25.6.17

बहरेपन का योग से इलाज़



   सुनने की क्षमता धीरे-धीरे कम होना बहरापन कहलाता है। कुछ लोग जन्म से ही बधिर होते हैं उनकी चिकित्सा संभव नहीं होती परंतु अधिक आयु के कारण, सर्दी-जुकाम सभी ऋतुओं में होने के कारण अथवा पेट के बल एक ही कान को बिस्तर से दबाकर सोने की आदत से धीरे-धीरे बहरापन आने की आशंका रहती है। कभी-कभी कान पर चोट लगने से भी बहरापन आने की आशंका होती है।
कान सुनने की क्षमता धीरे-धीरे खोने लगते हैं, जन्मजात तीन-चार प्रतिशत यह समस्या देखने में आती है। कानों के कम सुनने की क्षमता किसी भी आयु में हो सकती है। आजकल हेडफोन्स, मोबाइल, ऊँॅची आवाज में संगीत आदि से भी बहरापन आ रहा है। स्विमिंग पूल में या आसपास के व्यक्ति का संक्रमण लगने से सुनने की शक्ति कम होकर व्यक्ति बहरा हो सकता है। जल्दी से सर्दी-जुकाम का उपचार न करने से भी बहरापन हो सकता है।



बहरेपन के लक्षणों में कान से कम सुनने वाले लोग स्वयं जोर से बोलने लगते हैं तथा दूसरों से कोई बात सुननी हो तो बहुत ही पास में पहुँचकर दूसरे व्यक्ति से बात करते हैं या ऊँची आवाज में टीवी सुनने की कोशिश करते हैं। बहुत से लोग भीड़ में कुछ भी सुनने की क्षमता खो देते हैं। कान में अनेक प्रकार की आवाज आने की शिकायत व्यक्ति करते हैं। कोई भी व्यक्ति सामान्य आवाज से बात करता है तब बहरा व्यक्ति क्या-क्या करते हुए दूसरी बात या दोहराता या फिर से बात को बोलने के लिए कहता है। कान में खुजली होने के अनेक कारण हैं जैसे एक ही करवट पर संपूर्ण रात्रि के समय सोना, ऊँचे तकियों पर सोना, पेट के बल कान को तकिए में दबाकर सोना, सर्दी-जुकाम का आदि होना, रक्त के प्रवाह को रोकने से कान की नसों में थकते जमा होकर खुजली आती या कान बंद हो जाते हैं और आंतरिक कान में सूजन आकर सुनने की क्षमता कम होने लगती है।

निम्न योगाभ्यास करने से उम्र के अनुसार कान के सुनने की घटने वाली क्षमता को फिर से प्राप्त किया जा सकता हैः
ब्रह्ममुद्रा : 

कमर सीधी रखकर बैठें और गर्दन को ऊपर-नीचे १० बार चलाना, गर्दन को दाएँ-बाएँ १० बार चलाना और धीरे-धीरे गर्दन को गोल घुमाना १० बार सीधे और १० बार उल्टे, आँखें खुली रखकर इस मुद्रा को करें।
मार्जरासन : 
घुटने और हाथों के बल चौपाए की तरह गर्दन कमर ऊपर-नीचे १० बार चलाएँ, जितना अधिक ऊपर देख सके देखें और सुबह-शाम करें।
शशकासन : 



घुटनों को जमीन पर मोड़कर नमाज पढ़ने जैसे बैठकर सामने झुकें और दाढ़ी को जमीन से लगाएँ और हाथों को सामने खेंच कर रखें १०-१५ श्वास-प्रश्वास होने तक इस स्थिति में रहें।

भुजंगासन : 
पेट के बल लेटकर पैर मिलाकर लंबे रखें और कंधों के नीचे हथेली को जमा कर गर्दन, सिर व नाभी तक पेट ऊपर उठाएँ और १०-१५ श्वास-प्रश्वास करें फिर जमीन पर पहुँचकर आराम करें। ३ बार इसे दोहराएँ।
अर्धशलभासन : 
पेट के बल लेटे हुए पीछे से १-१ पैर १०-१० श्वास-प्रश्वास के लिए उठाएँ और ३-३ बार दोहराएँ, पैर घुटने से न मोड़ें।
उत्तानपादासन : 
पीठ के बल लेटकर दोनों पैर ४५ डिग्री पर अर्थात लेटे-लेटे बिना घुटने मोड़े ऊपर उठाएँ और १०-१५ श्वास-प्रश्वास करने तक ऊपर रोकें फिर धीरे-धीरे नीचे उतारें। ३ बार दोहराएँ।
शवासन : 
पीठ के बल शरीर ढीला छोड़ें, आँखें बंद कर श्वास दीर्घ रूप से १० बार करें और साधारण ३० श्वास करें और करवट से उठें।
भ्रामरी प्राणासन : 
कमर सीधी करके बैठें, दोनों कानों को दोनों हाथों की तर्जनी उँगलियों से हल्के दबाव के साथ बंद करे। आँखें बंद कर लें और लंबी गहरी श्वास भीतर भरकर बारह श्वास नाक से निकालते हुए भँवरे की तरह आवाज जोर से करें, इतने जोर से करें कि मस्तिष्क, चेहरा और होंठों की मांसपेशियों में स्पंदन निर्माण हो सके। एक के बाद एक श्वास लेकर लगातार १० बार दोहराएँ। इससे कान की नसों में रक्त संचार बढ़कर और काम का परदा लोचदार होकर सुनने की क्षमता बढ़ती है। मन की एकाग्रता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होने लगता है।
दृष्टिहीनों के भी है योग-
दृष्टिहीनों के लिए पूर्ण रूप से स्वस्थ रहना भी एक महती समस्या है। चूंकि ये लोग मैदानी खेलकूद तथा दौड़ भाग नहीं कर सकते इसलिए शारीरिक गतिविधियों को बनाए रखने के लिए योग से बढ़कर कुछ और नहीं है। इससे इनके शरीर में स्फूर्ति बनी रहती र्है एवं चयापचय क्रिया भी दुरुस्त रहती है।
दृष्टिहीनों के लिए योगाभ्यास कठिन नहीं होता उन्हें आसन, प्राणायाम और ध्यान सहज ही सिद्ध हो जाते हैं।
दृष्टिबाधितों को योगासन ब्रेल लिपि में चित्र बनाकर समझाना ज्यादा आसान होता है। उनके पाचन संस्थान, श्वसन, रक्तसंचारण, निष्कासन आदि संस्थानों के क्रिया कलाप सुचारूरूप से काम करने लगते हैं।
दृष्टिबाधितों के लिए मुख्य रूप से ताड़ासन, त्रिकोण आसन, हस्तपादासन, उत्करासन, अग्निसार क्रिया, कंधे, गरदन का संचालन, ब्रह्ममुद्रा, मार्जरासन, शशकासन, पद्मासन, योगमुद्रा, भुजंगासन, शलभासन, धनुरासन, सर्वांगासन एवं शवासन के साथ नाड़ी शोधन, भ्रामरी प्राणायाम किया जा सकता है।

