26.2.16

बढ़े हुए थायरायड की सरल चिकित्सा





थायराइड क्‍या है?
थायराइड शरीर का एक प्रमुख एंडोक्राइन ग्लैंड है जो तितली के आकार का होता है एवं गले में स्थित है। इसमें से थायराइड हार्मोन का स्राव होता है जो हमारे मेटाबालिज्म की दर को संतुलित करता है। थायराइड ग्लैंड्स शरीर से आयोडीन लेकर इन्हें बनाते हैं। यह हार्मोन मेटाबॉलिज्म को बनाए रखने के लिए जरूरी होती हैं। थायराइड हार्मोन का स्राव जब असंतुलित हो जाता है तो शरीर की समस्त भीतरी कार्यप्रणालियां अव्यवस्थित हो जाती हैं। थायराइड दो प्रकार का होता है, पहला हाइपोथायराइड एवं दूसरा हायपरथायराइड।




थायराइडिज्म में यह ग्रंथि ज्यादा प्रभावी होती है और थायराइड हार्मोन (थायरॉक्सिन) ज्यादा पैदा करती है.थायरायड भी डायबिटीज की तरह मुश्किल से काबू आने वाली बीमारी है | थायराइड हार्मोन पैदा करने वाली एक ग्रंथि है जो गर्दन के पीछे होती है. थायराइड ग्रंथि थायराइड हार्मोन पैदा करती है. यह हारमोन शरीर की हर कोशिका, हर अंग और हर ऊतक पर प्रभाव डालता है. हार्मोन ग्रंथि शरीर का तापमान, शरीर का वजन, हार्ट रेट, पाचन क्रिया,ऊर्जा सबको नियंत्रित करती है. हालांकि यह बहुत छोटी होती है लेकिन इसका बेहतर कार्य हमारे स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है. थायराइड रोग मे या तो थायराइड हार्मोन अधिक बनता है जिसे हाइपर-थायराइडिज्म कहा जाता है या कम हो जाता है जिसे हाइपो-थायराइडिज्म कहा जाता है|

हाइपोथायराइड –
इसमें थायराइड ग्लैंड सक्रिय नहीं होता जिससे शरीर में आवश्यकतानुसार टी.थ्री व टी. फोर हार्मोन नहीं पहुंच पाता है। इस स्थिति में वजन में अचानक वृद्धि हो जाती है। सुस्ती महसूस होती है। रोजाना की गतिविधियों में रूचि कम हो जाती है। शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम़जोर हो जाती है। पैरों में सूजन व ऐंठन की शिकायत होती है। चलने में दिक्कत होती है। ठंड बहुत महसूस होती है। कब्ज होने लगती है। चेहरा व आंखें सूज जाती हैं। मासिक चक्र अनियमित हो जाता है। त्वचा सूखी व बाल बेजान होकर झड़ने लगते हैं। हमेशा डिप्रेशन में रहने लगता है। रोगी तनाव व अवसाद से घिर जाते हैं और बात-बात में भावुक हो जाते हैं। आवाज रूखी व भारी हो जाती है। यह रोग 30 से 60 वर्ष की महिलाओं को होता है।
हायपरथायराइड –
इसमें थायराइड ग्लैंड बहुत ज्यादा सक्रिय हो जाता है और टी. थ्री, टी. फोर हार्मोन अधिक मात्रा में निकलकर रक्त में घुलनशील हो जाता है। इस स्थिति में वजन अचानक कम हो जाता है। भूख में वृद्धि होती है। रोगी गर्मी सहन नहीं कर पाते। अत्यधिक पसीना आता है। मांसपेशियां कमजोर हो जाती है। हाथ कांपते हैं और आंखें उनींदी रहती हैं। निराशा हावी हो जाती है। धड़कन बढ़ जाती है। नींद नहीं आती। मासिक रक्तस्राव ज्यादा एवं अनियमित हो जाता है। गर्भपात के मामले सामने आते हैं। हायपर थायराइड बीस साल की महिलाओं को ज्यादा होता है।

क्या हैं नुकसान

महिलाएं थायराइड की सबसे ज्यादा शिकार होती हैं। स्थिति यह है कि हर दस थायराइड मरीजों में से आठ महिलाएं ही होती हैं। उनका वजन  बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है। इससे तनाव, अवसाद, नींद ठीक से न आना, कोलेस्ट्रॉल, आस्टियोपोरोसिस, बांझपन, पीरियड का टाइम पर न आना, दिल की धड़कन बढ़ना जैसी परेशानियां सामने आ सकती हैं।
जांच व उपचार
थायराइड के दोनों प्रकार में ब्लड टैस्ट किया जाता है। ब्लड में टी. थ्री, टी. फोर एवं टी. एस. एच. लेवल में सक्रिय हार्मोंस का लेवल जांचा जाता है। टैस्ट रिपोर्ट्स के अनुसार डाक्टर ट्रीटमेंट करते हैं। अधिकतर रोगियों को उम्र भर दवा खानी पड़ती है, किंतु पहले चरण में उपचार करा लेने से ज्यादा परेशानियां नहीं आतीं। मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। ऐसी चीजें न खाएं जिससे थायराइड से पैदा होने वाली परेशानियां और बढ़ जाएं। इन चीजों से  परहेज करें।
1)  रेड मीट : रेड मीट में कोलेस्ट्रॉल और सेचुरेडेट फैट बहुत होता है। इससे वेट तेजी से बढ़ता है। थाइराइड वालों का वजन  तो वैसे ही बहुत तेजी से बढ़ता है। इसलिए इसे त्याग दें||  इसके अलावा रेड मीट खाने से थाइराइड वालों को बदन में जलन की शिकायत होने लगती है।
2)  एल्कोहल: एल्कोहल यानी शराब़, बीयर वगैरा शरीर में एनर्जी के लेवल को प्रभावित करता है। इससे थाइराइड की समस्या वाले लोगों की नींद में दिक्कत की शिकायत और बढ़ जाती है। इसके अलावा इससे ओस्टियोपोरोसिस का खतरा भी बढ़ जाता है।
3)  आयोडीन वाला खाना : चूंकि थायराइड ग्लैंड्स हमारे शरीर से आयोडीन लेकर थायराइड हार्मोन पैदा करते हैं, इसलिए हाइपोथायराइड है तो आयोडीन की अधिकता वाले खाद्य पदार्थों से जीवनभर दूरी बनाए रखें। सी फूड और आयोडीन वाले नमक का उपयोग वर्जित है|
4) वनस्पति घी: वनस्पति घी को हाइड्रोजन में से गुजार कर बनाया जाता है। यह अच्छे कोलेस्ट्रॉल को खत्म करते हैं और बुरे को बढ़ावा देते हैं। बढ़े थाइराइड से जो परेशानियां पैदा होती हैं, ये उन्हें और बढ़ा देते हैं। ध्यान रहे इस घी का इस्तेमाल खाने-पीने की दुकानों में जमकर होता है। इसलिए बाहर का फ्राइड खाना न ही खाएं।




