बाद, आप कुछ लौंग निश्चित रूप से खायें। यह दुर्गंध सासों को रोकने का सबसे प्राकृतिक तरीका है।और असरदार भी.
    . तुलसी की पत्त‍ियां
    तुलसी की पत्ती चबाने से भी मुंह की बदबू दूर हो जाती है. साथ ही मुंह में अगर कोई घाव है तो तुलसी उसके लिए भी फायदेमंद है.
    *भोजन के बाद ब्रश जरूर करे 

    हमेशा भोजन करने के बाद अपने दांतों को टूथ ब्रश से अवस्य करे हमें दिन में दो बार ब्रश करना चाहिए एस करने से मुंह की दुर्गन्ध में रहत मिलती है
    इन सभी उपायो को अपनाकर आप भी अपने मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा प सकते है इसके अलावा आप इन समस्याओं से बचने के लिए कुछ अन्य उपायो को अपना सकते है जैसे भोजन करने के बाद अपने मुंह की अच्छी तरह से सफाई करे दिन में दो बार ब्रश करे आदि|
    सरसों के तेल और नमक से मसाज




    हर रोज दिन में एकबार सरसों के तेल में चुटकीभर नमक मिलाकर मसूड़ों की मसाज करने से मसूड़े स्वस्थ रहते हैं और बदबू पनपने का खतरा भी कम हो जाता है.*दांतों की समस्या के कारण आती है मुँह से दुर्गन्ध –
    यदि आप हर दिन ब्रश और कुल्ला नहीं करते हैं, तो भोजन के टुकड़े आपके मुँह में रह जाते हैं और बैक्टीरिया पैदा करते है जिस कारण मुंह में सड़न होने लगती है यह मुंह की बदबू का एक विषेश कारण है
    *मुँह सूखने के कारण आती है मुँह से दुर्गन्ध – 
     लार से मुँह में नमी रहने और मुँह को साफ रखने में मदद मिलती है। सूखे मुँह में मृत कोशिकाओं का आपकी जीभ, मसूड़े और गालों के नीचे जमाव होता रहता है। ये कोशिकाएं क्षरित होकर दुर्गंध पैदा कर सकती हैं।
    *मुंह की दुर्गन्ध को दूर करे पानी – 
    पानी सांसों को ताज़ा बनाए रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। खाना खाने के बाद, आपको अपने मुँह को साफ करना चाहिए , यह आपके दांतों में अटके भोजन के कणों को सफाई करने पर बाहर निकाल देता है। मुँह की दुर्गंध, भोजन के दौरान पानी पीना भी कई मायनों में सहायता कर सकता है। पानी एक अच्छा उपाय है जो आसानी से बुरी सांसों को निकालता है। खूब पानी पीने मुंह से दुर्गन्ध नहीं आती है.|
    *मुंह की दुर्गन्ध से छुटकारा दिलाए मैथी – 
    एक कप पानी को लेकर इसमें एक चम्मच मेंथी के बीज़ को मिला दें। इस पानी को छानकर दिन में एक बार अवश्य पियें जब तक कि इस समस्या से छुटकारा नहीं मिल जाता है।




    *मुंह की दुर्गन्ध के लिए सौंफ 
    एक छोटी चम्मच सौंफ लेकर इसे धीरे-धीरे चबाये सौंफ में ताज़ा सांस देने का गुण होता है यह मुंह को ताज़गी प्रदान करता है और मुंह की दुर्गंद को दूर करता है
    अमरूद की पत्तियां
    अमरूद की कोमल पत्त‍ियों को चबाने से भी मुंह की दुर्गंध पलभर में दूर हो जाती है.
    *दालचीनी करे मुंह की दुर्गन्ध को दूर – 
    एक चम्मच दालचीनी पाउडर को लेकर एक कप पानी में उबालें। इसमें कुछ इलायची और तेजपत्ते की पत्तियों को भी मिला सकते हैं। इस मिश्रण को छान लें और इससे अपने मुंह को साफ करें जिससे कि आपकी सांसे ताजा रहेंगी।