24.6.17

संधिवात जोड़ों के दर्द मे उपयोगी योग आसन

   गठिया रोग को आमवात, संधिवात आदि नामों से भी जाना जाता है। इस रोग में सबसे पहले शरीर में निर्बलता और भारीपन के लक्षण दिखाई देते हैं। शरीर के तमाम जोड़ों में इतना दर्द होता है कि उन्हें हिलाने पर ही चीख निकल जाए, खासकर सुबह के समय। इसके अलावा शरीर गर्म हो जाता है, लाल चकत्ते पड़ जाते हैं और जलन की शिकायत भी होती है।   अपने दैनिक जीवन के सामान्य कामकाज को निपटाते वक्त क्या आपके घुटनों, कन्धों या कलाई में दर्द होता है? क्या आप इन जोड़ों के दर्द के कारण अपने अपनी इच्छानुसार जीवन जीने के आनंद से वंचित है? क्या आप दिन में कई कई बार दर्द निवारक दवाओं के सेवन से परेशान है?
जोड़ों में जहां-जहां दर्द होता है, वहां सूजन आना भी इस बीमारी में आम है। जोड़ों के इर्द-गिर्द सख्त गोलाकार गांठें जैसी उभर आती हैं, जो हाथ पैर हिलाने पर चटकती भी हैं। शरीर के किसी भी अंग को हिलाने पर दर्द, जलन और सूजन की तकलीफ झेलनी पड़ती है। यदि आप अपने शरीर को हिलाना-डुलाना बंद कर देगे तो गठिया रोग आपको खा जाएगा। इसलिये यह बहुत जरुरी है कि आप कुछ योगा आसन करें और गठिया दर्द से राहत पाएं।
 शरीर में हड्डियों का कमजोर होना,उचित व्यायाम और भोजन में आवश्यक पोषक तत्वों के अभाव से जोड़ों के रोग प्रकट होने लगते है व बढ़ने लगते है|हालाँकि दवाओं के उपयोग से इस दर्द से सामयिक लाभ मिलता है पर इसका प्रामाणिक वैकल्पिक उपचार योग में उपलब्ध है जिसके अभ्यास से दर्द मुक्ति में शीघ्र लाभ होता है|


योग एक प्राचीन भारतीय तकनीक है जो दर्द को जड़ से उखाड़कर शरीर को रोगमुक्त करती है| योग शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार कर मन को विश्रांति प्रदान करता है|
जोड़ों के उपचार व उन्हें शक्तिशाली बनाने के लिए निम्न योगासन उपयोगी है:

सूर्य नमस्‍कार 

सूर्य नमस्‍कार शरीर के समग्र लचीलेपन के लिए अच्छा है। इस बहुमुखी योग आसन से शरीर की सभी मांसपेशियों को ढीला कर देता है जिसके बाद आपको व्‍यायाम शुरु करना चाहिये। यह घुटनों के लिए विशेष रूप से अच्छा है।
वज्रासन 
वज्रासन सबसे सरल आसन है। बस पैरों को घुटनों से मोड़कर बैठना है। पैरों के अँगूठे एक-दूसरे के ऊपर रहेंगे, एड़ियों को बाहर की ओर फैलाकर बैठने के लिए जगह बना लेंगे। हाथों को घुटनों पर रखेंगे।


इसको करने से घुटनों का दर्द कम होता है। यही एक ऐसा आसन है, जिसे खाना खाने के बाद भी किया ज सकता है।

  • वीर-भद्रासन | Veerbhadrasana (Warrior pose)
  • धनुरासन | Dhanurasana (Bow pose)
  • त्रिकोणासन | Trikonasana (Triangle pose)
  • सेतु-बंध आसन | Setu Bandhasana (Bridge pose)
  • मकर अधोमुख श्वानासन | Makara Adho Mukha Svanasana (Dolphin Plank pose)
  • उस्ट्रासन | Ustrasana (Camel pose)

योग के मुख्य आसन:,विधि और फायदे



योग का अर्थ है जोड़ना। जीवात्मा का परमात्मा से मिल जाना, पूरी तरह से एक हो जाना ही योग है। योगाचार्य महर्षि पतंजली ने सम्पूर्ण योग के रहस्य को अपने योगदर्शन में सूत्रों के रूप में प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार, “चित्त को एक जगह स्थापित करना योग है।
इस पोस्ट में हम कुछ आसान और प्राणायाम के बारे में बात करेंगे जिसे आप घर पर बैठकर आसानी से कर सकते हैं और अपने जीवन को निरोगी बना सकते हैं।
स्वस्तिकासन 

स्थिति- 
स्वच्छ कम्बल या कपडे पर पैर फैलाकर बैठें।
विधि- 
बाएं पैर को घुटने से मोड़कर दाहिने जंघा और पिंडली (calf, घुटने के नीचे का हिस्सा) और के बीच इस प्रकार स्थापित करें की बाएं पैर का तल छिप जाये उसके बाद दाहिने पैर के पंजे और तल को बाएं पैर के नीचे से जांघ और पिंडली के मध्य स्थापित करने से स्वस्तिकासन बन जाता है। ध्यान मुद्रा में बैठें तथा रीढ़ (spine) सीधी कर श्वास खींचकर यथाशक्ति रोकें।इसी प्रक्रिया को पैर बदलकर भी करें।
लाभ - पैरों का दर्द, पसीना आना दूर होता है।पैरों का गर्म या ठंडापन दूर होता है... ध्यान हेतु बढ़िया आसन है।
गोमुखासन 

विधि- 
दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें। बाएं पैर को मोड़कर एड़ी को दाएं नितम्ब (buttocks) के पास रखें।दायें पैर को मोड़कर बाएं पैर के ऊपर इस प्रकार रखें की दोनों घुटने एक दूसरे के ऊपर हो जाएँ।दायें हाथ को ऊपर उठाकर पीठ की ओर मुडिए तथा बाएं हाथ को पीठ के पीछे नीचे से लाकर दायें हाथ को पकडिये .. गर्दन और कमर सीधी रहे।एक ओ़र से लगभग एक मिनट तक करने के पश्चात दूसरी ओ़र से इसी प्रकार करें।
Tip- जिस ओ़र का पैर ऊपर रखा जाए उसी ओ़र का (दाए/बाएं) हाथ ऊपर रखें.
लाभ- 
अंडकोष वृद्धि एवं आंत्र वृद्धि में विशेष लाभप्रद है।धातुरोग, बहुमूत्र एवं स्त्री रोगों में लाभकारी है।यकृत, गुर्दे एवं वक्ष स्थल को बल देता है। संधिवात, गाठिया को दूर करता है।
गोरक्षासन 