5)  कैफीन : कैफीन वैसे तो सीधे थाइराइड नहीं बढ़ाता, लेकिन यह उन परेशानियों को बढ़ा देता है, जो थायराइड की वजह से पैदा होती हैं, जैसे बेचैनी और नींद में खलल।
6) ज्यादा मीठे खाद्य : हाइपर-थायराइडिज्म वालों को गन्ना, डेक्सट्रोस, हाई फ्रूट्स कॉर्न सीरप आदि का सेवन नहीं करना चाहिए. इनमें मौजूद कैलोरीज और शुगर से ब्लड शुगर लेवल बढ़ सकता है. हाई ब्लड प्रेशर, हाइपर थाइरॉइड वालों के लिए परेशानी पैदा कर सकता है. सॉफ्ट ड्रिंक, पैन केक, जैम/जैली, कुकीज, केक, पेस्ट्रीज, कैंडीज, जमा हुआ दही आदि का सेवन न करें|
7) एलर्जिक फूड न लें : हाइपर- थायराइडिज्म के कारण कई नाजुक बीमारियां होती हैं. यह ऑटो-इम्यून डिजीज है और खाने से होने वाली एलर्जी से इस प्रकार की बीमारियों के लक्षण बढ़ सकते हैं. इसलिए इस तरह के खाने से परहेज करें जिससे आपको एलर्जी है. साधारण तौर पर एलर्जी लैक्टोज सहन नहीं होना दूध, मूंगफली एलर्जी, गेहूं एलर्जी आदि है, एलर्जिक रिएक्शन उस भोजन पर ज्यादा आश्रित होने से होती है.डेयरी उत्पाद : हाइपर-थायराइडिज्म के कुछ लोगों में लैक्टोज सहन नहीं होता और दूध जैसे उत्पाद पचाने में समस्या होती है. यदि आपको दूध उत्पाद जैसे मक्खन, आइसक्रीम, दही आदि से अपच, सूजन, थकान आदि होती है तो इनसे परहेज करें.

23.2.16

बथुआ सब्जी के लाभ





 बथुआ दो प्रकार का होता है जिसके पत्ते बड़े व लाल रंग के होते हैं। उसे गोड वास्तूक और जो बथुआ जौ के खेत में पैदा होता है। उसे शाक कहते हैं। इस प्रकार बथुआ छोटा, बड़ा, लाल व हरे पत्ते होने के भेद से दो प्रकार का होता है।
इसके पत्ते मोटे, चिकने, हरे रंग के होते हैं। बडे़ बथुए के पत्ते बड़े होते हैं और पुष्ट होने पर लाल रंग के हो जाते हैं। बथुए के पौधे गेहूं तथा जौ के खेतों में अपने आप उग जाते हैं। इसके फूल हरे होते हैं। इसमें काले रंग के बीज निकलते हैं। बथुआ एक मशहूर साग है। इसमें लोहा, पारा, सोना और क्षार पाया जाता है। यह पथरी होने से बचाता है। अमाशय को बलवान बनाता है। अगर गर्मी से बढ़े हुए लीवर को ठीक करना है तो बथुए का प्रयोग करें। बथुए का साग जितना ज्यादा खाया जाये उतना ही फायदेमंद और लाभदायक है। बथुआ के साग में कम से कम मसाला और नमक डालकर या नमक न ही मिलायें और खाया जाये तो फायदेमंद होता है। यदि स्वादिष्ट बनाने की जरूरत पड़े तो सेंधा नमक मिलायें और गाय या भैंस के घी में छौंका लगायें। बथुआ का उबाला हुआ पानी अच्छा लगता है और दही में बनाया हुआ रायता भी स्वादिष्ट होता है। किसी भी तरह बथुआ को रोज खाना चाहिए। बथुआ के पराठे भी बनाये जाते हैं जो ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं तथा इसको उड़द की दाल में बनाकर भी खाया जाता है। बथुआ वीर्यवर्धक है।




गुण : बथुआ जल्दी हजम होता है, यह खून पैदा करता है। इससे गर्म स्वभाव वालों को अत्यंत फायदा होता है। यह प्यास को शांत करता है। इसके पत्तों का रस गांठों को तोड़ता है, यह प्यास लाता है, सूजनों को पचाता है और पथरी को गलाता है। छोटे-बड़े तीनों बथुवा क्षार से भरे होते हैं यह वात, पित्त, कफ (बलगम) तीनों दोशों को शांत करता है, आंखों को अत्यंत हित करने वाले मधुर, दस्तावर और रुचि को बढ़ाने वाले हैं। शूलनाशक, मलमूत्रशोधक, आवाज को उत्तम और साफ करने वाले, स्निग्ध पाक में भारी और सभी प्रकार के रोगों को शांत करने वाले हैं। चिल्ली यानी लाल बथुआ गुणों में इन दोनों से अच्छा है। लाल बथुआ गुणों में बथुए के सभी गुणों के समान है। बथुवा, कफ (बलगम) और पित्त को खत्म करता है। प्रमेह को दबाता है, पेशाब और सुजाक के रोग में बहुत ही फायदेमंद है।
बालों का ओरिजनल कलर बनाए रखने में बथुआ आंवले से कम गुणकारी नहीं है। सच पूछिए तो इसमें विटामिन और खनिज तत्वों की मात्रा आंवले से ज्यादा होती है। इसमें आयरन, फास्फोरस और विटामिन ए व डी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।
बथुआ कई औषधीय गुणों से भरपूर होता है। डाक्टरों के मुताबिक बथुआ को खाने में किसी न किसी रूप में शामिल जरूर करना चाहिए। यह स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसके साग को नियमित रूप से खाने से कई रोगों को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। इससे गुर्दे में पथरी होने का खतरा काफी कम हो जाता है। गैस, पेट में दर्द और कब्ज की समस्या भी दूर हो जाती है।

