30.9.15

श्वसन समस्याएँ :कारण और निवारण Respiratory Problems : Causes and cures.






                               


सांसें तेज चलना, गहरी सांस न ले पाना, सांस लेने में परेशानी होना कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका सामना कभी-कभार सबको करना पड़ता है। लेकिन लंबे समय तक इस स्थिति का बने रहना ठीक नहीं। यह जानना जरूरी हो जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है?






  लगातार अधिक शारीरिक श्रम करने पर सांसें चढ़ने लगती हैं। जल्दबाजी व तनाव की स्थिति में भी सांसें उखड़ जाती हैं, पर ऐसी स्थितियों में सांसों की गति जल्द ही सामान्य भी हो जाती है। कई बार नियमित व्यायाम व जीवनशैली में सुधार करके भी आराम मिल जाता है। पर यदि हर समय सांस लेने में परेशानी हो रही हो तो ध्यान देना जरूरी है। आइये जानते हैं उन रोगों के बारे में, जिनकी वजह से सांस लेने में परेशानी हो सकती है...

फेफड़ों की समस्याएं-
सांस नली के जाम होने पर या फेफड़ों में छोटी-मोटी परेशानी होने पर सांसें छोटी आने लगती हैं। किसी प्रोफेशनल की मदद से इस स्थिति से जल्दी ही राहत पाई जा सकती है। लेकिन यदि ऐसा लंबे समय से है तो यह किसी दूसरी बीमारी का लक्षण हो सकता है, जैसे ...

अस्थमा -
सांस नली में सूजन आने की वजह से वो संकरी हो जाती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है। सांस लेते समय घरघराहट और खांसी रहती है।
पलमोनरी एम्बोलिज्म :
इसमें फेफड़ों तक जाने वाली धमनियां वसा कोशिकाओं, खून के थक्कों, ट्यूमर सेल या तापमान में बदलाव के कारण जाम हो जाती हैं। रक्त संचार में आए इस अवरोध के कारण सांस लेने और छोड़ने में परेशानी होती है। छाती में दर्द भी होता है।
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पलमोनरी डिजीज (सीओपीडी)-





इस स्थिति में सांस नली बलगम या सूजन की वजह से संकरी हो जाती है। सिगरेट पीने वालों, फैक्टरी में रसायनों के बीच काम करने वालों और प्रदूषण में रहने वाले लोगों को यह खासतौर पर होती है।

निमोनिया -
यह बीमारी स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया नाम के एक कीटाणु की वजह से होती है। दरअसल यह बैक्टीरिया श्वास नली में एक खास तरह का तरल पदार्थ उत्पन्न करता है, जिससे फेफड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और रक्त में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। खून में ऑक्सीजन की कमी के चलते होठ नीले पड़ जाते हैं, पैरों में सूजन आ जाती है और छाती अकड़ी हुई सी लगती है।


ह्रदय रोग-
दिल की बीमारियों के चलते भी सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। दिल के रोग मसलन, एन्जाइना, हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर, जन्मजात दिल में परेशानी या एरीथमिया आदि में ब्रेथलेसनेस होती है। दिल की मांसपेशियां कमजोर होने पर वे सामान्य गति से पंप नहीं कर पातीं। फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है और व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे लोग रात में जैसे ही सोने के लिए लेटते हैं, उन्हें खांसी आने लगती है और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। इसमें पैरों या टखनों में भी सूजन आ जाती है। सामान्य से ज्यादा थकान रहती है।बेचैनी भी हो सकती है वजह -
बेचैन रहना या बात-बात पर चिंता करना भी सांस को असामान्य बना देता है। दरअसल बेचैनी हाईपरवेंटिलेशन की वजह से होती है यानी जरूरत से ज्यादा सांस लेना। सामान्य स्थिति में हम दिन में 20,000 बार सांस लेते और छोड़ते हैं। ओवर-ब्रीदिंग में यह आंकड़ा बढ़ जाता है। हम ज्यादा ऑक्सीजन लेते हैं और उसी के अनुसार कार्बन डाईऑक्साइड भी छोड़ते हैं। शरीर को यही महसूस होता रहता है कि हम पर्याप्त सांस नहीं ले रहे। कई बार सांस व रोगों के बारे में बहुत सोचते रहने पर भी ऐसा होता है। पैनिक अटैक में ऐसा ही होता है। सांसों पर नियंत्रण रखने की बहुत अधिक कोशिश करने तक से ऐसा हो जाता है।
हो सकती है एलर्जी -
कई लोगों का प्रतिरक्षा तंत्र संवेदनशील होता है, जिससे उन्हें प्रदूषण, धूल, मिट्टी, फफूंद और जानवरों के बाल आदि से एलर्जी रहने लगती है। ऐसे लोगों को एलर्जन के संपर्क में आने व मौसम में बदलाव आने पर एलर्जी का अटैक पड़ने लगता है। सांस लेने में परेशानी होती है। सीने में जकड़न आने लगती है। सांस फूलने लगता है।