विधि- 
दोनों पैरों की एडी तथा पंजे आपस में मिलाकर सामने रखिये।अब सीवनी नाड़ी (गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय के मध्य) को एडियों पर रखते हुए उस पर बैठ जाइए। दोनों घुटने भूमि पर टिके हुए हों।हाथों को ज्ञान मुद्रा की स्थिति में घुटनों पर रखें।
लाभ- 
मांसपेशियो में रक्त संचार ठीक रूप से होकर वे स्वस्थ होती है.मूलबंध को स्वाभाविक रूप से लगाने और ब्रम्हचर्य कायम रखने में यह आसन सहायक है।इन्द्रियों की चंचलता समाप्त कर मन में शांति प्रदान करता है. इसीलिए इसका नाम गोरक्षासन है।
अर्द्धमत्स्येन्द्रासन 

विधि:-दोनों पैर सामने फैलाकर बैठें. बाएं पैर को मोड़कर एडी को नितम्ब के पास लगाएं।बाएं पैर को दायें पैर के घुटने के पास बाहर की ओ़र भूमि पर रखें।


बाएं हाथ को दायें घुटने के समीप बाहर की ओ़र सीधा रखते हुए दायें पैर के पंजे को पकडें।दायें हाथ को पीठ के पीछे से घुमाकर पीछे की ओ़र देखें।इसी प्रकार दूसरी ओ़र से इस आसन को करें।

लाभ:-
मधुमेह (diabetes) एवं कमरदर्द में लाभकारी।
योगमुद्रासन

स्थिति- 
भूमि पर पैर सामने फैलाकर बैठ जाइए.
विधि-
बाएं पैर को उठाकर दायीं जांघ पर इस प्रकार लगाइए की बाएं पैर की एडी नाभि केनीचे आये।दायें पैर को उठाकर इस तरह लाइए की बाएं पैर की एडी के साथ नाभि के नीचे मिल जाए।दोनों हाथ पीछे ले जाकर बाएं हाथ की कलाई को दाहिने हाथ से पकडें. फिर श्वास छोड़ते हुए।सामने की ओ़र झुकते हुए नाक को जमीन से लगाने का प्रयास करें. हाथ बदलकर क्रिया करें।पुनः पैर बदलकर पुनरावृत्ति करें।
लाभ- चेहरा सुन्दर, स्वभाव विनम्र व मन एकाग्र होता है।
सर्वांगासन

स्थिति:- 
दरी या कम्बल बिछाकर पीठ के बल लेट जाइए।
विधि:-दोनों पैरों को धीरे –धीरे उठाकर 90 अंश तक लाएं। बाहों और कोहनियों की सहायता से शरीर के निचले भाग को इतना ऊपर ले जाएँ की वह कन्धों पर सीधा खड़ा हो जाए। पीठ को हाथों का सहारा दें। हाथों के सहारे से पीठ को दबाएँ। कंठ से ठुड्ठी लगाकर यथाशक्ति करें।फिर धीरे-धीरे पूर्व अवस्था में पहले पीठ को जमीन से टिकाएं फिर पैरों को भी धीरे-धीरे सीधा करें।
लाभ:-
थायराइड को सक्रिय एवं स्वस्थ बनाता है।मोटापा, दुर्बलता, कद वृद्धि की कमी एवं थकान आदि विकार दूर होते हैं।
प्राणायाम 
प्राण का अर्थ, ऊर्जा अथवा जीवनी शक्ति है तथा आयाम का तात्पर्य ऊर्जा को नियंत्रित करनाहै। इस नाडीशोधन प्राणायाम के अर्थ में प्राणायाम का तात्पर्य एक ऐसी क्रिया से है जिसके द्वारा प्राण का प्रसार विस्तार किया जाता है तथा उसे नियंत्रण में भी रखा जाता है। यहाँ 3 प्रमुख प्राणायाम के बारे में चर्चा की जा रही है:-
अनुलोम-विलोम प्राणायाम 

विधि:-
ध्यान के आसान में बैठें।बायीं नासिका से श्वास धीरे-धीरे भीतर खींचे।श्वास यथाशक्ति रोकने (कुम्भक) के पश्चात दायें स्वर से श्वास छोड़ दें।


पुनः दायीं नाशिका से श्वास खीचें।यथाशक्ति श्वास रूकने (कुम्भक) के बाद स्वर से श्वास धीरे-धीरे निकाल दें।जिस स्वर से श्वास छोड़ें उसी स्वर से पुनः श्वास लें और यथाशक्ति भीतर रोककर रखें… क्रिया सावधानी पूर्वक करें, जल्दबाजी ने करें।

लाभ:-
शरीर की सम्पूर्ण नस नाडियाँ शुद्ध होती हैं।शरीर तेजस्वी एवं फुर्तीला बनता है।भूख बढती है।रक्त शुद्ध होता है।

सावधानी:
नाक पर उँगलियों को रखते समय उसे इतना न दबाएँ की नाक कि स्थिति टेढ़ी हो जाए।श्वास की गति सहज ही रहे।कुम्भक को अधिक समय तक न करें।
कपालभाति प्राणायाम /

विधि:-
कपालभाति प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ है, मष्तिष्क की आभा को बढाने वाली क्रिया।इस प्राणायाम की स्थिति ठीक भस्त्रिका के ही सामान होती है परन्तु इस प्राणायाम में रेचक अर्थात श्वास की शक्ति पूर्वक बाहर छोड़ने में जोड़ दिया जाता है।श्वास लेने में जोर ने देकर छोड़ने में ध्यान केंद्रित किया जाता है।


कपालभाति प्राणायाम में पेट के पिचकाने और फुलाने की क्रिया पर जोर दिया जाता है।इस प्राणायाम को यथाशक्ति अधिक से अधिक करें।

लाभ:-
हृदय, फेफड़े एवं मष्तिष्क के रोग दूर होते हैं।कफ, दमा, श्वास रोगों में लाभदायक है।मोटापा, मधुमेह, कब्ज एवं अम्ल पित्त के रोग दूर होते हैं।मस्तिष्क एवं मुख मंडल का ओज बढ़ता है।
भ्रामरी प्राणायाम 

स्थिति:- किसी ध्यान के आसान में बैठें.
विधि:-
आसन में बैठकर रीढ़ को सीधा कर हाथों को घुटनों पर रखें . तर्जनी को कान के अंदर डालें।दोनों नाक के नथुनों से श्वास को धीरे-धीरे ओम शब्द का उच्चारण करने के पश्चात मधुर आवाज में कंठ से भौंरे के समान गुंजन करें।नाक से श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ दे।पूरा श्वास निकाल देने के पश्चात भ्रमर की मधुर आवाज अपने आप बंद होगी।इस प्राणायाम को तीन से पांच बार करें।
लाभ:-
वाणी तथा स्वर में मधुरता आती है।ह्रदय रोग के लिए फायदेमंद है।मन की चंचलता दूर होती है एवं मन एकाग्र होता है।पेट के विकारों का शमन करती है।उच्च रक्त चाप पर नियंत्रण करता है।