कच्चे बथुआ के एक कप रस में थोड़ा सा नमक मिलाकर प्रतिदिन लेने से पेट के कीड़े मर जाते हैं।
गुर्दा, मूत्राशय और पेशाब के रोगों में बथुआ का रस पीने से काफी लाभ मिलता है।
बथुआ को उबाल कर इसके रस में नींबू, नमक और जीरा मिलाकर पीने से पेशाब में जलन और दर्द नहीं होता।
सिर में अगर जुएं हों तो बथुआ को उबालकर इसके पानी से सिर धोएं। जुएं मर जाएंगे और सिर भी साफ हो जाएगा।
सफेद दाग, दाद, खुजली फोड़े और चर्म रोगों में बथुआ को प्रतिदिन उबालकर इसका रस पीना चाहिए।
बथुआ का रस मलेरिया, बुखार और कालाजार संक्रामक रोगों में भी फायदेमंद होता है।
कब्ज के रोगियों को तो इसका नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। कुछ हफ्तों तक नियमित रूप से खाने से कब्ज की समस्या समाप्त हो जाती है।
बथुआ को साग के तौर पर खाना पसंद न हो तो इसका रायता बनाकर खाएं।
पथरी होने पर एक गिलास कच्चे बथुआ के रस में शक्कर को मिलाकर रोज पिएं। पथरी टूटकर बाहर निकल आएगी।
सर्दी के मौसम में आसानी से उपलब्ध बथुए के साग को भोजन में अवश्य सम्मिलित करना चाहिए| बथुए के पतों का साग पराठे, रायता बनाकर या साधारण रूप में प्रयोग किया जाता है। कब्ज़ में बथुआ अत्यंत गुणकारी है| अतः जो कब्ज़ से अक्सर परेशान रहते है, उन्हें बथुए के साग का सेवन अवश्य करना चाहिए पेट में वायु हो गोला और इससे उत्पन्न सिरदर्द में भी यह आरामदायक है| आँखों में लाली हो या सूजन बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है। इसके अलावा चरम रोग, यकृत विकार में भी बथुए के साग के सेवन से लाभ होता है। बथुआ रक्त को शुद्ध कर उसमे वृद्धि करता है। बुखार और उष्णता में इसका उपयोग बहुत ही कारगर होता है। यह आयरन और कैल्सियम का अजस्त्र भंडार है। औरतों को आयरनो तथा रक्त बढाने वाले खाद्य पदार्थ की ज्यादा जरूरत होती है। अतः उन्हें इसके साग का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। खनिज लवणों की प्रचुरता से यह हरा साग-सब्जियां, शरीर की जीवन शक्ति को बढाने मे खास लाभकारी होता है। इसकी पतियों का रस ठंढी तासीर युक्त होने के कारण बुखार, फेफड़ों एवं आँतों की सूजन में भी फायदेमंद है। बथुए के रस को बच्चों को पिलाने से उनका मानसिक विकास होता है|

बथुए का 100 ग्राम रस निकालकर पीने से पेट के कीड़े मर जाते है|
रस में थोडा-नमक मिलाकार पीने से पेट के कीड़े मर जाते है| रस में थोडा सा नमक मिलाकर इससे 7 दिन तक सेवन करना चाहिये।

Uric acid बढ़ा हुआ हो, arthritis की समस्या हो , कहीं पर सूजन हो लीवर की समस्या हो , आँतों में infections या सूजन हो तो इसका साग बहुत लाभकारी है . पीलिया होने पर बथुआ +गिलोय का रस 25-30 ml तक ले सकते हैं .
50 ग्राम बथुए को एक ग्लास पानी में उबाल-मसल-छानकर पीने से स्त्रियों के मानसिक धर्म की गडबड़ी दूर होती है।

बथुए का औषधीय महत्व  : बथुए का सेवन अनेक प्रकार के रोगों के निवारण के लिए भी किया जाता है|

 रक्ताल्पता :-शरीर में रक्त की कमी पर बथुए का साग कुछ दिनों तक करने अथवा इसे आटे के साथ गूनकर रोटी बनाकर खाने से रक्त की वृद्धि होती है |
त्वचा रोग :-रक्त को दूषित हो जाने से त्वचा पर चकते हो जाते है, फोड़े, फुंसी निकल आती है। ऐसे में बथुए के साग के रक्त में मुल्तानी का लेप बनाकर लगाने से आराम मिलता है। साथ में बथुए का साग बनाकर या रस के रूप में सेवन करना चाहिये इससे रक्त की शुद्धि होती है और त्वचा रोगों से छुटकारा मिलता है|




फोड़ा :-बथुए की पतियों को सोंठ व नमक के साथ पीसकर फोड़े पर बांधने से फोड़ा पककर फुट जाएगा या बैठ जायेगा|
पीलिया :-कुछ दिनों तक बथुए का साग खाने या सूप बनाकर पीने से पीलिया ठीक हो जाता है|
पीड़ारहित प्रसव :-बथुआ के 10 ग्राम बीजों को कूटकर 500 मिलीलीटर पानी में मिलाकर उबाले, जब आधा पानी रह जाए तो उतारकर छानकर पियें, डेलिवरी से 20 दिन के पहले से इसका प्रयोग करना चाहिए। इसमें बच्चा बिना ओपेरेसन के पैदा हो रहे है और प्रसव पीड़ा भी कम हो जाती है।
*Delivery के बाद infections न हों और uterus की गंदगी पूर्णतया निकल जाए ; इसके लिए 20-25 ग्राम बथुआ और 3-4 ग्राम अजवायन को ओटा कर पिलायें. या फिर बथुए के 10 ग्राम बीज +मेथी के बीज +गुड मिलाकर काढ़ा बनायें और 10-15 दिन तक पिलायें .उदर कृमी :-इसके सेवन से पेट के कृमी स्वत मर जाती है|
*जुआं और लीख :-बथुए की पतियों को उबालकर उस उबले हुए पानी से सिर धोने से सिर के सारे जुएँ ख़त्म हो जाते है
अनियमित मासिक धर्म - 50 ग्राम बथुआ को एक ग्लास पानी में उबाल-छानकर नियमित कुछ दिनों तक पीने से तथा उसकी सब्जी बनाकर खाने से बथुआ की सब्जी हमेसा कूकर में बिना मिर्च मसाला के बनाकर खाना चाहिये।