मोटापा घटाएं-
शोधकर्ताओं का दावा है कि मोटापा बढ़ते ही सांस की पूरी प्रणाली प्रभावित हो जाती है। सांस के लिए मस्तिष्क से आने वाले निर्देश का पैटर्न बदल जाता है। वजन में इजाफा और सक्रियता की कमी रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगते हैं। थोड़ा सा चलने, दौड़ने या सीढि़यां चढ़ने पर परेशानी होती है। सांस लेने में परेशानी होना वजन कम करने और व्यायाम को जीवनशैली में शामिल करने का भी संकेत है।
अन्य कारण -
शरीर में कैंसर कोशिकाओं के कारण सांस नली पर दबाव बढ़ता है और सांस लेने में परेशानी होती है। गर्भाशय व लिवर कैंसर में पेट में तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे पेट में सूजन आ जाती है। डायफ्राम पर पड़ा दबाव फेफड़ों को खुलने नहीं देता और सांस लेने में परेशानी होती है।

    शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया होने की स्थिति में भी सांस लेने में परेशानी की समस्या होती है। इस दौरान रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन कम हो जाता है, जिससे ऑक्सीजन फेफड़ों से शरीर के सब हिस्सों तक नहीं पहुंच पाती। शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में कमी का कारण शरीर में आयरन, विटामिन बी-12 या प्रोटीन की कमी होना है।
ये उपाय देंगे राहत की सांस
घर के वेंटिलेशन का रखें खास ध्यान। कार्पेट, तकिए और गद्दों पर धूप लगाएं। परदों की साफ-सफाई करें। रसोई और बाथरूम में लगाएं एग्जॉस्ट फैन। एसी का इस्तेमाल कम करें।
धूम्रपान न करें, सिगरेट पीने वालों से दूरी बनाएं।

खाने में ब्रोकली, गोभी, पत्ता गोभी, केल (एक प्रकार की गोभी), पालक और चौलाई को शामिल करें।
बाहर का काम सुबह-सुबह या शाम को सूरज ढलने के बाद करें। इस वक्त प्रदूषण का स्तर कम होता है।
किसी फैक्ट्री या व्यस्त सड़क के आसपास व्यायाम न करें।
चलें, खेलें और दौड़ें। सप्ताह में कम से कम तीन दिन आधे घंटे की दौड़ लगाएं या पैदल चलें।
वजन कम करने पर ध्यान दें। मोटापा फेफड़े को सही ढंग से काम करने से रोकता है।
देर तक बैठे रहते हैं या अकसर हवाई यात्रा करते हैं तो थोड़ी देर पर उठ कर टहलते रहें। सूजन का ध्यान रखें।
यदि अस्थमा है तो इनहेलर साथ रखें।
कम दूरी वाले कामों के लिए वाहन का इस्तेमाल न करें।
अचानक सांस लेने में परेशानी होने पर-  