23.6.17

कपालभाति योगाभ्यास की विधि और फायदे



  ‘कपाल’ का अर्थ है खोपड़ी (सिर) तथा भाति का अर्थ है चमकना। चूंकि इस क्रिया से सिर चमकदार बनता है अतः इसे कपालभाति कहते हैं। कपालभाति एक ऐसी सांस की प्रक्रिया है जो सिर तथा मस्तिष्क की क्रियाओं को नई जान प्रदान करता है। घेरंडसंहिता में इसे भालभाति कहा गया है, भाल और कपाल का अर्थ है ‘खोपड़ी’ अथवा माथा। भाति का अर्थ है प्रकाश अथवा तेज, इसे ‘ज्ञान की प्राप्ति’ भी कहते हैं।
कपालभाति को प्राणायाम एवं आसान से पहले किया जाता है। यह समूचे मस्तिष्क को तेजी प्रदान करती है तथा निष्क्रिया पड़े उन मस्तिष्क केंद्रों को जागृत करती है जो सूक्ष्म ज्ञान के लिए उत्तरदायी होते हैं। कपालभाति में सांस उसी प्रकार ली जाती है, जैसे धौंकनी चलती है। सांस तो स्वतः ही ले ली जाती है किंतु उसे छोड़ा पूरे बल के साथ
कपालभाति करने की विधि 
किसी ध्यान की मुद्रा में बैठें, आँखें बंद करें एवं संपूर्ण शरीर को ढीला छोड़ दें।
दोनों नोस्ट्रिल से सांस लें, जिससे पेट फूल जाए और पेट की पेशियों को बल के साथ सिकोड़ते हुए सांस छोड़ दें।
अगली बार सांस स्वतः ही खींच ली जाएगी और पेट की पेशियां भी स्वतः ही फैल जाएंगी। सांस खींचने में किसी प्रकार के बल का प्रयोग नहीं होना चाहिए।
सांस धौंकनी के समान चलनी चाहिए।
इस क्रिया को तेजी से कई बार दोहराएं। यह क्रिया करते समय पेट फूलना और सिकुड़ना चाहिए।
शुरुवाती दौर इसे 30 बार करें और धीरे धीरे इसे 100-200 तक करें।
आप इसको 500 बार तक कर सकते हैं।
अगर आपके पास समय है तो रुक रुक कर इसे आप 5 से 10 मिनट तक कर सकते हैं।
कपालभाति के लाभसे तो कापलभाति के बहुत सारे लाभ है -



यह कब्ज की शिकायत को दूर करने के लिए बहुत लाभप्रद योगाभ्यास है
यह क्रिया अस्थमा के रोगियों के लिए एक तरह रामबाण है। इसके नियमित अभ्यास से अस्थमा को बहुत हद तक कंट्रोल किया जा सकता है। 
कपालभाति लगभग हर बिमारियों को किसी न किसी तरह से रोकता है। 
यह उदर में तंत्रिकाओं को सक्रिय करती है, उदरांगों की मालिश करती है तथा पाचन क्रिया को सुधारती है। 
यह फेफड़ों की क्षमता में वृद्धि करती है। 
कपालभाति को नियमित रूप से करने पर वजन घटता है और मोटापा में बहुत हद तक फर्क देखा जा सकता है।

इसके अभ्यास से त्वचा में ग्लोइंग और निखार देखा जा सकता है।
यह आपके बालों के लिए बहुत अच्छा है।
कपालभाति से श्वसन मार्ग के अवरोध दूर होते हैं तथा इसकी अशुद्धियां एवं बलगम की अधिकता दूर होती है।
यह शीत, राइनिटिस (नाक की श्लेष्मा झिल्ली का सूजना), साइनसाइटिस तथा श्वास नली के संक्रमण के उपचार में उपयोगी है।
यह साइनस को शुद्ध करती है तथा मस्तिष्क को सक्रिय करती है।



यह पाचन क्रिया को स्वस्थ बनाता है।

माथे के क्षेत्र में यह विशेष प्रकार की जागरुकता उत्पन्न करती है तथा भ्रूमध्य दृष्टि के प्रभावों को बढ़ाती है।
यह कुंडलिनीशक्ति को जागृत करने में सहायक होती है।
बरतें ये सावधानियाँ- 
हृदय रोग, चक्कर की समस्या, उच्च रक्तचाप, मिर्गी, दौरे, हर्निया तथा आमाशाय के अल्सर से पीड़ित व्यक्तियों को यह क्रिया नहीं करनी चाहिए। 
इसे ध्यान लगाने से पूर्व एवं आसन तथा नेति क्रिया के उपरांत करना चाहिए।
सांस भीतर स्वतः ही अर्थात् बल प्रयोग के बगैर ली जानी चाहिए तथा उसे बल के साथ छोड़ा जाना चाहिए किंतु व्यक्ति को इससे दम घुटने जैसी अनुभूति नहीं होनी चाहिए।
कपालभाति के बाद वैसे योग करनी चाहिए जिससे शरीर शांत जाए।

झड़ते बालों से निजात पाने के योग आसन


    हम सभी जानते है योगा हमारे स्वास्थ के लिए कितना लाभकारी है साथ ही इसके कितने प्रकार के लाभ भी है जैसे वजन कम करने में मददगार, सुंदर त्वचा प्रदान करना, साथ ही कई बीमारीयों से मुक्ती दिलाने में भी कारगर है, योगा वो हर कुछ करने में सक्षम है जो दवाएं नहीं कर पाती है
अगर आप भी अपने बाल झड़ने की समस्या से लगातार परेशान है तो घबराने की जरुरत नही है हम आपके लिए लेकर आए है कुछ ऐसे योगा आसन जिनकी मदद से आप पल भर में इससे छुटकारा पा सकती है, योगा सबसे सरल और आसान तरीका भी साबित होगा आपके लिए|
   हम आपके लिए लेकर आएं है कुछ ऐसे ही योगा करने के तरीके जिससे आप अपने बालों को और मजबूत बना सकती है, लेकिन एक बात अपने दिमाग में हमेशा रखे हो सकता है बीमारी भी आपके झड़ते बालों का कारण हो
योगा आसन आपके बालों के बढ़ने में अहम भूमिका निभाते है साथ ही ये आपका ब्लड सर्कुलेशन भी ठीक करते है इस योग आसन को आप कभी भी कर सकते है, रात को सोने से पहले भी लेकिन योग के साथ आपको अपने बालों का ख्याल भी रखना होगा उनकी जड़ो को सही सलामत रखें ताकि बालों का झड़ना कम हो सके
*वज्रासन
वज्रासन को डायमंड पोज के नाम से भी जाना जाता है। इस आसन को आप खाना खाने के बाद भी कर सकती हैं। ऐसा नहीं है कि खाना खाने के बाद इसे करने से आपको किसी तरह का कोई नुकसान होगा ।


यह आसन उनके लिए काफी फायदेमंद होता है जो कि अपना वजन कम करना चाहते हैं। इतना ही नहीं इस आसन को करने से सूजन से भी छुटकारा मिलता है, साथ ही पाचन संबंधित परेशानियों से बालों का झड़ना भी बढ़ जाता है।