१. बालो को बनाये सेहत मंद 


२. दातो की समस्या दूर करता है
३. कब्ज को दूर करता है
४. बदता है पाचन शक्ति
५. नष्ट करता है पेट के रोग
६. बवासीर की समस्या से दिलाये निजात




बथुआ के स्वास्थ्य लाभ -
(1) यकृत को बढ़ने (लीवर एनलार्जमेंट )से बचाता है बथुआ .इसकी तासीर ठंडी और तर होती है .आमाशय को ताकत देता है और पथरी के बनने को रोकता है बथुवा ।
(2) शरीर  को निरोगी बनाता है बथुआ .इसके स्वादिष्ट रायता तथा साग का नित्य सेवन करें .जहां तक हो मसालों का कमसे कम प्रयोग करें .नमक यदि डालना ही है तो सैंधा नमक ही काम में लें ।< (3) घुटने में दर्द है तो ज्यादा पानी में बथुआ उबालकर इसे छान लें .इसके पानी से दर्द वाले घुटने की सिंकाई करें .बथुए का साग अधिकाधिक खाएं.इस प्रकार चंद हफ़्तों में ही घुटने के दर्द से राहत मिलेगी । (4) चेहरे की झुर्रियों को कम करने के लिए बथुए के पानी से (बथुआ उबालकर पानी छानने के बाद )चेहरा धौएँ,चेहरा चिकना और सुथरा दिखेगा ,धीरे -धीरे नित्य सेवन से झुर्रियां भी कम होंगी .


5 ) बथुए को हमेशा एक लिमिट में खाना चाहिये क्‍योंकि इसमें ऑक्‍जेलिक एसिड का लेवल बहुत ज्यादा  होता है। अधिक मात्रा मे खाने से डायरिया भी हो सकता है। इसके अलावा आयुर्वेद में प्रेगनेंट औरतों को यह सलाह दी गई है कि वे बथुए का सेवन ना करें नहीं तो गर्भपात होने की संभावना रहती है।

6) Periods रुके हुए हों और दर्द होता हो तो इसके 15-20 ग्राम बीजों का काढ़ा सौंठ मिलाकर दिन में दो तीन बार लें .

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21.2.16

बेर खाने के लाभ :Benefits of eating berry







बेर बहुत ही उपयोगी और पोषक तत्वों से भरपूर फल है। इन दिनों बेर का मौसम भी है। बेर को अधिकतर लोग बचपन में तो बहुत पसंद करते हैं, लेकिन बड़े होने पर खट्टेपन के कारण इसे नहीं खाते हैं। साथ ही, एक बड़ा कारण यह भी है कि लोग इसके गुणों से अनजान हैं।
बेर दो तरह के होते है एक बड़े आकर वाले और दूसरे छोटे वाले होते है पका बेर स्वाद के साथ शरीर को कई रोग से बचाता है ।
*गुर्दो में दर्द हो जाये तो बेरी के पत्तो को पीस कर उसका लेप पेट के गुर्दे वाली जगह पर करने से दर्द शांत होता है ।
*विटामिन सी से भरपूर होता है-
संतरे और नींबू की ही तरह बेर में भी प्रचूर मात्रा में विटामिन-सी पाया जाता है। इसमें अन्य फलों के मुकाबले विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट की मात्रा ज्यादा होती है। इसके सेवन से त्वचा लंबी उम्र तक जवां बनी रहती है।




*पेट दर्द की समस्या खत्म कर देता है-

बेर को छाछ के साथ लेने से पेट दर्द की समस्या खत्म हो जाती है।
*बालों के झड़ने या रूखेपन से बचाने के लिए बेरी के पत्तो को हाथ से मसल कर पानी में उबाल ले और उस पानी को छान कर उससे सिर धोये तो इन समस्याओ से निजात मिलती है और रुसी की परेशानी भी हल हो जाती है
*मुंह के छालों की समस्या हो जाये तो बेरी की छाल को अच्छी तरह सुखा कर चूर्ण बनाये और उस चूर्ण को छालों पर लगाये तो आराम मिलेगा ।
*टी बी जैसे खतरनाक रोग का बहुत ही सरल उपाय बेर है । मरीज़ दिन में ३-४ बार एक पाव बेर प्रतिदिन सेवन करने से टी बी से बचाव और रोगमुक्ति संभव है
*दिल की बीमारियों का खतरा कम हो जाता है-
बेर खाने से कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है। इस कारण दिल से जुड़ी बीमारियां होने की संभावना कम हो जाती है।

*बालों के लिए फायदेमंद-

बेर की पत्तियों में 61 आवश्यक प्रोटीन पाए जाने के साथ विटामिन सी, केरिटलॉइड और बी कॉम्प्लेक्स भी अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह बालों को घना और हेल्दी बनाता है।

*रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है-

बेर में मैग्नीशियम, पोटैशियम, फॉस्फोरस, कॉपर, कैल्शियम और आयरन और खनिज पदार्थ भी मौजूद होते हैं। इन तत्वों से इम्यून सिस्टम मजबूत होता है। जिससे शरीर में रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है।




*नाक में फुंसी हो जाये तो बहुत परेशान करती है अतः एक बेर को छील कर बार बार सूंघे तो ये ठीक हो जाती है ।
खांसी और बुखार में है फायदेमंद-
बेर का जूस खांसी, फेफड़े संबंधी विकारों और बुखार के इलाज में भी सहायक है। वैज्ञानिकों ने इसमें आठ तरह के फ्लेवेनॉयड ढूंढे हैं। उनके मुताबिक, यह दर्दनाशक होता है। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लामेटरी गुण भी हैं।

*अनिद्रा की समस्या दूर हो जाती है-बेर में 18 प्रकार के महत्वपूर्ण एमीनो एसिड मौजूद हैं, जो शरीर में प्रोटीन को संतुलित करते हैं। चीनी दवाओं में इसके बीज से एंग्जाइटी और अनिद्रा (इंसोम्निया) का इलाज होता है।