व्यक्ति को तुरंत खाने या पीने की कोई चीज न दें। अगर छाती में चोट है तो उसे हिलाएं नहीं।
सिर के नीचे तकिया न रखें, इससे सांस नली पर असर पड़ता है। व्यक्ति को हवादार जगह में ले जाएं। तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। इस बीच व्यक्ति की सांस और धड़कन की जांच करते रहें।
व्यक्ति के पहने कपड़ों को ढीला कर दें।
छाती या गले पर कोई खुली चोट है तो उसे तुरंत ढक दें।
गलतियां जो हम हर रोज करते हैं -
व्यायाम करते हुए अनजाने ही सांस रोक लेना। इससे सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती। जल्द ही थकावट होने लगती है। ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। व्यायाम करते समय कंधों को आरामदायक स्थिति में रखें। नाक से सांस लें और मुंह से छोड़ें।
सांस ढंग से न लेना यानी फेफड़ों की क्षमता का पूरा उपयोग न करना। सांस लेना, पर ढंग से छोड़ना नहीं, जिससे फेफड़ों में कार्बन डाईऑक्साइड एकत्रित हो जाती है। पूरी सांस लें और छोड़ें। सांस लेने के साथ पेट बाहर की ओर व छोड़ते समय भीतर की ओर जाना चाहिए।इन संकेतों को न करें नजरअंदाज -
*होठ, उंगलियां और नाखूनों का नीला पड़ना।
*सीने में दर्द होना। खांसी के साथ खून आना।
*चक्कर आना और बेहाशी जैसा महसूस होना।
*चेहरे, जीभ और गले में सूजन रहना।
*जरूरत से ज्यादा लार निकलना।
*सांस के साथ घरघराहट की आवाज आना।
*धड़कन असामान्य रूप से चलना। पसीना छूटना।
*कुत्ते की आवाज सी खांसी आना, सांस लेने में सीटी जैसी आवाज आना। जल्दी-जल्दी बुखार आना।
* पीला या हरा बलगम आना, अचानक भूख खत्म हो जाना व पैरों में सूजन रहना।
*हमेशा भ्रमित रहना, चक्कर आना व नींद अधिक या कम आना।


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20.9.15

हिचकी रोकने के उपचार : Remedies to stop hiccups








      हिचकी  आए  तो कहते हैं कोई  याद करता है| इस विचार को लेकर  हो सकता है की आपको हिचकी  बुरी न लगे  लेकी लोगों में बैठे  हों और लगातार  हिचकी  आने लगे तो  इसे बंद करने का कोई उपाय तो करना  जरूरी  मालूम पड़ता है|


पानी पियें-
**पानी पीने से डायाफ्राम अपने निश्चित स्थान पर आ जाता है  जिससे  हिचकी  रुक जाती है|








जीभ बाहर निकालें-
**हिचकी  ज्यादा आने पर अपनी जीभ को जितना ज्यादा बाहर  निकाल सको  निकालें | इससे गले का वह भाग खुल जाएगा  जो नाक के रास्ते  वोकल  कार्ड  को जोड़ता है| इससे हिचकी बंद हो जाती है|









हिचकी के कारण-
**हिचकी आने के कई कारण हो सकते हैं इनमें जल्दी-जल्दी भोजन निगलने, अधिक मिर्च वाला खाना खाने, शराब पीना आदि शामिल है। हिचकी को रोकने के लिए आप कई ऐसे उपायों को अपना सकते हैं जो पूरी तरह सुरक्षित और आसान भी है। लेकिन अगर यह सामान्य उपायों के बाद भी हिचकी ना रुक रही हो, तो डॉक्टर से राय कर लेना ही ठीक है।

**तीन काली मिर्च थोडी सी चीनी या मिश्री का एक टुकडा मुंह में रखकर चबायें,और उसका रस चूंसते रहे,चाहे तो एक घूंट पानी पी सकते है,तत्काल हिचकी बन्द हो जायेगी। यह उपाय पूरी तरह सुरक्षित भी है।




शकर खाएँ-
** हिचकी आने पर तुरंत एक चम्मच चीनी का सेवन करें। इससे थोड़ी देर में ही हिचकी आना बंद हो जाएगी। यह हिचकी आने के कारणों को खत्म करने में कारगर माना जाता है।


नमक पानी पियें-
**थोड़े से नमक को पानी में मिलाकर एक या दो घूंट पीएं। इससे हिचकी की समस्या में तुरंत आराम मिलेगा। इसके साथ ही धीरे-धीरे सांस लें इससे आपको आराम मिलेगा।

सिरके का प्रयोग-
**सिरका का प्रयोग कई सारे बीमारियों में किया जाता है। एक चम्मच सिरके का सेवन हिचकी की समस्या से तुरंत राहत दिला सकता है। इसका खट्टा स्वाद हिचकी बंद करने में मदद करता है।




ध्यान भटकाना-
**किसी व्यक्ति को अचानक से डराने या चौंकाने से उसका ध्यान भंग हो सकता है जिससे श्वसन में अवरोध होगा और हिचकियाँ ख़त्म हो जाएँगी |