    14.1.17

    हरी सब्जियों के गुण,स्वास्थ लाभ HEALTH BENEFITS OF GREEN VEGETABLES

       शरीर को फिट रखने के लिए हरी सब्जियां बहुत ही फायदेमंद होती है. हरी पत्तीदार सब्जियों में कैल्शियम, बीटा कैरोटिन एवं विटामिन सी भी काफी मात्रा में पाये जाते हैं. हरी सब्जियों के सेवन से शरीर का उचित विकास होता है साथ ही त्वचा जवां और खूब सूरत बनी रहती है| अधिकतर लोगो को हरी सब्जी खाना पसंद नहीं होता |हरी सब्जी को देखते ही कुछ लोग खाना तक नहीं खाते लेकिन हरी सब्जी हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही फायदेमंद होती है| पत्तेदार हरी साग सब्जियां हमारे शरीर को स्वस्थ बनाए रखती हैं साथ ही इनके सेवन से शरीर ऊर्जावान बना रहता है| हरी सब्जियों में बहुत से न्‍यूट्रीशंस पाए जाते हैं जिनकी हमारे शरीर को बहुत ही आवश्यकता होती है| भारत में कई प्रकार की हरी सब्जियों को प्रयोग में लाया जाता है| इनमे से कुछ हैं पालक, तोटाकुरा, गोंगुरा, मेथी, सहजन की पत्तियाँ और पुदिना आदि. हरी सब्जियों को अधिक देर तक पकाने से उनके पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं इसलिए हरी सब्जियों को अधिक नहीं पकाना चाहिए| पत्तेवाली सब्जियां लौहयुक्त होती हैं| आयरन की कमी से एनीमिया जैसी बीमारी हो सकती है|इसके अलावा हरी सब्जियों के सेवन से हम कई अन्य रोगी से भी अपने शरीर को मुक्त कर सकते हैं| हरी सब्जियों के लाभदायक गुण -





    हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाने में सहायक है हरी सब्जियां-
    शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा बढ़ाने के लिए हरी सब्जियों बहुत ही लाभदायक होती हैं. इनमे अनेक प्रकार के विटामिन पाए जाते हैं जो हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा को बढ़ाने में सहायक होते हैं. इसलिए रोजाना हरी सब्जियों का करना चाहिए| 
    आँखों की रौशनी बढ़ने में सहायक है हरी सब्जियां 
     हरी सब्जियों में भरपूर मात्रा में विटामिन ए व् अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं जो हमारी आँखों के लिए बहुत ही फयदेमंद होते हैं. रोजाना हरी सब्जियों को अपने आहार में शामिल करें. इससे हमारे शरीर के साथ-साथ हमारी आँखे भी स्वस्थ रहती हैं|
    हड्डियों को मजबूत करने में सहायक हरी सब्जियां  –





    हरी सब्जियों में लोह तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं जो हड्डियों तथा दांतों को स्वस्थ रखने में काफी सहायक होते इसलिए रोजाना अपने आहार में हरी सब्जियों को शामिल करें. इनसे शरीर तो स्वस्थ रहेगा साथ ही हड्डिया भी मजबूत बनी रहेंगी.
    गुर्दे की पथरी समाप्त  करने के लिए हरी सब्जियों का प्रयोग –
     हरी सब्जियों के सेवन से गुर्दे की पथरी का भी उपचार आसानी से किया जा सकता है. रोजाना हरी सब्जी के सेवन से गुर्दे में यूरिक एसिड एकत्रित नहीं होता और पथरी का भय नहीं रहता |
    एनीमिया की समस्या से राहत पाने के लिए हरी सब्जी –
     शरीर में आयरन की कमी से एनीमिया रोग होने की सम्भावना रहती है. रोजाना हरी सब्जियों के सेवन से शरीर में भरपूर मात्रा में आयरन पहुंच जाता है. जिससे एनीमिया की समस्या का खतरा नहीं रहता|
    रक्तचाप नियत्रित रखने में सहायक है हरी सब्जियां  –
     हरी सब्जी का सेवन हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही लाभदायक होता है. रोजाना हरी सब्जियों के सेवन से रक्तचाप नियत्रित रहता है और शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है|

    13.1.17

    वसंत ऋतु में आहार-विहार: Diet in the spring season

        

       मित्रों,आप हर मौसम में हरकुछ नहीं खा सकते। मौसम के हिसाब से खानेपीने के कुछ कायदे होते हैं। आर्युवेद के इन कायदों को तोड़ने वालों को रोगों की शक्‍ल में सजा मिलती है। हिन्‍दू कैलेंडर के हिसाब से15 मार्च से 15 मई का वक्‍त वसंत ऋतु का होता है। 
    वसंत ऋतु का शरीर  पर क्‍या असर पड़ता है?
       यह वक्‍त गर्मी और सर्दी के बीच का होता है इसलिए ठंड और गर्मी दोनों का इफेक्‍ट होता है। दिन में गर्मी और रात को ठंडक होती है। इस मौसम में कफ दोष बॉडी पर और हावी होने लगता है। वजह ये है कि इससे पहले वाले मौसम यानी शिशिर ऋतु में बॉडी में जमा कफ अब गर्मी होने पर पिघल जाता है। इससे खासतौर पर पचाने की ताकत पर असर पड़ता है। साफ तौर पर कहें तो खाने को पचाने वाली आग जिसे जठराग्‍नि कहते हैं, कमजोर पड़ जाती है। एक तो वैसे ही इस मौसम में कफ का असर ज्‍यादा होता है उसमें अगर आपने कफ बढ़ाने वाली चीजें थोड़ी बहुत भी खा लीं तो समझें टांसिल्‍स, खांसी, गले में खराश, जुकाम, सर्दी और कफ व बुखार का हमला हो सकता है।
       वसंत ऋतु में कफ की समस्या अधिक रहती है। अतः इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूं, चावल, मूंग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियां, केला खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी, आंवला आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करें|
       