अंतड़ियों में घाव हो या पाचन शक्ति कमजोर हो तो मरीज़ को सुबह जल्दी उठकर खाली पेट एक पाव बेर खाने चाहिए, दिन में भोजन के बाद बेर खाने चाहिए और साँझ के समय खाने के बाद बेर न खा सके तो उसका रस पी ले तो अंतड़ियों की सभी परेशानी दूर हो जाती है ।
मेडिकल अध्ययन के अनुसार बेर से लो-ब्लड प्रेशर, एनीमिया, लीवर आदि की समस्याओं से राहत मिलती है। यह शरीर में ट्यूमर सेल्स पनपने नहीं देता। यह त्वचा की देखभाल के लिए भी उत्तम स्रोत है।
इनके खाने से शारीरिक दुर्बलता दूर होती है ।

18.2.16

अधिक आयु तक बाल काले रहने के योगासन: Yoga for black hair




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निम्न  योग नियमित करने से अधिक उम्र तक बाल काले रहते हैं-

उष्ट्रासन- घुटने के बल खड़ें हों, पीठ और सिर को पीछे की तरफ झुकाएं। इसे इस तरह करें कि आपके हाथ एढ़ियों तक पहुंचें। कुछ देर इसी मुद्रा में रहें और सांस लेते रहें। जैसे जैसे इस मुद्रा से पहली वाली साधारण मुद्रा में वापस आएं, सांस छोड़ें। बाल टूटने और पतले होने की परेशानी दूर हो जाएगी। हां लेकिन अगर पीठ में कई गहरी चोट लगी है तो इसे न करें।




पवनमुक्तासन- पीठ के बल लेटें और घुटने को सीने की तरफ मोड़ें। फिर हाथ से घुटनों को जकड़ लें जैसे कि तस्वीर में बना है। घुटनों को अंदर मोड़ते वक्त सांस अंदर लें और जैसे जैसे घुटनों को वापस सीधा करें, सांस छोड़ें। इससे न सिर्फ बालों कूबसूरत बनते हैं बल्कि अपच की समस्या भी दूर होती है। पाचन सही होने से बाल भी स्वस्थ होते हैं।



भुजंगासन- पेट के बल सीधा लेटें। हाथों को सामने जमीन पर, कंधों की सिधाई में रखें। अब अपना वजन कुहनी पर डाल दें औऱ हथेली के सहारे सीने को ऊपर उठाएं। पैर सीधे ही रखें और इस मुद्रा में 20-25 सेकेंड तक रहें।



सर्वांगासन- पीठ के बल सीधे लेट जाएं और पैरों को इस तरह ऊपर उठाएं कि अंगूठे छत की तरफ हों। गर्दन, सिर औऱ पीठ के सहारे संतुलन बनाएं और हाथों को रीढ़ की हड्डी पर रखें। इस आसन से भी खून का बहाव सिर तक अच्छा होता है और बाल स्वस्थ होते हैं। इसे सांस लेने में भी आसानी होती है।




वज्रासन- घुटनों को मोड़ कर बैठें औऱ रीढ़ की हड्डी सीधी रखें। हाथों को जाघों के ऊपर रखें। फिर सांस अंदर लें और छोड़ें। इसी तरह कुछ देर करते रहें। इस मुद्रा से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता सुधरती है जो सिर की खाल में होने वाले किसी भी तरह के संक्रमण  से लड़ती है। इसे खाने के तुरंत बाद भी कर सकते हैं।




शीर्षासन- इसमें अपने शरीर को सिर के बल संतुलित करना होता है, हाथों का सहारा लेकर। ये यकीनन मुश्किल है लेकिन अगर नियमित तौर पर किया तो बालों को बहुत फायदा मिलेगा।

ऐसा करने से खून सिर तक पहुंचता है जिससे जरूरी पोषक तत्व मिलते हैं और बालों की जड़ें मजबूत होती हैं।




 कपालभाति - सांस खींचे  फेफड़े मे भरें  फिर झटके से छोडे|ऐसा करने से खून का बहाव अच्छा होता है औऱ दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है। शरीर से हानिकारक टॉक्सिन बाहर निकलते हैं। तनाव दूर होता है जो कि बाल झड़ने के पीछे मुख्य कारण है।

9.2.16

नाखून की रंगत से जानें शरीर का हाल : Nails give information about Diseases




   नाखून केवल हाथों की सुन्दरता को ही नहीं बढ़ते हैं बल्कि यह आने वाले समय में होनी वाली घटनाओं का भी संकेत देते हैं। इसलिए हस्तरेखा विज्ञान में नाखूनों को हस्तरेखाओं के समान ही महत्व दिया गया है। नाखूनों के चांद के आकार को देखकर यह जाना जा सकता है कि भविष्य में किस क्षेत्र से खुशखबरी मिल सकती है। इसी प्रकार नाखूनों के बनावट से यह जाना जा सकता है कि भविष्य में कौन सा रोग हमें प्रभावित कर सकता है।


 


हस्तरेखा विज्ञान के अनुसार नाखूनों का अधिक लंबा और चौड़ा होना फेफड़े की कमज़ोरी को दर्शाता है। नाखून अगर बढ़कर उंगली की ओर झुकी हुई हो तब इस बात संभावना अधिक रहती है कि व्यक्ति छाती एवं फेफड़े के रोग से पीड़ित होगा। 

नाखून छोटे हों लेकिन इनकी चौड़ाई अधिक हो तब गले में तकलीफ होने की अशांका प्रबल होती है। इस तरह की स्थिति होने पर व्यक्ति को श्वास नली में सूजन के कारण गले में दर्द, बोलते समय आवाज टूटना। आवाज साफ न होना ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

कुछ व्यक्तियों के नाखून छोटे होते हैं लेकिन इनका आकार वर्गाकार होता है। इस तरह के नाखून जिनके होते हैं उन्हें हृदय रोग हो सकता है। छोटे वर्गाकार नाखूनों में चन्द्र की उपस्थिति इस संभावना को और बढ़ाता है।