*अधो मुख शवासन
यह मुद्रा एक कुत्ते की मुद्रा की तरह ही होती है, जिससे आपका ब्लड सर्कुलेशन अच्छा होता है इसके करने से आपको सर्दी, खांसी या फिर साइनस जैसी बीमारी में भी लाभ मिलता है.
*भस्त्रिका प्राणायाम
अगर आपको कभी ऐसा अहसास हो कि बिना कुछ खाए आपका शरीर भारी हो रहा है, तो ऐसे में आप यह मान कर चलिए कि आपके नर्वस सिस्टम में कोई ना कोई परेशानी जरूर है। आप इस लक्षण को नजरअंदाज बिल्कुल ना करें। तनाव ऐसा कारण है जिस कारण आपके बालों का झड़ना काफी बढ़ जाता है। इस योगा आसन को करें और देखें कि आपके बाल किस तरह से सही हो जाते हैं।
* कपालभाति प्राणायाम
हमारे दिमाग को काम करने के लिए अधिक मात्रा में ऑक्सीजन और आयरन की जरूरत होती है। एक शरीर को तभी फिट माना जाता है जब उसके शरीर में किसी तरह के विषाक्त पदार्थ और फैट ना हो।


इस आसन को करीब एक सप्ताह के लिए नियमित रूप से करें, ऐसा करने से आपको फर्क खुद देखने को मिलेगा। इस आसन को करने से बालों का झड़ना भी काफी कम होता है।

*अपानासन
यह आसन हमारे पाचन तंत्र को मजबूत बनाता हैं। इसके साथ ही इस आसन को करने से जहरीले पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और हमारा शरीर शुद्ध हो जाता है। इस आसन को करने से दिमाग शांत हो जाता है और कब्ज से राहत मिलती है। बालों के गिरने और सफेद बाल होने पर विशेषज्ञ हमेशा से ही इसी आसन को करने का सुझाव देते हैं।


कंधे मे दर्द के योग आसन

    दिन भर ऑफिस में काम करने वाले लोगों के लिए कंधों में दर्द की समस्या बहुत आम है। अगर आप अपने व्यस्त रुटीन से थोड़ा सा समय निकालकर इन तीन योगासनों को दें, तो कंधों के दर्द से हमेशा के लिए छुटकारा पाना कोई मुश्किल काम नहीं है।
आइए जानें, कंधों के दर्द को दूर भगाने वे आसनों के बारे में।
1. द्रुत ताड़ासन

इस आसन को आप बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं। दोनों हाथों की उंगलियों को इंटरलॉक करके हाथों को ऊपर की ओर उठाएं। हथेली छत की ओर होनी चाहिए।


अब हाथों की ऊपर की ओर जितना खींच सकें, खींचें।

अब सांस छोड़ते हुए दाईं ओर झुकें और हाथों को स्ट्रेच करें, फिर सांस खींचते हुए सीधे हो जाएं। इसी प्रक्रिया को बाईं ओर से दोहराएं। इस पूरी प्रक्रिया को रोज पांच से 15 बार दोहराएं।
2. पर्वतासन

इससे न सिफई कंधे का दर्द दूर होता है बल्कि रीढ़ की हड्डी भी मजबूत होती है। इसे करने के लिए पहले सुखासन में बैठ जाएं।
दोनों हाथों को जमीन से छुएं।


अब सांस लेते हुए दोनों हाथों को ऊप उठाएं। बाजू काम से छूने चाहिए, कोहनी सीधी रखें और नमस्कार की मुद्रा बनाएं। हाथों को ऊपर की ओर स्ट्रेच करें।

अब सांस छोड़ते हुए धीरे-धीरे दोनों हाथों को नीचे की ओर लाएं। इसे रोज पांच से 10 बार करें।
3. ताड़ासन

इस आसन को भी आप बैठकर या खड़े होकर कर सकते हैं। दोनों हाथों की उंगलियों को इंटरलॉक करके सांस खींचते हुए हाथों को ऊपर की ओर उठाएं। हथेली छत की ओर होनी चाहिए। अब हाथों की ऊपर की ओर जितना खींच सकें, खींचें।
कुछ पल बाद सांस छोड़ते हुए दोनों हाथों को नीचे की ओर ले जाएं। इस आसन को रोज पांच से 10 बार करें।

21.6.17

याददाश्त बढ़ाने में कारगर है "त्राटक योग"

  दिमाग हमारे शरीर को वो हिस्सा है जिसके संकेत के बिना शरीर का कोई भी अंग काम नहीं कर सकता। अपने आहार में कुछ विशेष जड़ी-बूटियों को शमिल करके आप अपने दिमाग को तेज कर सकते हैं। उम्र बढ़ने के साथ साथ याददाश्त भी कमजोर होती जाती है, लेकिन याददाश्त कमजोर होने की समस्या केवल बुढ़ापे में ही नहीं आती है।
    आजकल की लाइफ स्टाइल में देर से सोना, तनाव, जंक फूड जैसी कई आदतों के चलते कम उम्र में भी याददाश्त कमजोर होने लगती है। दिमाग तेज करने के लिए मेंटल एक्सरसाइज करना बहुत जरूरी है। योग न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक एक्सरसाइज भी है। इसका शरीर को स्वस्थ्य रखने में काफी महत्व होता है।
    जीवन में सफलता के लिए अहम तत्व है एकाग्रता क्योंकि इससे हम अपने काम में ध्यान केन्द्रित कर पाते हैं। आज से लगभग 5000 ई.पू. महर्षि पतंजलि ने एकाग्रता बढ़ाने की विधि की खोज की थी।
  

त्राटकयोग इस विधि एक प्रचलित नाम 'त्राटक' है। योगी और संत इसका अभ्यास परा-मनोवैज्ञानिक शक्ति के विकास के लिये भी करते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि इससे आत्मविश्वास पैदा होता है। 
   योग्यता बढ़ती है, और मस्तिष्क की शक्तियों का विकास कई प्रकार से होता है। यह विधि स्मरण-शक्ति को तीक्ष्ण बनाती है। प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रयोग की गई यह बहुत ही उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण पद्धति है।
अभ्यास का समय- 

योग की इस विधि का अभ्यास करने के सूर्योदय का समय सबसे उत्तम होता है। किन्तु यदि अन्य समय में भी इसका अभ्यास करें तो कोई हानि नहीं है।
स्थान- 

    किसी शान्त स्थान में बैठकर अभ्यास करें। जिससे कोई अन्य व्यक्ति आपको बाधा न पहुँचाए।
प्रथम चरण-
स्क्रीन पर बने पीले बिंदु को आरामपूर्वक देखें।
द्वितीय चरण-
जब भी आप बिन्दु को देखें, हमेशा सोचिये मेरे विचार पीत बिन्दु के पीछे जा रहे हैं इस अभ्यास के मध्य आँखों में पानी आ सकता है, चिन्ता न करें। आँखों को बन्द करें, अभ्यास स्थगित कर दें।
यदि पुन अभ्यास करना चाहें, तो आँखों को धीरे-से खोलें। आप इसे कुछ मिनट के लिये और दोहरा सकते हैं। अन्त में, आँखों पर ठंडे पानी के छींटे मारकर इन्हें धो लें।