    वसंत ऋतु में आयुर्वेद ने खान-पान में संयम की बात कहकर व्यक्ति एवं समाज की निरोगता का ध्यान रखा है। वसंत ऋतु दरअसल शीत और ग्रीष्म का संधिकाल होती है। संधि का समय होने से वसंत ऋतु में थोड़ा-थोड़ा असर दोनों ऋतुओं का होता है। प्रकृति ने यह व्यवस्था इसलिए की है ताकि प्राणीजगत शीतकाल को छोड़ने और वसंत ऋतु में कफ की समस्या अधिक रहती है। अतः इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूं, चावल, मूंग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियां, केला खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी, आंवला आदि कफनाशक पदार्थों का सेवन करें। इसके अलावा मूंग बनाकर खाना भी उत्तम है।
        नागरमोथा अथवा सोंठ डालकर उबाला हुआ पानी पीने से कफ का नाश होता है। मन प्रसन्न रखें एवं जो हृदय के लिए हितकारी हों ऐसे आसव अरिष्ट जैसे कि मध्वारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, गन्ने का रस, सिरका आदि पीना लाभदायक है।
       इस ऋतु में कड़वे नीम में नई कोंपलें फूटती हैं। नीम की 15-20 कोंपलें, 2-3 काली मिर्च के साथ चबा-चबाकर खानी चाहिए। 15-20 दिन यह प्रयोग करने से वर्ष भर चर्म रोग, रक्त विकार और ज्वर आदि रोगों से रक्षा करने की प्रतिरोधक शक्ति पैदा होती है एवं आरोग्यता की रक्षा होती है। इसके अलावा कड़वे नीम के फूलों का रस 7 से 15 दिन तक पीने से त्वचा के रोग एवं मलेरिया जैसे ज्वर से भी बचाव होता है।
       धार्मिक ग्रंथों के वर्णनानुसार चैत्र मास के दौरान अलौने व्रत याने बिना नमक के व्रत करने से रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है एवं त्वचा के रोग, हृदय के रोग, उच्च रक्तचाप( हाई बीपी), गुर्दा, किडनी आदि के रोग नहीं होते।
       वसंत ऋतु में दही का सेवन न करें क्योंकि वसंत ऋतु में कफ का स्वाभाविक प्रकोप होता है एवं दही कफ को बढ़ाता है। अतः कफ रोग से व्यक्ति ग्रसित हो जाते हैं।




    वसंत के मौसम में क्‍या नहीं खाना चाहिए
       वसंत में फैटी, खट्टे, मीठे और पेट के लिए भारी चीजें नहीं खानी चाहिए। तली और मसालेदार चीजें कम से कम खाएं। दिन में सोना बंद कर दें ऐसा करने से कफ दोष भड़क जाएगा। रात को ज्‍यादा देर तक नहीं जागना चाहिए इससे वायु दोष बढ़ जाता है।
    सुबह देर तक सोने से मल सूख जाता है, भूख्‍ देर से लगती है और चेहरे व आंखों की चमक कम हो जाती है। इसलिए इस मौसम में जल्‍दी सोएं और जल्‍दी उठें।
       शीत एवं वसंत ऋतु में श्वास, जुकाम, खांसी आदि जैसे कफजन्य रोग उत्पन्न होते हैं। उन रोगों में हल्दी का प्रयोग उत्तम होता है। हल्दी शरीर की व्याधि रोधक क्षमता को बढ़ाती है जिससे शरीर रोगों से लड़ने में सक्षम होता है।
      चौथाई चम्मच हरड़ का चूर्ण शहद में मिलाकर चाटें तो वसंत ऋतु में होने वाले बलगम, ज्वर, खांसी आदि नष्ट हो जाते हैं। मौसम के अनुसार भोजन हमारे शरीर और मन दोनों के लिए हितकारी होता है। मौसम के अनुसार भोजन में परिवर्तन करके आहार लेने वाले लोग हर समय स्वस्थ और प्रसन्नचित रहते हैं।
       इस मौसम में स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए रोज एक्‍सरसाइज करें। टहलें, मालिश करें और अगर मौसम में ठंडक है तो गुनगुने पानी से नहा सकते हैं। गर्म पानी से मूत्राशय और मलाशय की अच्‍छे से सफाई करनी चाहिए। नहाने के बाद बदन पर कपूर, चंदन, अगरू, कुमकुम जैसी खुश्‍बू वाली चीजों का लेप लगा सकते हैं। चाहें तो शाम के वक्‍त दोबारा नहा सकते हैं। ढीले और सूती कपड़े पहनें। 

    8.1.17

    कद की लंबाई बढ़ाने के लिए घरेलू उपचार :How To Increase Your Height:



    व्यक्तित्व को निखारने में हाइट का महत्वपूर्ण योगदान होता हैं जिनकी हाइट कम होती है वे अपनी हाइट को थोडा और बढ़ाना चाहते हैं। हाइट की कमी से आत्मविश्वास में भी कमी देखी जाती है। पुलिस, मॉडलिंग तथा सैन्य जैसी सेवाओं में अच्छी हाइट का होना जरुरी हैं। कई बार यह माना जाता है की लम्बाई एक निश्चित उम्र तक ही बढ़ सकती हैं या माता-पिता की हाइट के अनुसार ही बच्चों की लम्बाई होगी किन्तु यदि संतुलित एवं पौष्टिक आहार,व्यायाम एवं योग का नियमित अभ्यास तथा जीवन शैली में सही आदतें अपनाई जायें तो हम अधिकतम संभव हाइट को प्राप्त कर सकते हैं।
    सूखी नागौरी अश्वगंधा की जड़ को कूटकर चूर्ण बना लें और इसमें उतनी ही मात्रा में खांड मिलाकर कांच की शीशी में रखें। इसे रात को सोने से पहले गाय के दूध (दो चम्मच) के साथ लें। ये लम्बाई और मोटापा बढ़ाने में फायदेमंद होता है साथ ही इससे नया नाखून भी बनना शुरू होता है। इस चूर्ण को लगातार 40 दिन खाएं। सर्दियों में ये ज्यादा फायदेमंद होता है।



    नोट- इस चूर्ण का सेवन करते समय खटाई, तली चीजें न खायें और जिन्हें आंव की शिकायत हो, तो अश्वगंधा न लें। अगर आप ये चूर्ण नहीं खा पा रहे हैं, तो सुबह सुबह ताड़ासन करें।
    ताड़ासन करने के लिए दोनों हाथ उपर करके सीधे खड़े हो जायें, लम्बी श्वास लें, हाथ ऊपर धीरे-धीरे उठाते जायें, ध्यान रहे कि साथ-साथ पैर की एड़ियां भी उठती रहें। पूरी एड़ी उठाने के बाद शरीर को पूरी तरह से तान दें और लम्बी श्वास लें। ऐसा करने से स्नायु सक्रिय होकर विस्तृत होते हैं और यह कद बढ़ाने में सहायक साबित होता है।
    1- 2 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण, 1- 2 ग्राम काले तिल, 3 से 5 खजूर को 5 से 20 ग्राम गाय के घी में एक महीने तक खाने से शरीर बढ़ने में लाभ होता है। साथ में पादपश्चिमोत्तानासन, पुल्ल-अप्स करने से एवं हाथ से शरीर झुलाने से ऊँचाई बढ़ती है। व्यायाम के अलावा भोजन में प्रोटीन, कैल्शियम तथा विटामिनों की जरूरत बहुत आवश्यक है तथा पौष्टिक भोजन करने से लम्बाई बढ़ने में फायदा मिलता है।
    शरीर की सही ग्रोथ एवं लम्बाई के लिए संतुलित एवंम पौष्टिक भोजन बहुत जरुरी हैं। लम्बाई बढ़ाने के लिए आहार के इन नियमो का पालन करें
    *हाइट बढाने के लिए कैल्शियम, जिंक, फोस्फोरस, मैग्नीशियम जैसे खनिज लवणों का नियमित सेवन जरुरी है। खनिज लवण हरी सब्जियों, ड्राई फ्रूट्स, फल, दही, छाछ आदि में भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
    *नित्य व्यायाम एवं भ्रमण की आदत डालें
    नियमित रूप से सुबह 15–20 मिनट walk पर जाना तथा व्यायाम करना मधुमेह, उच्च रक्त चाप, ह्रदय रोग, कोलेस्ट्रोल जैसी अनेक बीमारियों से बचाव रखने में उपयोगी साबित होता है। साथ ही शरीर की ग्रोथ तथा हाइट बढ़ाने में भी लाभदायक है।रपूर प्रोटीन लें
    *लम्बाई बढाने के लिए प्रोटीन से भरपूर भोजन लेना जरुरी हैं। प्रोटीन मांस, मछली, सोयाबीन, मूंगफली, दालों आदि में प्रचुर मात्रा मे पाया जाता है।
    नित्य व्यायाम एवं भ्रमण की आदत डालें
    *नियमित रूप से सुबह 15–20 मिनट walk पर जाना तथा व्यायाम करना मधुमेह, उच्च *रक्त चाप, ह्रदय रोग, कोलेस्ट्रोल जैसी अनेक बीमारियों से बचाव रखने में उपयोगी साबित होता है। साथ ही शरीर की ग्रोथ तथा हाइट बढ़ाने में भी लाभदायक है।