नाखून का लचीलापन कम हो गया है और वह आसानी से टूटने लगे हैं तो यह चिंता की बात हो सकती है। हस्त रेखा विज्ञान के अनुसार ऐसा होना दर्शाता है कि व्यक्ति अंदर से कमज़ोर और अस्वस्थ है। अच्छे खान-पान से शरीर में रक्त की कमी को दूर करने की जरूरत है। 
नाखून अंतिम सिरे पर फैलकर अधिक चौड़ा हो गया है और उनका रंग नीला है तो यह संकेत है कि शरीर में रक्त का संचार समुचित प्रकार से नहीं हो रहा है। इस तरह के नाखून जिनके होते हैं उनमें उर्जा की कमी होती है। ऐसे लोग जल्दी थक जाते हैं। नाखून से जुड़े चिकित्सा विज्ञान का इतिहास काफी पुराना है। पुरातन काल में जब बीमारी की जांच के लिए टेस्ट की सुविधा नहीं होती थी, तब हकीम और वैद्य सबसे पहले हाथ के नाखूनों के रंग से बीमारी की जांच करते थे। आयुर्वेद व होमियोपैथी में आज भी कुछ विशेषज्ञ स्वास्थ्य की जांच के समय नाखूनों के रंग को देखते हैं। विभिन्न शोधों में यह बात साबित हो चुकी है कि कई रोगों के पनपने के साथ-साथ नाखूनों का रंग अचानक बदलने लगता है।
 ‘नाखून कैरटिन से बने होते हैं। यह एक तरह का पोषक तत्व है, जो बालों और त्वचा में होता है। शरीर में पोषक तत्वों की कमी या बीमारी होने पर कैरटिन की सतह प्रभावित होने लगती है। साथ ही नाखून का रंग भी बदलने लगता है। यदि नेलपॉलिश का इस्तेमाल किए बिना भी नाखूनों का रंग तेजी से बदल रहा है तो यह शरीर में पनप रहे किसी रोग का संकेत हो सकता है।’
‘जिनके नाखूनों में दरारें होती हैं या नाखून टूटे हुए होते हैं, उनमें आमतौर पर विटामिन सी, फॉलिक एसिड व प्रोटीन की कमी देखने को मिलती है। सिरोसिस की स्थिति में भी ऐसा ही होता है। इसमें क्रेक के अलावा नाखूनों में गड्ढे भी पड़ जाते हैं। ऐसा जिंक की कमी के कारण होता है। अर्थराइटिस से पीड़ित लोगों के नाखूनों में धारियों के साथ-साथ उभार भी देखने को मिलता है।’
विशेषज्ञों के अनुसार जहां गर्मियों में नाखून तेजी से बढ़ते हैं, वहीं सर्दियों में यह रफ्तार धीमी हो जाती है।  ‘तनाव व अवसाद से पीड़ित व्यक्तियों में नाखून बढ़ने की गति धीमी हो जाती है। दरअसल अधिक तनाव की वजह से  हीमोग्लोबिन प्रभावित होता है।’




यह  जरूरी नहीं कि नाखून का बदलता रंग  सभी व्यक्तियों में एक ही तरह की बीमारी का संकेत हो। कई बार नाखूनों का रंग, उन पर पड़ी धारियां, नाखूनों का मोटा-पतला होना आदि बातें एक से अधिक रोगों में भी देखने को मिलती हैं। कई बार हम बेहद सामान्य बातें भी गौर नहीं करते, मसलन पैर के भीतर की ओर धंसे हुए नाखून तंग जूते पहनने का संकेत देते हैं, वहीं नाखूनों का नीला रंग शरीर में ऑक्सीजन की कमी दर्शाता है।’

मोटे, रूखे व टूटे हुए नाखून- ‘मोटे तथा नेल बेड से थोड़ा ऊपर की ओर निकले नाखून सिरोसिस व फंगल इन्फेक्शन का संकेत देते हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी व बालों के गिरने की स्थिति में भी नाखून बेरंग और रूखे हो जाते हैं। इसके अलावा त्वचा रोग लाइकन प्लेनस होने पर, जिसमें पूरे शरीर में जगह-जगह पस पड़ जाती है, नाखून बिल्कुल काले हो जाते हैं। हृदय रोग की स्थिति में नाखून मुड़ जाते हैं।  नाखूनों में सफेद रंग की धारियां व रेखाएं किडनी के रोगों का संकेत देती हैं। मधुमेह पीड़ितों का पूरा नाखून सफेद रंग व एक दो गुलाबी रेखाओं के साथ नजर आता है। हृदय रोगियों के नाखून में लाल धारियां देखने को मिलती हैं।’
नाखून में होने वाला संक्रमण -नाखूनों के रंग बदलने की वजह फंगल इन्फेक्शन भी हो सकता है। शुरुआत में नाखून सफेद या पीले रंग के दिखाई देते हैं, पर संक्रमण बढ़ने पर बदरंग होने के साथ-साथ पतले और खुरदरे होने लगते हैं। डॉ़ सचिन धवन बताते हैं कि हम सभी का शरीर कई प्रकार के सूक्ष्म जीवाणुओं और विषाणुओं के संपर्क में आता है। त्वचा पर हुए संक्रमण को यदि नाखून से खुजाया जाए तो भी नाखून संक्रमित हो जाते हैं। जो लोग अधिक स्विमिंग करते हैं या ज्यादा देर तक पानी में रहते हैं या फिर जिनके पैर अधिकतर जूतों में बंद रहते हैं, उनमें  संक्रमण का खतरा अधिक होता है।  
संक्रमण के असर से नाखून भुरभुरे हो जाते हैं और उनका आकार बिगड़ जाता है। नाखूनों के आसपास खुजली, सूजन और दर्द भी होता है। 




नाखूनों के पोर भी देखें-
 ‘छोटी-छोटी कोशिकाओं से बने नाखून के पोरों के आस पास  के क्षेत्र से भी सेहत से जुड़े रहस्यों का पता चलता है। आयरन और विटामिन-बी 12 की कमी होने पर नाखून अन्दर की ओर धंस जाते हैं। रक्ताल्पता  की स्थिति में नाखूनों में उभरी हुई धारियां पड़ जाती हैं। विटामिन-सी की कमी होने पर नाखून कटने-फटने लगते हैं और उनके पोरों का मांस उखड़ने लगता है।’

, नाखूनों को फंगल इन्फेक्शन से बचाने के लिए हाथ और पैर अच्छी तरह से धोएं। उंगलियों के बीच के हिस्सों को अच्छी तरह सुखाएं और पैरों में साफ-सुथरी मौजे  ही पहनें।
यूं बनाए रखें नाखूनों की सेहत-
 1) पूरे शरीर के पोषण का ध्यान रखें। पौष्टिक आहार की मदद से न सिर्फ नाखून स्वस्थ रहते हैं, बल्कि उनमें दरार या कट भी नहीं पड़ते। विटामिन बी का सेवन नाखूनों की सुंदरता बढ़ाता है।