एक बात का ध्यान रखें, आपका पेट खाली भी न हो और अधिक भरा भी न हो। यदि आप चश्मे का उपयोग करते हैं तो अभ्यास के समय चश्मा न लगाएँ।
यदि आप पीत बिन्दु को नहीं देख पाते हैं तो अपनी आँखें बन्द करें एवं भौंहों के मध्य में चित्त एकाग्र करें। इसे अन्त: त्राटक कहते हैं।
कम-से-कम तीन सप्ताह तक इसका अभ्यास करें। परन्तु, यदि आप इससे अधिक लाभ पाना चाहते हैं तो निरन्तर अपनी सुविधानुसार करते रहें।
अन्य योग स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए -
पद्मासन योग

यदि आपको स्मरण शक्ति बढ़ाना है तो नियमित रूप से पद्मासन कीजिए। यह ध्यान का आसन प्राचीन काल से ही भारत में प्रचलित है। यह एक ऐसा आसन है जिससे आप न केवल खुद के मन को शांत रख पाएंगे बल्कि इसके जरिए आप अपने आत्मविश्वास में भी बढ़ोत्तरी कर पाएंगे। इतिहास में बड़े-बड़े विद्वान इस आसन को करके अपने मन को शांत रखते थे।
पश्चिमोत्तानासन योग

स्मरण शक्ति बढ़ाने की इच्छा रखने वाले लोग पश्चिमोत्तानासन का सहारा ले सकते हैं। इस आसन के करने से न केवल याददाश्त बढ़ेगा बल्कि ये तनाव से राहत भी पहुंचाता है। हैमस्ट्रिंग, रीढ़ की हड्डी और पीठ के निचले हिस्से में सुधार, पाचन में सुधार, थकान को कम करना, गुर्दे को स्वस्थ रखना आदि में भी यह आसन काम करता है।
सर्वांगासन योग

ऐसा माना जाता है कि सर्वांगासन शरीर के लिए एक पूरा व्यायाम है। अगर आप इस आसन को नियमित रूप से करते हैं तो कई तरह की बीमारियों से छुटकारा पा सकते हैं। इस आसन के करने से मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह तेजी से होता है। इसलिए जो मानसिक रूप से कमजोर हैं उनकी एकाग्रता और बुद्धिमत्ता में यह आसन वृद्धि करता है।
वज्रासन योग

योग में वज्रासन की बहुत बड़ी भूमिका है। यह एक ऐसा आसन है जिसे करने में कोई मेहनत नहीं लगती है। आप इसे कभी भी और किसी भी समय असानी से कर सकते हैं। खाना खाने के बाद यदि इस आसन को करते हैं तो आपके पाचन तंत्र के लिए बहुत ही फायदेमंद रहेगा। आइए इस आसन के बारे में और जानने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा ध्यान और सांस लेने के व्यायाम आम तौर पर वज्रासन की अवस्था में किया जाता है। इस अवस्था में आप सांस भी गहरी ले सकते हैं और अच्छी तरह से ध्यान भी लगा सकते हैं।
उत्तानासन योग

इस आसन के जरिए सिर, कमर पैर एवं मेरूदंड का व्यायाम होता है। लेकिन इस आसन के करने से याददाश्त भी बढ़ती है। हालांकि जिन लोगों को पीठ या गर्दन की समस्या है उन्हें यह आसन नहीं करना चाहिए।
सुखासन  योग

सुखासन तनाव को दूर करने का अच्छा उपाय है। योग के इस अवस्था को मेडिटेशन का भी नाम दिया जाता है। यह एक ऐसा योग है जिसके जरिए आप मानसिक और शारीरिक थकावट को दूर कर सकते हैं। इसके साथ ही यह आसन हमें शांति और आत्मानंद का अनुभव देता है और एकाग्र होने में सहायता करता है।