श्वास रोकना-
**कुछ समय के लिए श्वास रोक लीजिये जिससे मस्तिष्क तक ऑक्सीजन नहीं पहुँचेगी और डायाफ्राम निष्क्रिय हो जायेगा| यह बहुत पुराना तरीका है पर कारगर है|





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16.9.15

खर्राटे हैं कई बीमारियों का संकेत





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खर्राटे की वजह से  नींद में लगातार अनियमितता बनी रहने से पीड़ित व्यक्ति अगले दिन तनाव ग्रस्त महसूस करता है और लगातार सिरदर्द की भी शिकायत रहती है। वहीं इससे स्मरण शक्ति कमजोर होने की आशंका भी बढ़ जाती है।





विशेषज्ञ कहते हैं कि खर्राटों की वजह से नींद पूरी न हो पाने से कई स्वास्थ्य समस्याओं को न्यौता मिलता है। आइए जानते हैं कुछ ऐसी ही बीमारियों के बारे में..

हाई ब्लड प्रेशर-

स्लिप एप्निया से पीड़ित व्यक्ति को नींद में सांस लेने में होने वाली परेशानियों के चलते शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती है। इससे अनावश्यक तनाव की स्थिति बनती है और पीड़ित हाइपरटेंशन यानी हाई बीपी का शिकार हो जाता है।

ऐसे में शरीर का सिंपेथेटिक नर्वस सिस्टम (एसएनएस) कमजोर पड़ने लगता है। इसकी मुख्य भूमिका तनाव को नियंत्रित करने में सहायक नोराड्रेनेलिन हार्मोन को सक्रिय करने की होती है। ऐसा नहीं हो पाने से व्यक्ति के तनावग्रस्त होने की आशंका बढ़ जाती है।

हृदय रोग-

एक शोध में पाया गया है कि स्लिप एप्निया से पीड़ित 50 फीसदी मरीजों को हार्ट अटैक रात के समय या सुबह के समय ही आता है, क्योंकि वे नींद में ठीक प्रकार से सांस नहीं ले पाते हैं। इससे ऑक्सीजन की पूर्ति ठीक ढंग से नहीं हो पाती है और शरीर में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बढ़ने लगती है। ऐसे में रक्त वाहिकाओं पर अनावश्यक दबाव पड़ता है, जिससे हृदय रोगों या स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।





टाइप 2 डायबिटिज-

स्लिप एप्निया और टाइप 2 डायबिटिज के बीच गहरा संबंध है। टाइप 2 डायबिटिज से पीड़ित 80 फीसदी लोगों को स्लिप एप्निया की समस्या होती ही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि जब व्यक्ति चैन की नींद सोता है, तभी उसका शरीर इंसुलिन का अवशोषण ठीक प्रकार से कर पाता है। नींद की कमी वास्तव में इंसुलिन प्रतिरोधक का काम करती है, जिससे डायबिटिज का खतरा बढ़ जाता है।

अस्थमा-

जिन लोगों को अस्थमा की समस्या होती है, उनके नींद संबंधित गड़बड़ियों या स्लिप एप्निया से पीड़ित होने की आशंका भी अधिक होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ सिनसिनाटी के चिल्ड्रन्स मेडिकल सेंटर में अस्थमा से पीड़ित महिलाओं पर किए गए शोध में सामने आया है कि अस्थमा होने पर स्लीप एप्निया का खतरा दो गुना तक बढ़ जाता है। वहीं अस्थमा के जो मरीज दिन के समय नींद लेते हैं, उनकी रात की नींद अक्सर खराब होती ही है।

वजन बढ़ना-

स्लिप एप्निया से पीड़ित व्यक्ति के एंडोक्राइन सिस्टम पर नकारात्मक असर पड़ता है। साथ ही ग्रेहलीन नामक हार्मोन की सक्रियता बढ़ने से पीड़ित का मन काबरेहाइड्रेटयुक्त और मीठे खाद्य पदार्थो को खाने का अधिक करता है।

भोजन की इन गड़बड़ियों के चलते नींद का पैटर्न भी गड़बड़ होने लगता है। ऐसे में पीड़ित के शरीर में एक्सरसाइज के लिए जरूरी एनर्जी नहीं बचती है और अतिरिक्त कैलोरी फैट में तब्दील हो जाती है, जिससे वजन बढ़ने की समस्या होने लगती है





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