 2) नाखूनों की बाहरी त्वचा का खास ध्यान रखें। क्यूटिकल्स ही फंगस और बैक्टीरिया के संक्रमण से बचाव करते हैं। नाखून व पोरों के आसपास की त्वचा को नियमित रूप से मॉइस्चराइजर की नमी दें। विटामिन सी का सेवन नाखूनों के आसपास की त्वचा को कटने-फटने से रोकता है।
3) नाखूनों पर कम से कम रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल करें।
क्या बताता है नाखूनों का रंग-

उभरे हुए नाखून -

बाहर और आसपास की त्वचा का उभरा होना हृदय समस्याओं के अतिरिक्त फेफड़े व आंतों में सूजन का संकेत देता है।
नीले नाखून-
शरीर में ऑक्सीजन का संचार ठीक प्रकार से न होने पर नाखूनों का रंग नीला होने लगता है। यह फेफड़ों में संक्रमण, निमोनिया या दिल के रोगों की ओर भी संकेत करता है।
आधे सफेद और आधे गुलाबी नाखून -
नाखूनों का रंग अचानक आधा गुलाबी व आधा सफेद दिखाई दे तो ऐसा होना गुर्दे के रोग व सिरोसिस का संकेत देता है।
लाल व जामुनी रंग -
नाखूनों का गहरा लाल रंग हाई ब्लड प्रेशर का संकेत देता है, जबकि जामुनी रंग के नाखून लो ब्लड प्रेशर का संकेत देते हैं।
चम्मच की तरह नाखून-
खून की कमी के अलावा आनुवंशिक रोग, ट्रॉमा की स्थिति में भी नाखूनों का आकार चम्मच की तरह हो जाता है और नाखून बाहर की ओर मुड़ जाते हैं।
पीले नाखून-
फीके, हल्के पीले व कमजोर नाखून रक्ताल्पता, हृदय संबंधी परेशानी, कुपोषण व यकृत  रोगों का संकेत देते हैं। फंगल इन्फेक्शन के कारण पूरा नाखून ही पीला हो जाता है। कई बार पीलिया, थाइरॉएड, मधुमेह और सिरोसिस में भी ऐसा हो सकता है। नाखून पीले व मोटे हैं और धीमी गति से बढ़ रहे हैं तो यह फेफड़े संबंधी रोगों का संकेत हो सकता है।
सफेद नाखून -
कई बार नाखूनों पर सफेद धब्बे नजर आते हैं तो कई बार वे पूरे सफेद दिखते हैं। नाखूनों की सफेदी लिवर रोगों के अलावा हृदय व आंत की ओर भी संकेत करती है। 






8.2.16

अपने ब्लड ग्रुप के हिसाब से भोजन खाएं : EAT FOOD ACCORDING TO THE TYPE OF BLOOD




खानपान का पौष्टिक होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है शरीर के हिसाब से अपनी डाइट को संतुलित रखना. लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इन बातों के अलावा खाने-पीने की आदतों में ब्‍लड ग्रुप का ध्यान रखना भी जरूरी है.



हर बल्‍ड ग्रुप का अपना एक अलग स्‍वभाव और प्रकृति होती है इसलिए हमारे खानपान का जुड़ाव हमारे बल्‍ड ग्रुप से भी होता है. ब्‍लड ग्रुप चार प्रकार के होते हैं: ए, बी, एबी और ओ.
लेकिन हम आपकाे यहां भी बता रहे हैं कि किस ब्लड ग्रुप में क्‍या खाना चाहिए और किस चीज से परहेज करना चाहिए |
ओ ब्‍लड ग्रप के लिए प्रोटीन है बेस्‍ट-
ओ ब्लड ग्रुप समूह के लोगों को हाई प्रोटीन युक्त आहार लेना चाहिए. दालें, मीट, मछली, फल आदि को अपनी डाइट में शामिल करें. अपने खाने में अनाज और बीन्‍स के साथ ही फलियों की मात्रा को संतुलित रखें.|

ए ब्लड ग्रुप है तो अपनाएं शाकाहार
ए ब्लड ग्रुप वाले लोगों का इम्यून सिस्टम बहुत संवेदनशील होता है, इसलिए उन्‍हें अपने खानपान पर बहुत ज्‍यादा ध्‍यान रखना चाहिए. इस ग्रुप के लोगों को मीट कम खाना चाहिए क्‍योंकि यह पचने में वक्‍त लेता हैं. अगर ए ब्लड ग्रुप के हैं तो चिकन-मटन का सेवन कम करें.
गाजर, हरी पत्तेदार सब्जियां, नाशपाती, लहसुन, अनाज, बीन्‍स और फलों का सेवन करना इस ब्लड ग्रुप वालों के लिए बेस्ट रहेगा. दूध और इससे बनी चीजें, सफेद चावल और अंडों का सेवन करने में सावधानी बरतनी चाहिए. इनके स्थान पर दही या सोया मिल्क का सेवन कर सकते हैं.




बी ब्लड ग्रुप वाले होते हैं लकी-
अगर आपका ब्लड ग्रुप बी है तो यह आपके लिए खुशखबरी हो सकती है. दरअसल इस ब्‍लड ग्रुप वालों को ज्‍यादा परहेज नहीं करना पड़ता. आप हरी पत्तेदार सब्जियां, फल, फिश, मटन और चिकन सब कुछ खा सकते हैं. इस ब्लड ग्रुप वालों का उनका पाचन तंत्र बहुत अच्‍छा होता है जिससे इनके शरीर में फैट जमा नहीं होता.
ये लोग दूध और इससे बनी चीजें, अंडे आदि का भरपूर सेवन करें. बस एक बात का ध्‍यान रखें कि खानपान की इनकी आदतें संतुलित हों.
एबी ब्लड ग्रुप है तो संतुलित रखें डाइट
एबी ब्लड ग्रुप बहुत कम लोगों में पाया जात है. जो चीजें ए और बी वालों को परहेज करने के लिए बताई जाती हैं, वही चीजें खाने में इन्‍हें भी सावधानी बरनती चाहिए. एबी ब्लड ग्रुप वाले लोगों को फल व सब्जियां अधिक मात्रा में खाने चाहिए.
इस ब्लड ग्रुप वाले लोगों के लिए अंडे भी लाभदायक होते हैं. वहीं इनको नॉन वेज कम खाना चाहिए. हालांकि दूध से बनी चीजें, बटर आदि इनको नुकसान नहीं पहुंचाते हैं.