    भरपूर विटामिन लें
    *शरीर के सही विकास एवं अच्छी हाइट के लिए आहार में संतुलित मात्रा में विटामिन ए, बी, सी, डी तथा अन्य विटामिन का होना बहुत जरुरी है। इसके लिए दूध, दही, अंकुरित अनाज, फल, सब्जियाँ आदि का नियमित सेवन करें।
    *रस्सी कूदें
    रस्सी कूदना न सिर्फ वजन को नियंत्रित करता हैं। बल्कि हाइट को बढ़ाने हेतु भी बहुत उपयोगी व्यायाम माना जाता है। पाँव,कमर तथा पीठ की मांसपेशियाँ मजबूत बनती हैं। मेरुदंड में खिचाव होता है जिससे लम्बाई बढ़ने में सहायता मिलती है।
    *तैराकी करें
    तैराकी ना सिर्फ मनोरंजन का साधन है बल्कि सम्पूर्ण शरीर का बेहतरीन व्यायाम है। इससे पूरे शरीर का रक्त संचार बढ़ता है। सम्पूर्ण शरीर की मांशपेशियों में खिचाव होता है। तनाव का स्तर कम होता है। भूख बढती है खाया पीया सही से हजम हो जाता है। लम्बाई बढ़ने में स्विमिंग से काफी सहायता मिलती
     *लटकने की एक्सरसाइज करें
    इसके लिए लोहे का पाइप या लकड़ी का डंडा जमीन से लगभग 7 फिट ऊपर बांधा जाता है।आप पेड़ की मोटी डाल या घर में मौजूद कोई लटकने लायक हिस्सा भी काम में ले सकते हैं। नियमित रूप से लटकने की एक्सरसाइज करने से रीड की हड्डी, पेट, छाती, पाँव की मांशपेशियों की अच्छी एक्सरसाइज होती हैं। हाइट बढ़ाने हेतु यह बहुत उपयोगी एक्सरसाइज है। इसका नित्य अभ्यास करना चाहिए।



    3.1.17

    मधुमेह (डायबीटीज़) रोगी का आहार और उपचार: Diabetes patient's diet and treatment

    डायबिटीज ब्‍लड में शुगर का स्‍तर बढ़ने से होने वाली बीमारी है, भारत ही नहीं पूरी दुनिया में इसके मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसके लिए सबसे अधिक जिम्‍मेदार अस्‍वस्‍थ लाइफस्‍टाइल है, इसलिए डायबिटीज को समझना बहुत जरूरी है, डायबिटीज को समझकर आप इसका पता जल्‍दी चल सकता है। मधुमेह के शुरुआती लक्षण, डायबिटीज और लाइफस्‍टाइल, डायबिटीज के प्रकार, टाइप1 और टाइप2 डायबिटीज, बच्‍चों में डायबिटीज, बच्‍चों में डायबिटीज के लक्षण, ब्लड शुगर और सावधानियां, मधुमेह में ब्‍लड शुगर पर नियंत्रण, डायबिटीज से नींद पर प्रभाव, टाइप1 डायबिटीज़ और टाइप 2 डायबिटीज़ में अंतर, डायबिटीज़ के अतिरिक्त प्रभाव, डायबिटीज में खान-पान, किशोरावस्‍था और मधुमेह, मधुमेह से थकान, इंसुलिन का प्रयोग, इंसुलिन का कार्य, आदि के बारे में समझकर आप असानी से मधुमेह की स्थिति को का अंदाजा लगा सकते हैं। 
      मधुमेह के रोगियों के लिए अपने भोजन पर नियंत्रण रखना अत्यंत आश्यक है। कई बार इन्सुलिन लेने वाले मधुमेह के रोगियों को जो भोजन तालिका चिकित्सा द्वारा बतायी जाती है उसमें चाय एवं काफी का भी उल्लेख होता है। उन्हें सिर्फ क्रीम और शर्करा न लेने के लिए कहा जाता है। चाय और काफी का प्रयोग मधुमेह से ग्रस्त किसी भी व्यक्ति के लिए न करना ही श्रेयस्कर है, चाहे वह इन्सुलिन पर निर्भर हो अथवा नहीं। ये पदार्थ अच्छे स्वास्थ के निर्माण में सहायक नहीं होते हैं। ऐसे रोगियों को कई बार चिकित्सकों द्वारा डबलरोटी, अचार, अंडे आदि लेने की सलाह भी दी जाती है पर हमें यह ध्यान रखना चाहिए की ये पदार्थ मधुमेह के रोगी के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थों की श्रेणी में नहीं आते हैं।
    मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को किसी भी वस्तु से अधिक ताजी, हरी सब्जियों की आवश्यकता होती है । प्रत्येक भोजन के साथ सलाद प्रचुर मात्रा में लिया जाना चाहिए । जब हम आधिक मात्रा में फल एवं सब्जियां लेते हैं तो शरीर में अधिक पानी पहूंचता है । यह गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र के लिए आवश्यक है । मधुमेह की स्थिति में हमें अपने गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र को अच्छी हालत में रखना चाहिए क्योंकी यह रोग गुर्दों पर एक प्रकार का तनाव डालता है । मधुमेह के रोगियों को मिठाई, चाय. काफी, मादक द्रव्यों तथा ध्रूमपान आदि को तुरंत बंद कर देने का प्रयास करना चाहिए । चर्बी और शर्करा दोनों में कमी आने से आश्चर्य और उत्साहवर्धक परिणाम सामने आते हैं ।
    आहार संतुलित हो जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा आदि प्रदान करने वाले तत्व आवश्यक मात्रा में हों ।शरीर के लिए आवश्यक विटामिन, खनिज लवण तथा फाइबर आदि पर्याप्त मात्रा में होना
    मधुमेह की जटिलताएँ उत्पन्न होने पर उनका नियमन किया जाना जरूरी है|
    रोगी का आहार विविधता पूर्ण हो ताकि वह अच्छी तरह से ग्रहण किया जा सके । आहार नियंत्रण के नाम पर कड़वी चीजें खाते- खाते कई बार रोगियों को इससे अरूचि हो जाती है  , अत: आहार निर्धारण में रोगियों की रुचि का ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक हैं ।
    मधुमेह समृद्धता का रोग है । अति भोजन तथा मोटापे के कारण मधुमेह के प्रत्येक चार में से तीन रोगियों का वजन अधिक होता है । इसलिए ऐसे रोगियों को केवल चीनी एवं परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट ही नहीं बल्कि अति प्रोटीन एवं चिकनाई से भी बचना चाहिए ।
    मधुमेह के रोगी का सर्वोत्तम आहार प्राकृतिक खाद्य, अंकुरित, अन्नकण, फल एवं हरी सब्जी है । यह क्षारीय आहार है । पूर्ण अन्न, कूटू एवं हरी सोया, मेथी अत्यंत लाभप्रद हैं । फलों में संतरा जामुन, अनानास, आवंला, सेब तथा पपीता आदि लिए जा सकते हैं । मट्ठा विशेष रूप से उपयोगी है ।
    आहार में कम से कम 90 प्रतिशत अपक्वाहार होना ही चाहिए । अपक्वाहार से अग्नाशय ग्रन्थि उद्दीप्त होकर इन्सुलिन उत्पन्न करती है ।  एक बार में अधिक भोजन करने की अपेक्षा चार बार थोड़ा-थोड़ा खाना उचित  है । मधुमेह में प्रोटीन एवं चिकनाई का चयापचय मंद होने से अम्लता बढती है । अत: क्षारीय भोजन उपयुर्क्त है । लहसून से रक्त शर्करा घटती है । 
    मधुमेह के रोगियों को अजवाइन, सोया, मेथी तथा गाजर की पत्ती का रस दिया जा सकता है । खट्टे फल, लौकी, खीरा, एवं ककड़ी अग्नाशय ग्रंथि को उन्नत करते हैं । प्याज एवं लहसून का रस उपयोगी है अत: इनका रस अन्य सब्जीयों के रस में मिलाना चाहिए ।




