14.7.15

अलसी के फायदे,लाभ, उपयोग : Medicinal use of linseed






    श्रेष्ठ भोज्य पदार्थ  अलसी में ओमेगा 3 फेटी एसिड  व सबसे अधिक फाइबर होता है। इसे देव भोजन कहा गया है|   यह कई रोगों के उपचार में लाभप्रद है। अब  निम्न पंक्तियों मे  यह बताया जाएगा कि  अलग अलग  रोगों  मे अलसी  का उपयोग  कैसे किया जा सकता है-




 1. एक तंदुरुस्त  व्यक्ति को को रोज सुबह-शाम एक-एक चम्मच अलसी का पाउडर पानी के साथ ,सब्जी, दाल या सलाद मंे मिलाकर लेना चाहिए । अलसी के पाउडर को ज्यूस, दूध या दही में मिलाकर भी लिया जा सकता है। इसकी मात्रा 30 से 60 ग्राम प्रतिदिन तक ली जा सकती है। 100-500 ग्राम अलसी को मिक्सर में दरदरा पीस कर किसी एयर टाइट डिब्बे में भर कर रख लें। अलसी को अधिक मात्रा मंे पीस कर न रखें, यह पाउडर के रूप में खराब होने लगती है। सात दिन से ज्यादा पुराना पीसा हुआ पाउडर प्रयोग न करें। इसको एक साथ पीसने से तिलहन होने के कारण खराब हो जाता है।
2,  खाँसी होेने पर अलसी की चाय पीएं। पानी को  उबालकर उसमें अलसी पाउडर मिलाकर चाय तैयार करें।एक चम्मच अलसी पावडर को दो कप (360 मिलीलीटर) पानी में तब तक धीमी आँच पर पकाएँ जब तक यह पानी एक कप न रह जाए। थोड़ा ठंडा होने पर शहद, गुड़ या शकर मिलाकर पीएँ। सर्दी, खाँसी, जुकाम, दमा आदि में यह चाय दिन में दो-तीन बार सेवन की जा सकती है। दमा रोगी एक चम्मच अलसी का पाउडर केा आधा गिलास पानी में 12 घंटे तक भिगो दे और उसका सुबह-शाम छानकर सेवन करे तो काफी लाभ होता है। गिलास काँच या चाँदी को होना चाहिए।
3. समान मात्रा में अलसी पाउडर, शहद, खोपरा चूरा, मिल्क पाउडर व सूखे मेवे मिलाकर 
औषधि  तैयार करें।  कमजोरी में व बच्चों के स्वास्थ्य के लिए  उपकारी है 




4  डायबीटिज के मरीज को आटा गुन्धते वक्त प्रति व्यक्ति 25 ग्राम अलसी काॅफी ग्राईन्डर में ताजा पीसकर आटे में मिलाकर इसका सेवन करना चाहिए। अलसी मिलाकर रोटियाँ बनाकर खाई जा सकती हैं। अलसी एक जीरो-कार फूड है अर्थात् इसमें कार्बोहाइट्रेट अधिक होता है।शक्कर की मात्रा न्यूनतम है।
5  कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से निकला तीन चम्मच तेल, छः चम्मच पनीर में मिलाकर उसमें सूखे मेवे मिलाकर देने चाहिए।  कैंसर रोगियों को ठंडी विधि से  निकले तेल की मालिश भी करनी चाहिए।
6  साफ बीनी हुई और पोंछी हुई अलसी  को धीमी आंच पर तिल की तरह भून लें।  इसमें सेंधा नमक भी मिलाया जा सकता है। ज्यादा पुरानी भुनी हुई अलसी का  प्रयोग कदापि न  करें 
7  बेसन में 25 प्रतिशत  अलसी मिलाकर व्यंजन बनाएं। बाटी बनाते वक्त भी उसमें भी अलसी पाउडर मिलाया जा सकता है। सब्जी की ग्रेवी में भी अलसी पाउडर का प्रयोग करें।
8  अलसी सेवन के दौरान खूब पानी पीना चाहिए। इसमें पर्याप्त रेशा होता है जिसे ज्यादा पानी की जरूरत  होती है|  

8.7.15

बरसात के मौसम की बीमारियों से रहें सावधान ! : Be careful of diseases in the rainy season !








   


बरसात के मौसम में गंदे पानी और विषैले खाद्य पदार्थों के कारण बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। वातावरण में नमी के बढ़ने से वायरस, फंगस एव बैक्टीरिया पनपने लगते हैं, जिससे कई बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

हाइपोथर्मिया ( तापक्रम  कम हो जाना) इस मौसम की सबसे सामान्य बीमारी है। इसमें ज्यादा देर तक भीगने के बाद शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। इससे ठंड लगने लगती है, खून का प्रवाह कम होने लगता है तथा हृदय की गति बढ़ जाती है। इसके अलावा कंपकपी, सर्दी, खांसी, जुकाम-बुखार आदि बीमारियां भी हो जाती हैं।

इस मौसम में गंदे पानी के कारण होने वाली संक्रामक बीमारियों का प्रकोप भी रहता है। सबसे ज्यादा खतरा हेपेटाइटिस-ई यानी पीलिया और टायफाइड का होता है। इसके अलावा डायरिया, पेचिश, दस्त लगना, आंतों में इंफेक्शन आदि भी इस सीजन की आम बीमारियां हैं।



इन बीमारियों से बचने का एकमात्र उपाय साफ पानी है। बरसात में जलभराव की समस्या खड़ी हो जाती है। इस कारण मच्छर, मक्खियों के पनपने का दौर शुरू होता है, जिनसे मलेरिया, डेंगू, दिमागी बुखार जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

बरसात का मौसम आते ही चिकुनगुनिया का हमला भी होने लगता है। यह वायरस से होने वाली बीमारी है, जिसके लक्षण डेंगू बुखार जैसे ही होते हैं। यह बीमारी मच्छर जनित है।

इसमें जोड़ों के दर्द के साथ अचानक बुखार, मितली, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द के साथ सूजन बढ़ने लगती है। दमा के मरीजों को तो खास सावधानी बरतनी चाहिए। इस मौसम में सांस फूलने या खांसी आने जैसी समस्या आम है।

सड़कों पर गंदा पानी भरने या गंदे पानी के सेवन से इस मौसम में स्किन इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ जात है। मसलन, फोड़े-फुंसी, दाद-खुजली आदि। इस मौसम की एक सामान्य बीमारी है लेप्टोस्पायरोसिस, जो कि चूहे के कारण फैलती है।

इसके अलावा गीले खेतों में काम करने, गंदे पानी में भीगने, पालतू जानवर आदि के संपर्क में आने से भी इस बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। इस मौसम में मधुमेह रोगियों को विशेष तौर पर सावधानी बरतने की जरूरत है।

कहीं भी बाहर जाने से फिसलने से चोट लगने का खतरा रहता है। ऐसे में घाव भरने में समय लगता है। इसलिए, बरसात के मौसम में लगी चोट आपके लिए बड़ी मुसीबत साबित हो सकती है। दूसरा, जख्म में इंफेक्शन का खतरा भी बढ़ जाता है।