20.6.17

दैनिक जीवन मे योग के सकारात्मक प्रभाव


    योग शब्द संस्कृत धातु 'युज' से निकला है, जिसका मतलब है व्यक्तिगत चेतना या आत्मा का सार्वभौमिक चेतना या रूह से मिलन। । हालांकि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं, जहाँ लोग शरीर को मोडते, मरोड़ते, खिंचते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं। यह वास्तव में केवल मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमता का खुलासा करने वाले इस गहन विज्ञान के सबसे सतही पहलू हैं। योग विज्ञान में जीवन शैली का पूर्ण सार आत्मसात किया गया है|
योग का इतिहास
   योग दस हजार साल से भी अधिक समय से प्रचलन में है। मननशील परंपरा का सबसे तरौताजा उल्लेख, नासदीय सूक्त में, सबसे पुराने जीवन्त साहित्य ऋग्वेद में पाया जाता है। यह हमें फिर से सिन्धु-सरस्वती सभ्यता के दर्शन कराता है। ठीक उसी सभ्यता से, पशुपति मुहर (सिक्का) जिस पर योग मुद्रा में विराजमान एक आकृति है, जो वह उस प्राचीन काल में योग की व्यापकता को दर्शाती है। हालांकि, प्राचीनतम उपनिषद, बृहदअरण्यक में भी, योग का हिस्सा बन चुके, विभिन्न शारीरिक अभ्यासों का उल्लेख मिलता है। छांदोग्य उपनिषद में प्रत्याहार का तो बृहदअरण्यक के एक स्तवन (वेद मंत्र) में प्राणायाम के अभ्यास का उल्लेख मिलता है। यथावत, ”योग” के वर्तमान स्वरूप के बारे में, पहली बार उल्लेख शायद कठोपनिषद में आता है, यह यजुर्वेद की कथाशाखा के अंतिम आठ वर्गों में पहली बार शामिल होता है जोकि एक मुख्य और महत्वपूर्ण उपनिषद है। योग को यहाँ भीतर (अन्तर्मन) की यात्रा या चेतना को विकसित करने की एक प्रक्रिया के रूप में देखा जाता है।
   प्रसिद्ध संवाद, “योग याज्ञवल्क्य” में, जोकि (बृहदअरण्यक उपनिषद में वर्णित है), जिसमें बाबा याज्ञवल्क्य और शिष्य ब्रह्मवादी गार्गी के बीच कई साँस लेने सम्बन्धी व्यायाम, शरीर की सफाई के लिए आसन और ध्यान का उल्लेख है। गार्गी द्वारा छांदोग्य उपनिषद में भी योगासन के बारे में बात की गई है।
   अथर्ववेद में उल्लेखित संन्यासियों के एक समूह, वार्ता (सभा) द्वारा, शारीरिक आसन जोकि योगासन के रूप में विकसित हो सकता है पर बल दिया गया है| यहाँ तक कि संहिताओं में उल्लेखित है कि प्राचीन काल में मुनियों, महात्माओं, वार्ताओं(सभाओं) और विभिन्न साधु और संतों द्वारा कठोर शारीरिक आचरण, ध्यान व तपस्या का अभ्यास किया जाता था।
   योग धीरे-धीरे एक अवधारणा के रूप में उभरा है और भगवद गीता के साथ साथ, महाभारत के शांतिपर्व में भी योग का एक विस्तृत उल्लेख मिलता है।
   बीस से भी अधिक उपनिषद और योग वशिष्ठ उपलब्ध हैं, जिनमें महाभारत और भगवद गीता से भी पहले से ही, योग के बारे में, सर्वोच्च चेतना के साथ मन का मिलन होना कहा गया है।
हिंदू दर्शन के प्राचीन मूलभूत सूत्र के रूप में योग की चर्चा की गई है और शायद सबसे अलंकृत पतंजलि योगसूत्र में इसका उल्लेख किया गया है। अपने दूसरे सूत्र में पतंजलि, योग को कुछ इस रूप में परिभाषित करते हैं:
" योग: चित्त-वृत्ति निरोध: "- योग सूत्र 1.2
पतंजलि का लेखन भी अष्टांग योग के लिए आधार बन गया। जैन धर्म की पांच प्रतिज्ञा और बौद्ध धर्म के योगाचार की जडें पतंजलि योगसूत्र मे निहित हैं।
मध्यकालीन युग में हठ योग का विकास हुआ।
योग के ग्रंथ: पतंजलि योग सूत्र |
पतंजलि को योग के पिता के रूप में माना जाता है और उनके योग सूत्र पूरी तरह योग के ज्ञान के लिए समर्पित रहे हैं।
   प्राचीन शास्त्र पतंजलि योग सूत्र, पर गुरुदेव के अनन्य प्रवचन, आपको योग के ज्ञान से प्रकाशमान (लाभान्वित) करते हैं, तथा योग की उत्पति और उद्देश्य के बारे में बताते हैं। योग सूत्र की इस व्याख्या का लक्ष्य योग के सिद्धांत बनाना और योग सूत्र के अभ्यास को और अधिक समझने योग्य व आसान बनाना है। इनमें ध्यान केंद्रित करने के प्रयास की पेशकश की गई है कि क्या एक ‘योग जीवन शैली’ का उपयोग योग के अंतिम लाभों का अनुभव करने के लिए किया जा सकता है|
चेतना एवं आत्मा का विज्ञान
   हर मानव की इच्छा स्वयं से और पर्यावरण से समरस होकर जीवित रहने की है। तथापि आधुनिक युग में अधिक शारीरिक और भावात्मक इच्छायें लगातार जीवन के अनेक क्षेत्रों पर भारी हो रही हैं। परिणामत: अधिकाधिक व्यक्ति खिंचाव, चिंता, अनिद्रा जैसे शारीरिक और मानसिक तनावों से पीडि़त रहते हैं और शारीरिक सक्रियता और उचित व्यायाम में एक असंतुलन बन गया है। यही कारण है कि स्वस्थ बने रहने और उसमें सुधार के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक समरसता बनाए रखने के लिए नई नई विधियों और तकनीकों का महत्व बढ़ गया है




"योग" शब्द का उद् गम संस्कृत भाषा से है और इसका अर्थ "जोडऩा, एकत्र करना" है। योगिक व्यायामों का एक पवित्र प्रभाव होता है और यह शरीर, मन, चेतना और आत्मा को संतुलित करता है। योग हमें दैनन्दिन की माँगों, समस्याओं और परेशानियों का मुकाबला करने में सहायक होता है। योग स्वयं के बारे में समझ, जीवन का प्रयोजन और ईश्वर से हमारे संबंध की जानकारी विकसित करने के लिए सहायता करता है। आध्यात्मिक पथ पर योग हमको ब्रह्माण्ड के स्व के साथ वैयक्तिक स्व के शाश्वत परमानंद मिलन और सर्वोच्च ज्ञान को प्रशस्त करता है। योग सर्वोच्च ब्रह्मांडमय सिद्धान्त है। यह जीवन का प्रकाश, विश्व की सृजनात्मक चेतना है जो सदैव सजग रहती है और कभी सोती नहीं; जो हमेशा थी, हमेशा है और हमेशा होगी-रहेगी।

    हजारों वर्ष पहले भारत में ऋषियों (बुद्धिजीवियों और संतों) ने अपनी ध्यानावस्था में प्रकृति और ब्रह्माण्ड की खोज की थी। उन्होंने भौतिक और आध्यात्मिक शासनों के कानूनों का पता किया था और विश्व में संबंधों की अंतर्दृष्टि प्राप्त की थी। उन्होंने ब्रह्माण्ड के नियमों, प्रकृति के नियम और तत्त्वों, धरती पर जीवन और ब्रह्माण्ड में कार्यरत शक्तियों और ऊर्जाओं-बाह्य संसार और आध्यात्मिक स्तर दोनों पर ही, जांच की थी। पदार्थ और ऊर्जा की एकता, ब्रह्माण्ड का उद् गम और प्राथमिक शक्तियों के प्रभावों का वर्णन और स्पष्टीकरण वेदों में किया गया है। इस ज्ञान का पर्याप्त अंश पुन: खोजा गया और आधुनिक विज्ञान द्वारा उसकी पुष्टि-सत्य अनुभूति की गई है।
    व्यायाम स्तरों का निर्धारण चिकित्सकों से परामर्श के बाद किए गये हैं और इस प्रकार-कथित नियमों और सावधानियों के पर्यवेक्षण के साथ-किसी भी व्यक्ति द्वारा घर पर स्वतंत्र रूप से अभ्यास किया जा सकता है। दैनिक जीवन में योग एक पुण्यप्रदा देने वाली प्रणाली है जिसका अर्थ है कि इसमें न केवल शारीरिक, अपितु मानसिक और आध्यात्मिक पक्षों पर भी विचार किया जा सकता है। सार्थक-सकारात्मक विचार, दृढ़ता, अनुशासन, सर्वोच्च के प्रति अभिविन्यास, प्रार्थना के साथ-साथ दयालुता और समझ, आत्मज्ञान और आत्मानुभूति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
दैनिक जीवन में योग के मुख्य लक्ष्य हैं:
शारीरिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य
सामाजिक स्वास्थ्य
आध्यात्मिक स्वास्थ्य
आत्मानुभूति या हमारे अपने अंदर दिव्यात्मा की अनुभूति
इन लक्ष्यों की प्राप्ति निम्नलिखित द्वारा होती है:
सभी जीवधारियों के प्रति प्रेम और सहायता-भाव
जीवन के प्रति सम्मान और प्रकृति व पर्यावरण का संरक्षण
मानसिक शांति
पूर्ण शाकाहारी भोजन
शुद्ध विचार और सार्थक, सकारात्मक जीवन शैली
शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास
सभी राष्ट्रों, संस्कृतियों और धर्मों के प्रति सहानुभूति, सहनशीलता