    फ्रेंचबीन, मकोय की पत्ती, बेल की पत्ती, करेला, चौलाई, सोया, मेथी, जामुन की पत्ती आदि लेना चाहिए। संतरे का छ्लिका बहूत ही उपयोगी है। सुबह, दोपहर एवं शाम को दिन में तीन बार इसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए ।
    रोजाना बेल की पत्तीयों का रस 25 से 50 मि. ली. लेना चाहिए । करेला एवं कूंदरू की पत्ती का रस भी 20 मि. ली. लिया जा सकता है। मधुमेह में नेत्र ज्योति घटती है अत: विटामिन ए, बी काम्प्लेक्स तथा विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में लेना चाहिए ।
    शहद एवं कई फल जैसे अंजीर आदि तथा कुछ सब्जियाँ जैसे गाजर एवं चुकन्दर आदि में फ्रक्टोज शर्करा होती है जिसे फल शर्करा का नाम से भी जाना जाता है। फ्रक्टोज शर्करा मधुमेह से ग्रस्त लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है ।
    दैनिक आहार का नमूना चार्ट
    लगभग 1500 कैलोरी उपलब्ध कराने वाले आहार की नमूना तालिका इस प्रकार बनाया जा सकता है :-
    प्रात: काल- एक गिलास गूनगूने पानी में आधा निम्बू निचोड़ कर लें या मेथी आथवा आंवले का पानी लें ।
    नाश्ता (8 बजे ) – एक कटोरी दही या अंकुरित मूंग एवं मेथी या एक गिलास छाछ ।
    भोजन (11 से 12 बजे) – गेहूं, जौ, चना एवं मेथी को मिला कर उस आटे की रोटियाँ2, उबली हुई सब्जी, सलाद, अंकुरित मूंग की दाल या एक कटोरी दही, आंवले की चटनी ।
    सांयकाल (4 बजे) – (प्रात: काल की तरह) – सब्जी का सूप या भुने हुए चने या नींबू एवं पानी
    भोजन (7 बजे) – रोटी. सब्जी एवं सलाद (दोपहर की तरह) यह एक नमूना चार्ट है । रोगी के रक्त में शर्करा की स्थिति को देखते हुए तथा चिकित्सक के निर्देशानुसार इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जा सकते है ।
    धनिया, जीरा, काली मिर्च, नींबू तथा आँवला जैसे पदार्थों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट एवं रूचिकर बनाने में किया जा सकता है ।
    आहार में ‘फाइबर’ की उपयोगिता
    फाइबर का अर्थ है – मोटे रेशेदार पदार्थ । मधुमेह के रोगी के आहार में ‘फाइबर’ की मात्रा अधिक होनी चाहिए । ये भोजन के बाद रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ने नहीं देते । ये कब्ज को दूर करते हैं तथा रक्त में ट्राईग्लिसराइड्स तथा कोलेस्ट्रोल के स्तर को भी कम करते हैं । ये वजन कम करने में भी सहायता पहुंचाते हैं । हरी पत्ती वाली सब्जियाँ, मेथी तथा चोकर आदि से फाइबर की पूर्ति की जा सकती है । आधुनिक अध्ययनों ने भी इस बात को प्रादर्शित किया है ।