7.2.16

खस खस (पोस्तदाना) के स्वास्थ्य लाभ : Benefits of Poppy Seeds




 

खसखस सूक्ष्म  आकार का बीज होता है। इसे लोग पॉपी सीड के नाम से भी जानते हैं। खसखस प्यास को बुझाता है और ज्वर, सूजन और पेट की जलन से राहत दिलाता है और यह एक दर्द-निवारक भी है। लंबे समय से ही प्राचीन सभ्यता मे इसका उपयोग औषधीय लाभों के लिए किया जाता रहा है| 



अनिद्रा- खसखस नींद से जुड़ी दिक्कतों  में मदद करता है क्‍योंकि इसके सेवन से आपके अंदर  सोने के लिए मजबूत इच्छा पैदा होती हैं। अगर आप भी अनिद्रा की समस्या  से परेशान हैं, तो सोने से पहले खसखस के पेस्ट  को गर्म दूध के साथ सेवन करना समस्या  में बहुत प्रभावी साबित हो सकता है।

श्वसन संबंधी विकार-खसखस के बीज में शांतिदायक गुण होने के कारण यह सांस की बीमारियों के इलाज में बहुत कारगर होता है। यह खांसी को कम करने में मदद करता है और अस्थमा जैसी समस्याओं के खिलाफ लंबे समय तक राहत प्रदान करता है। 



कब्ज,पोषण-खसखस के बीज ओमेगा-6 फैटी एसिड, प्रोटीन, फाइबर का अच्छा स्रोत हैं। इसके अलावा इसमें विभिन्न फाइटोकेमिकल्स, विटामिन बी, थायमिन, कैल्शियम और मैंगनीज भी होता हैं। इसलिए खसखस को एक उच्च पोषण वाला आहार माना जाता है।




कब्ज-खसखस फाइबर को बहुत अच्छा स्रोत हैं। इसमें इसके वजन से लगभग 20-30 प्रतिशत आहार फाइबर शामिल होता हैं।  फाइबर स्वस्थ मल त्याग में और कब्ज की दिक्कत  दूर करने में बहुत लाभकारी होती है। लगभग 200 ग्राम खसखस आपके दैनिक फाइबर की जरूरत को पूरा कर सकता हैं|

शांतिकर औषधि-सूखी खसखस को प्राकृतिक शांति प्रदान करने वाली औषधि माना जाता है कारण ,इसमें थोड़ी सी  मात्रा में ओपियम एल्कलॉइड्स नामक रसायन होता है। यह रसायन तंत्रिका की अतिसंवेदनशीलता, खांसी और अनिद्रा को कम करते हुए आपकी तंत्रिका तंत्र पर एक न्यूनतम  प्रभाव उत्पन्न करता  है। 

एंटीऑक्सीडेंट-माना जाता है कि खसखस में बहुत अधिक मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होने के कारण इसमें अद्भुत एंटीऑक्सीडेंट गुण होते है। ये एंटीऑक्‍सीडेंट फ्री रेडिकल के हमलों से अंगों और ऊतकों की रक्षा करते है। इसलिए इन सब खतरों से बचने के लिए हमें अपने आहार में खसखस को शामिल करना चाहिए।





दर्द-निवारक-खसखस में मौजूद ओपियम एल्कलॉइड्स नामक रसायन होता है, जो दर्द-निवारक  के रूप में बहुत कारगर होता है। खसखस को दांत में दर्द, मांसपेशियों और नसों के दर्द को दूर करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है।खसखस एक लोकप्रिय दर्द-निवारक भी है। 

त्वचा की देखभाल-आयुर्वेद में तो हमेशा से ही खसखस को त्‍वचा के लिए अच्‍छा माना जाता है। यह एक मॉइस्‍चराइजर की तरह काम करता है और त्वचा  की जलन और खुजली को कम करने में मदद करता है। इसके अलावा इसमें मौजूद लिनोलिक नामक एसिड एक्जिमा के उपचार में भी मददगार होता है। 


4.2.16

कब्ज के नुस्खे


आज की जीवनशैली और काम के बोझ में कब्ज होना कोई बड़ी बात नहीं हैं। कब्ज आज बेहद आम समस्या बन गई है। लेकिन क्या आप जानते हैं कब्ज को दूर करने के उपाय आपकी अपनी रसोई में मौजूद हैं।
  1. रात को सोने से पहले गुड़ खाने से सुबह के समय कब्ज की समस्या नहीं रहती। विटामिन और मिनरल्‍स से भरपूर गुड़ को गर्म करके खाने से कब्ज में बहुत आराम मिलता है। 
  2. आलूबुखारा खाने से आपकी पेट संबंधी सारी बीमारियां दूर हो जाती हैं। रोजाना 3 ग्राम आलूबुखारा खाने से कब्ज को आसानी से दूर किया जा सकता है। दरअसल, आूलबुखारा में भारी मात्रा में फाइबर मौजूद होता है जिससे कब्ज को दूर करने में मदद मिलती है। 
  3. नींबू का रस पाचन तंत्र को ठीक करता है। इससे शरीर में मौजूद विषाक्त कण निकल जाते हैं। ताजा नींबू पानी सुबह पीने से कब्ज नहीं होती। चाहे तो लेमन टी भी पी सकते हैं। 
  4. कॉफी पीने से आप बिना देर किए बाथरूम तक पहुंच जाएंगे। दरअसल, कॉफी से प्रेशर जल्दी बनता है। 
  5. रोजाना 15 मिनट टहलने से भी आप आसानी से कई समस्याओं को दूर कर सकते हैं। ज्यादा खाने के बाद यदि आपको नींद आने लगे तो आपको थोड़ा टहलना चाहिए। 
  6. पुदीना और अदरक दोनों की चाय बनाकर पीने से कब्ज की समस्या नहीं रहती। अदरक की चाय कब्ज से छुटकारा पाने के लिए बेहतरीन घरेलू नुस्‍खा हैं।