शारीरिक स्वास्थ्य

शरीरिक स्वास्थ्य का जीवन में आधारभूत मूल महत्व है। जैसा कि स्विट्जरलैण्ड में जन्मे चिकित्सक, पैरासैलसस ने बहुत ठीक कहा है: "स्वास्थ्य ही सब कुछ नहीं है, किन्तु स्वास्थ्य के बिना सब कुछ शून्य है। "स्वास्थ्य को बनाने और उसको संजोये रखने के लिए शारीरिक व्यायाम, आसन, श्वास व्यायाम (प्राणायाम और तनावहीनता, विश्राम, शिथिलता, आदि) तकनीकें हैं।
   अच्छे स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए एक और बड़ा कारक है- वह भोजन जो हम करते हैं। जो कुछ हम खाते हैं वह हमारे शरीर और मन, हमारे स्वभाव और गुण दोनों को ही प्रभावित करता है। संक्षेप में हम जो खाते हैं उसका प्रभाव हमारे अपने अस्तित्व पर होता है। भोजन हमारी शारीरिक ऊर्जा और जीवन शक्ति, हमारे अस्तित्व का स्रोत है। संतुलित और स्वास्थ्यप्रद भोजन में सम्मिलित हैं- अनाज, सब्जियाँ, दालें, फल, मेवे, दूध और दुग्ध पदार्थ साथ ही मधु, अंकुर, सलाद बीज, जड़ी बूटियाँ, मसाले, मूल रूप में या तुरंत तले पकाए हों। जिन भोजनों को परित्याग करना है वे हैं पुरानी बासी, पुन: गरम किये हुए, प्रकृति परिवर्तित खाद्य, मांस, सभी मांस उत्पाद और मछली और अंडे हैं। शराब, निकोटिन और मादक पदार्थों से बचना भी सर्वोत्तम है क्योंकि ये भी हमारे स्वास्थ्य को शीघ्र नष्ट कर देते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य
सामान्यत, हम मन और इंद्रियों को नियंत्रण में रखने की अपेक्षा इनसे ही जीवन में चलते हैं। तथापि, मन पर नियंत्रण करने के लिए हमें इसे आंतरिक विश्लेषण के अधीन लाना चाहिए और इसको शुद्ध करना चाहिए। नकारात्मक विचार और आशंकाएँ हमारे नाड़ी तंत्र में और उसके द्वारा शारीरिक कार्य में एक असंतुलन पैदा करते हैं। यह बहुत सारी बीमारियों और दु:ख का कारण है। विचार की स्पष्टता, आंतरिक स्वतंत्रता, संतोष और एक स्वस्थ आत्मविश्वास, मानसिक कल्याण का आधार है। यही कारण है हम क्रमिक रूप से अपने नकारात्मक गुणों और विचारों का हल करने का यत्न करते हैं और सकारात्मक विचारों और व्यवहारों को विकसित करने का लक्ष्य अपने सम्मुख रखते हैं और तद् नुसार कार्य करते हैं।



सामाजिक स्वास्थ्य

सामाजिक स्वास्थ्य, स्वयं अपने अंदर ही खुश होने की और अन्य लोगों की खुशी बनाने, रखने की योग्यता है। इसका अर्थ है अन्य लोगों के साथ वास्तविक संपर्क व समाज में उत्तरदायित्व ग्रहण करना और समाज के हित के लिए कार्य करना। सामाजिक स्वास्थ्य का अर्थ जीवन को इसके संपूर्ण सौंदर्य में अनुभव करना और तनावहीनता में बिताना है।
   हमारे युग की बढ़ती हुई समस्याओं में मादक, नशीले पदार्थों का सेवन है। यह सामाजिक बीमारी का एक साफ लक्षण है। दैनिक जीवन में योग की प्रणाली इस रोग का शमन या निरोध करने में सहायक हो सकती है और जनता को एक नया, सार्थक उद्देश्य और जीवन में प्रयोजन प्रदान कर सकती है। एक अच्छे, सकारात्मक सत्संग का हमारे मानस पर महान् सत् प्रभाव पड़ता है। क्योंकि ऐसा साहचर्य हमारा व्यक्तित्व और चरित्र को ढालता है और निरूपित करता है। सत्संग आध्यात्मिक विकास में अति महत्व रखता है।
    दैनिक जीवन में योग का जीवन बिताने का अर्थ अपने स्वयं के लिए और लोगों के लिए कार्य करना है। इसका अर्थ अपने पड़ोसियों के लिए और समाज के लिए मूल्यवान और रचनात्मक कार्य करना, प्रकृति और पर्यावरण को बनाए रखना और विश्व में शांति के लिए कार्य करना है। योग का अभ्यास करने का अर्थ सार्थक सकारात्मक भावना में रहना और सभी मानव जाति के कल्याण के लिए कार्य करने में सक्रिय रहना है।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य
आध्यात्मिक जीवन का मुख्य सिद्धांत और मानव जाति का नीति वचन, नियम है:
अहिंसा- परमोधर्म
किसी की हिंसा न करना प्रमुख सिद्धान्त है।
इस नीति वचन का, अहिंसा का सिद्धान्त, विचार, शब्द भावना और कार्य में सन्निहित है। प्रार्थना, ध्यान, मंत्र, सकारात्मक विचार और सहनशीलता आध्यात्मिक स्वास्थ्य उपलब्ध कराते हैं।
मानव को संरक्षक होना चाहिए, विध्वंसक, नाशक नहीं। जिन गुणों से हम वास्तव में मानव बनते हैं वे देने, समझने, और क्षमा करने की योग्यताएं हैं। जीवन के हर रूपों की वैयक्तिकता-पृथकता और स्वाधीनता का जीवन संरक्षण और सम्मान, योग शिक्षाओं का प्रथम अभ्यास है। इस नीति वचन का अनुसरण करने से अत्यधिक सहनशीलता, समझ, पारस्परिक प्रेम, सहायता और दयाभाव विकसित होते हैं - न केवल कुछ व्यक्तियों में, अपितु सभी मानवों, राष्ट्रों, जातियों और धार्मिक विश्वासों, मत-मतांतरों के मध्य भी।
"दैनिक जीवन में योग" का मूल सिद्धान्त स्वतंत्रता है। योग एक धर्म नहीं है- यह आध्यात्मिकता और बुद्धिमत्ता का स्रोत, सभी धर्मों की जड़ है। योग धार्मिक सीमाओं के बंधनों को दूर करता है और एकता का मार्ग दिखाता है।
 धरती पर सर्वाधिक उच्च विकसित जीवनधारी होने के नाते मानव अपनी वास्तविक प्रकृति और आंतरिक स्व- ईश्वर की अनुभूति करने में सक्षम है। योग का आध्यात्मिक लक्ष्य ईश्वर अनुभूति, वैयिक्तकता एवं आत्मा का ईश्वर से मिलन है। यह अनुभूति कि सब अपने मूल रूप में एक ही है और ईश्वर से संबंध रखते हैं, पहला कदम है।
कुछ महत्वपूर्ण योग मुद्राएँ-