    हर व्यक्ति को कम से कम रोजाना 37 ग्राम फाइबर जरूर अपने भोजन में शामिल करना चाहिए। वैसे आम आदमी के भोजन में 15 से 20 ग्राम फाइबर शामिल रहता है। इसे 10 ग्राम और बढ़ा दें तो दिल की बीमारी से बचा जा सकता है ।
    स्टार्च युक्त चीजें रक्त में पहुँच कर धीरे-धीरे चीनी बनाती हैं । अत: आलू, शकरकंद आदि कम खानी चाहिए। अगर आप आलू खाना ही चाहते हैं तो आप मटर आलू कभी न खाएँ, क्योंकी ये स्टार्च पैदा करेंगे । आलू खाना हो तो आलू मेथी, आलू पालक आदि खाये जा सकते हैं। स्टार्च मानव शरीर में प्रवेश करके पहले मेटबालिक सिंड्रोम पैदा कराता है जो दिल को सेहत मंद रखने के लिए जरूरी है की आप रोजाना तीन फल खाएँ।
    मेथी मधुमेह को नियंत्रित करती है
    नवीन अनुसंधानों ने मधुमेह के नियंत्रण में मेथी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है । प्राचीन समय से ही हमारे रसोईघरों में मेथी का प्रयोग कई रूपों में होता रहा हैं । मेथी के बीजों में काफी मात्रा में फाइबर होता है । इसमें ट्राईगोनेलीन नामक एक एल्केलाएंड भी पाया गया है । जिसका कार्य रक्त में शर्करा के स्तर को कम करना है । मेथी का प्रयोग मधुमेह के दोनों वर्गो, इंसुलिन पर निर्भर एवं इंसुलिन पर अनिर्भर में किया जा सकता है । यह रक्त में कोलेस्ट्रोल एवं ट्राईग्लिसराईडस के स्तर को भी कम करने में मदद करती है ।
    औषधीय गुणों से भरपूर मेथी की पत्तियों में ट्राईगोथीन होता है । इसके सब्जी यकृत, हृदय और मस्तिष्क संबंधी विकारों के लिए एक उत्तम औषधि माना जाता है । मधुमेह की प्रारंभिक आवस्था में मेथी की ताज़ी पत्तियों का रस प्रात: काल नियमित रूप से तीन महीने तक लिया जाय |





    मधुमेह के रोगी दाना मेथी को कई प्रकार का सेवन किस प्रकार से करना चाहिए ?
    दाना मेथी को अंकुरित करके
    दाना मेथी को पीसकर उसका पाउडर बनाकर
    दाना मेथी को उबालकर उसका क्वाथ बनाकर

    दाना मेथी को भिगोकर उसका पानी पीकर
    प्रकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में मेथी को अंकुरित करके प्रयोग में लाया जाता है । यह अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक है । मेथी के अंकुर अत्यंत पुष्ट एवं आकर्षक होते हैं । इतना ही नहीं अंकुरित होने के पश्चात् मेथी की कडुवाहट भी काफी हद तक कम हो जाती है । सकता है ।
    मधुमेह के रोगियों को जामुन, करेला, नीम तथा बेलपत्र आदि के प्रयोग की सलाह भी दी जाती है । ये मधुमेह के नियंत्रण में मदद करती हैं।
    नींबू का रस ताजे पानी में निचोड़कर दिन में एक दो बार पीना चाहिए । ताजे आंवले का रस रोज लेना इस रोग इस रोग में अत्यंत लाभकारी पाया गया है । जामुन का थोड़ा-थोड़ा रस दिन में चार बार पीना भी इस रोग में हितकारी माना जाता है । ताजे बेल पत्रों को पीसकर उनका 10 मिली रस या करेले का आधा कप रस प्रात: उठने पर लेना चाहिए ।
    औषिधीय गुणों से भरपूर करेले का प्रयोग मधुमेह के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक माना जाता है । ‘ रस पीओ कायाकल्प करो’ पुस्तक के लेखक कांति भट्ट और मनहर डी.शाह ने मधुमेह के रोगियों को गाजर, पालक, गोभी, नारियल, सेलेरी तथा करेले का रस लेने का परामर्श दिया है ।
    मेथी – मेथी के बीज रक्त में चीनी की मात्रा कम करते हैं, इन्सुलिन का स्तर भी घटाते खराब कोलेस्ट्रोल कम करते हैं और अच्छा बढ़ाते हैं ।
    एलोवेरा – एलोवेरा की पत्तियों के अंदर का रस प्रभावशाली है ।
    ग्रीन टी – इसमें कुछ तत्व बुनियादी और इन्सुलिन आधारित ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं ।
    लहसुन – ग्लूकोज का स्तर कम करता है, फ्री इन्सुलिन की मात्रा बढ़ाता है ।
    दालचीनी- इन्सुलिन के प्रभाव को तिगुना कर देती है ।
    कोको – इसमें फ्लेवेनाएडस होते हैं जो शरीर में चीनी का उपापचय बढ़ा देते हैं ।
    करेला – शरीर में ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं, रक्त में ग्लूकोज का बनना कम करता है, करेले का रस या इसके बीज उपयोगी है ।


    2.1.17

    आलू के नायाब फायदे:Benefits of potato


        आलू पौष्टिक तत्वों से भरपूर होता है। इसका मुख्य पौष्टिक तत्व स्टार्च होता है। इसमें कुछ मात्रा उच्च जैविक मान वाले प्रोटीन की भी होती है। आलू क्षारीय होता है, इसलिए यह शरीर में क्षारों की मात्रा बढ़ाने या उसे बरकरार रखने में बहुत सहायक होता है। यह शरीर में ऐसीडोसिस भी नहीं होने देता। आलू में सोडा, पोटाश और विटामिन 'ए' तथा 'डी' भी पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं।   आलू का सबसे अधिक महत्वपूर्ण पौष्टिक तत्व विटामिन सी है। योरप में जब से आलू का प्रयोग व्यापक होता गया है, तब से स्कर्वी नामक रोग की घटनाएँ बहुत कम देखने में आती हैं।

    आलू के पौष्टिक तत्वों का लाभ लेने के लिए इसे हमेशा छिलके समेत पकाना चाहिए क्योंकि आलू का सबसे अधिक पौष्टिक भाग छिलके के एकदम नीचे होता है, जो प्रोटीन और खनिज से भरपूर होता है। आलू को उबाला, भूना या अन्य सब्जियों के साथ पकाया जाता है, इसलिए इसके पौष्टिक तत्व आसानी से हजम हो जाते हैं।




    शरीर उन्हें दो से तीन घंटों में आसानी से सोख लेता है। आलू का रस निकालने के लिए जूसर का प्रयोग किया जा सकता है|
    * उच्च रक्तचाप के रोगी आलू खाएँ तो रक्तचाप को सामान्य बनाने में लाभ करता है।
    * आलू को पीसकर त्वचा पर मलें। रंग गोरा हो जाएगा।
    * कच्चा आलू पत्थर पर घिसकर सुबह-शाम काजल की तरह लगाने से 5 से 6 वर्ष पुराना जाला और 4 वर्ष तक का फूला 3 मास में साफ हो जाता है।
    * आलू का रस दूध पीते बच्चों और बड़े बच्चों को पिलाने से वे मोटे-ताजे हो जाते हैं। आलू के रस में मधु मिलाकर भी पिला सकते हैं।
    रक्तपित्त बीमारी में कच्चा आलू बहुत फायदा करता है।
    * कभी-कभी चोट लगने पर नील पड़ जाती है। नील पड़ी जगह पर कच्चा आलू पीसकर लगाएँ ।
    * शरीर पर कहीं जल गया हो, तेज धूप से त्वचा झुलस गई हो, त्वचा पर झुर्रियां हों या कोई त्वचा रोग हो तो कच्चे आलू का रस निकालकर लगाने से फायदा होता है।




    * भुना हुआ आलू पुरानी कब्ज और अंतड़ियों की सड़ांध दूर करता है। आलू में पोटेशियम साल्ट होता है जो अम्लपित्त को रोकता है।
    * चार आलू सेंक लें और फिर उनका छिलका उतार कर नमक, मिर्च डालकर नित्य खाएँ। इससे गठिया ठीक हो जाता है।
    * गठिया में केवल आलू खाते रहने पर बहुत लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर और बार-बार अधिक पानी पिलाते रहने से गुर्दे की पथरियाँ और रेत आसानी से निकल जाती हैं।
    * आलुओं में मुर्गी के चूजों जितना प्रोटीन होता है, सूखे आलू में 8.5 प्रतिशत प्रोटीन होता है। आलू का प्रोटीन बूढ़ों के लिए बहुत ही शक्ति देने वाला और बुढ़ापे की कमजोरी दूर करने वाला होता है।